गरब भयौ ब्रजनारि कौं -सूरदास

सूरसागर

दशम स्कन्ध

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राग रामकली


गरब भयौ ब्रजनारि कौं, तबही हरि जाना।
राधा प्यारी संग लिये, भए अंतर्धाना।।
गोपिनि हरि देख्यौ नहीं, तब सब अकुलाई।
चकित होइ पूछन लगीं, कहं गए कन्हाई।।
कोउ मर्म जानैं नहीं, ब्याकुल सब बाला।
सूर स्याम ढूंढति फिरैं, जित-तित ब्रज-बाला।।1085।।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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