भागवत सुधा -करपात्री महाराज पृ. 157

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भागवत सुधा -करपात्री महाराज

भगवान् ने सोचा- ‘इसके भीतर घुस जाना ठीक है, वैसे इससे पार पाना कठिन है। यह बाहर ही देखता है, पराड्मुख है।’ भगवान् उसके भीतर प्रवेश कर गये। हिरण्यकशिपु ने चारों ओर ढूँढ़ा। जब कहीं न पाया तो बोला- ‘विष्णु तो मर गया।’

निशम्य तद्वघं भ्राता हिरण्यकशिपुः पुरा।
हन्तुं भ्रातृहणं क्रुद्धो जगाम निलयं हरेः।।
तमायान्तं समालोक्य शूलपाणि कृतान्तवत्।
चिन्तयामास कालज्ञो विष्णुर्मायाविनां वरः।।
यतो यतोअहं तत्रासौ मृत्युः प्राणभूतामिव।
अतोअहमस्य हृदयं प्रवेक्ष्यामि पराग्दृशः।।[1]

(जब हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकशिपु को उसके वध का वृतान्त विदित हुआ, तब वह अपने भाई का वध करने वाले को मार डालने के लिये क्रोध करके भगवान् के निवासस्थान बैकुण्ठ धाम में पहुँचा। भगवान विष्णु तो मायावियों में सर्वश्रेष्ठ ठहरे। काल की गति के भी मर्मज्ञ ठहरे। जब उन्होंने देखा कि हिरण्यकशिपु तो हाथ में शूल लेकर काल की भाँति मेरे ही ऊपर धावा कर रहा है, तब उन्होंने विचार किया। जैसे संसार के प्राणियों के पीछे मृत्यु लगी रहती है, वैसे ही मैं जहाँ-जहाँ जाऊँगा, वहीं-वहीं यह मेरा पीछा करेगा। इसलिये मैं इसके हृदय में प्रवेज्ञ कर जाऊँ। जिससे यह मुझे देख न सके; क्योंकि यह तो बहिर्मुख है, बाहर की वस्तुएँ ही देखता है।’)

एवं स निश्चित्य रिपोः शरीरमाधावतो निर्विविशेअसुरेन्द्र।
श्रसानिलान्तहिंतसूक्ष्मदेहस्तत्प्राणरन्ध्रेण विविग्नचेताः।।[2]

(असुर शिरोमणे! जिस समय हिरण्यकशिपु उन पर झपट रहा था, उसी समय ऐसा निश्चय करके डर से काँपते हुए विष्णु भगवान ने अपने शरीर को सूक्ष्म बना लिया और उसके प्राणों के द्वारा नासिका में से होकर हृदय में जा बैठे।)

अपश्यन्निति होवाच मयान्विष्टमिदं जगत्।
भ्रातृहा में गती नूनं यतो नावर्तते पुमान्।।[3]

(उनको कहीं न देखकर वह कहले लगा- ‘मैंने सारा जगत् छान डाला, परन्तु वह मिला नहीं। अवश्य ही वह भ्रातृघाती उस लोक में चला गया, जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता।)
इस तरह जिसके खौफ से भगवान् को छिपना पड़ा, वह कोई कम पराक्रमी था क्या? बहुत बड़ा पराक्रमी था। भगवान् ने भक्तराज प्रह्लाद की रक्षा की और हिरण्यकशिपु का वध किया। जय-विजय ने स्वयं असुर बनकर भी भगवान की युद्धचिकीर्षा पूर्ण की। इस तरह जो स्वंय सुकृती होते हुए भी, भगवान के लीला-परिकर होते हुए भी केवल भगवान की लीला को सांगोपांग बनाने के लिए ही दुष्कृत करते हैं, उन दुष्कृतियों के उद्धार के लिए भगवान् का अवतार होता है।इस प्रकार

  1. साधु परित्राण
  2. धर्मसंस्थापन और
  3. दुष्कृतियों का विनाश रूप तीनों हेतु अनन्यथा सिद्ध बन जाते हैं।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भागवत 8/19/7-9
  2. भागवत 8/19/10
  3. भागवत 8/19/12

संबंधित लेख

भागवत सुधा -करपात्री महाराज
क्रमांक पाठ का नाम पृष्ठ संख्या
प्रथम-पुष्प
1. निगमकल्परोर्गलितं फलम् 37
2. पुरुषार्थचतुष्टयप्रदायक निगमकल्पतरु 38
3. रसमालयम् 38
4. आत्माराम का भी भगवद्गुणगणार्णव में अवगाहन 38
5. देव दुर्लभ श्रीमद्भागवत: 39
6. युगधर्मों का निरूपण 42
7. विद्या-अविद्या का समुच्चय 44
8. भगवन्नाम-संकीर्तन 48
9. माहात्म्य 51
10. वस्तु-तत्व के साक्षात्कार के लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन अपेक्षित 54
11. ‘जन्माद्यस्य यतोऽन्वयात्’ की भूमिका 54
12. भगवत्तत्व का अनुसंधान- छान्दोग्य शैली में 55
13. भगवतत्व का अनुसंधान -तैत्तिरीय शैली में 56
14. पैंगलोपनिषत् पुराण और महाभारत की शैली में 56
15. परब्रह्म के निःश्वासभूत वेदों की अपौरुषैयता 57
16. वेदों के प्रतिपाद्य सगुण या निर्गुण 59
17. ईश्वर-सिद्धि 64
18. नास्तिकों के भी उद्धार का उपक्रम 64
19. सर्वात्मभाव 68
20. भगवान् जगत के अभिन्ननिमित्तोपादानकारण 70
द्वितीय-पुष्प
1. ‘जन्माद्यस्य यतः’ 71
2. 'अन्वयत्', 'इतरत:', 'च' 72
3. 'अभिज्ञः' 74
4. ‘स्वराट्’ 74
5. ‘तेने ब्रह्महृदा य आदि कवये मुह्यन्ति यत् सूरयः’ 75
6. ‘तेजोवारिमृदां यथा विनिमय: 76
7. ऋषि-सूत-संवाद 78
8. श्रीशुक-वन्दना 82
9. शुकमनमोहक ‘बर्हापीडं’ श्लोक 85
10. 'बर्हापीडं' 87
11. ‘नटवर- वपुः’ 88
12. ‘कर्णयोः कर्णिकारं’ 90
13. ‘विभ्रद्वासः कनककपिशं’ 91
14. ‘रन्ध्रान्वेणोरधरसुधया पूरयन्’ 92
15. ‘वृन्दारण्यं स्वपदरमणं’ 94
16. अकारणकरुण करुणावरुणालय-‘भगवान्’ 95
तृतीय-पुष्प
1. प्रतिपद्य और प्रतिपादक की परब्रह्मरूपता 99
2. परम धर्म 111
3. मोक्ष पर्यवसायी धर्म, अर्थ और काम 118
4. ‘तत्त्व’ की तात्त्विक परिभाषा 123
चतुर्थ-पुष्प
1. भगवान व्यास को देवर्षि नारद की प्रेरणा 127
2. गुणगण भगवान् के उपकारक नहीं 139
3. भगवदाराधन की विधि 143
4. ‘तथा परमहंसानां’ के साथ ‘परित्राणाय साधूनां’ की संगति 154
पंचम-पुष्प
1. शुक-समागम 159
2. अप्रमत्त के लिये अति सुगम भगवत्प्राप्ति 174
3. नाम-धाम-प्राणायाम और ध्यान से भगवत्प्राप्ति 175
4. ‘तेषां के योगवित्तमाः’ का समाधान 183
5. ‘न किश्चिदपि चिन्तयेत्’ का तात्त्विक अभिप्राय 188
षष्ठ-पुष्प
1. ब्रह्म-नारद संवाद 190
2. माया संतरण का अमोघ उपाय 191
3. प्रह्लाद चरित 196
4. शरणागति 205
5. शरण्य की शरणागति 208
6. शरण्य का स्वरूप 208
7. शरणागति एक बार या बार-बार? 208/2
8. श्री जी 209
सप्तम-पुष्प
1. राजा बलि के पूर्व जन्म का वृतान्त 216
2. भगवान वामन को आविर्भाव 223
3. राजा बलि की सत्यनिष्ठा 228
4. धर्मनिरपेक्ष या धर्मसापेक्ष? 228
5. धन बड़ा या धनवान ? 230
6. ‘धन नहीं धनवान् बड़ा’ 231
अष्टम-पुष्प
1. वेदान्तवेद्य पूर्णतम पुरुषोत्तम ‘श्रीराम’ 233
2. ‘आदि कर्ता स्वयं प्रभु’ श्रीराम 235
3. लताओं तक को प्रेम प्रदान करने वाले ‘श्रीराम’ 236
4. प्रभुओं के भी प्रभु ‘श्रीराम’ 238
5. धर्म रक्षक ‘श्रीराम’ 239
6. लीला पुरुषोत्तम ‘श्रीकृष्ण’ 239
7. श्रीवृन्दावन, गोपांगनाएँ; श्रीकृष्ण और राधा का तात्विक स्वरूप 240
8. श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द का अद्भुत प्राकट्य 242
9. सुषमासारसर्वस्त्र ‘श्रोहरि’ 242
10. अनाघ्रात अनपहत-अनुत्पन्न-अनुपहत और अदृष्टाद्भुत पंकज ‘श्रीकृष्ण’ 242
11. सत्यज्ञानानन्तान्दमात्रैकरसमूर्ति ‘श्रीकृष्ण’ 242/2
12. भगवान् के जन्म और कर्म दिव्य हैं, वे स्वयं अप्राकृत हैं 244
13. श्री वृन्दावनधाम 248
14. मृद्भक्षण लीला 250
15. दामोदरलीला 251
16. निराकार से साकार 252
17. भावुक के दु्रत चित्त पर भगवान् की अभिव्यक्ति ‘भक्ति’ 254
18. श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीराधाचन्द्र 255
19. आसन और आशयरूप बाह्यप्रपच्च और पंचकोश के तादात्म्य का त्यागकर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द कन्द के स्वागत में तन्मय द्वारकास्थ पट्टमहिषीगण 257
20. कथा श्रवण से वैराग्य एवं विज्ञानोपलब्धि 258
21. भगवद्गुणानुवाद से भगवद्भक्ति 259
22. अंतिम पृष्ठ 259

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