प्रेम योग -वियोगी हरि पृ. 207

प्रेम योग -वियोगी हरि

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विश्व प्रेम

आप श्रीरामचंद्रजी की कुश शय्या देखकर उसकी प्रदक्षिणा करते हैं। जहाँ जहाँ उनके चरणों के चिह्न मिलते हैं, तहाँ तहाँ की पवित्र धूल आँखों से लगाते हैं। धन्य है प्रिय के पदारविन्दों की वह धूल! उस धूल के लिए कितने पगले नहीं ललचाये रहते। एक कृष्णानुरागिनी गोपिका, पवन से अपने प्रियतम के पैरों की धूल, देखिये, किस लालसा के साथ मँगा रही है-

बिरहबिथा की मूरि आँखिन में राखौं पूरि-
धूरितिन पायन की, हाहा, नैकु आनि दै।। - आनन्दघन

महाकवि गालिब का भी एक ऐसा ही भाव है। कहते हैं-

जहाँ तेरा नक़शे कदम देखते हैं,
खयाबाँ खयाबाँ इरम देखते हैं।

प्यारे, जहाँ तेरा चरण चिह्न हम देखते हैं, उस स्थान को हम स्वर्ग से भी बढ़कर समझने लगते हैं। वह स्थान किस तीर्थ स्थान से कम पुण्य क्षेत्र है। मीर ने खूब कहा है-

आँखें लगी रहेंगी बरसों वहीं समोंकी,
होगा कदम का तेरे जिस जा निशाँ जमीं पर।

अस्तु, अब महात्मा भरत उस भाग्यवती कुश शय्या के समीप आभूषणों से गिरे हुए दो चार सोने के सितारे देखते हैं, और उन्हें जनक तनया सीता के ही तूल्य पूज्य समझकर अपने माथे पर भक्ति पूर्वक रख लेते हैं। बलिहारी!

कनक बिन्दु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे।। - तुलसी
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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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प्रेम योग -वियोगी हरि
क्रमांक विषय पृष्ठ संख्या
पहला खण्ड
1. प्रेम 1
2. मोह और प्रेम 15
3. एकांकी प्रेम 25
4. प्रेमी 29
5. प्रेम का अधिकारी 41
6. लौकिक से पारलौकिक प्रेम 45
7. प्रेम में तन्मयता 51
8. प्रेम में अधीरता 56
9. प्रेम में अनन्यता 63
10. प्रेमियों का मत मज़हब 72
11. प्रेमियों की अभिलाषाएँ 82
12. प्रेम व्याधि 95
13. प्रेम व्याधि 106
14. प्रेम प्याला 114
15. प्रेम पंथ 120
16. प्रेम मैत्री 130
17. प्रेम निर्वाह 141
18. प्रेम और विरह 146
19. प्रेमाश्रु 166
20. प्रेमी का हृदय 177
21. प्रेमी का मन 181
22. प्रेमियों का सत्संग 186
23. कुछ आदर्श प्रेमी 190
दूसरा खण्ड
1. विश्व प्रेम 204
2. दास्य 213
3. दास्य और सूरदास 223
4. दास्य और तुलसी दास 232
5. वात्सल्य 243
6. वात्सल्य और सूरदास 253
7. वात्सल्य और तुलसीदास 270
8. सख्य 281
9. शान्त भाव 291
10. मधुर रति 299
11. अव्यक्त प्रेम 310
12. मातृ भक्ति 317
13. प्रकृति में ईश्वर प्रेम 322
14. दीनों पर प्रेम 328
15. स्वदेश प्रेम 333
16. प्रेम महिमा 342
अंतिम पृष्ठ 348

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