श्रीकृष्ण गीतावली -तुलसीदास पृ. 46

श्रीकृष्ण गीतावली

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8. गोपी-विरह
राग मलार

(39)
जो पै अलि! अंत इहै करिबो हो।
तौ[1] अगनित अहीर अबलनि को हठि न हियो हरिबो हो ।। 1 ।।
जौ प्रंपच करि[2] नाम प्रेम फिरि अनुचित आचरिबो हो।
तौ मथुराहि महाहिमा लहि सकल ढरनि ढरिबो हो ।। 2 ।।
दै कूबरिहि रूप ब्रज सुधि भएँ लौकिक डर डरिबो हो।
ग्यान बिराग काल कृत करतब हमरहि सिर धरिबो हो।
उन्हहि राग रबि नीरद जल ज्यों प्रभु परिमिति परिबो हो।
हमहुँ निठुर निरूपाधि नीर निधि[3]निज भुजबल तरिबो हो ।। 4 ।।
भलो भयो सब भाँति हमारोए एक बार मरिबो हो।
तुलसी कान्ह बिरह नित नव जरजरि जीवन भरिबो हो ।। 5 ।।

(एक गोपी ने कहा-) अरे भ्रमर! यदि उन्हेंं अन्त में यही करना था (हमें रोती-बिलखती छोड़कर चले ही जाना था) तो बलपूर्वक असंख्य गोप-अबलाओं का हृदय-हरण नहीं करना चाहिऐ था ।। 1 ।। यदि प्रेम के नाम पर छल-कपट करके फिर अनुचित आचरण (कुब्जा से प्रेम) करना था तो (पहले से ही) मथुरा में महान महत्त्व (स्वामित्व) प्राप्त करके (वहीं के निवासियों पर) सारी करुणावत्ति को लेकर रीझना चाहिये था (यहाँ हम गँवारिनों से सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये था) ।। 2 ।। (पर उन्हें तो) कुब्जा को सुन्दर रूप देकर व्रज की याद आने पर घर के लौकिक डर से डरना था। (हम लोगों के साथ प्रेम करने से उनकी बदनामी होगी, ऐसा मानकर हम से सम्बन्ध तोड़ना था और) ज्ञान-वैराग्य की शिक्षा तथा (संयोग-वियोग आदि) सब कुछ काल एवं पूर्वकृत कर्मों से होता है, यह उपदेश हमारे ही सिर लादना था (ज्ञान, वैराग्य तथा प्रारब्ध का उपदेश देकर हम से सम्बन्ध तोड़ना था, इसी से तुमको यहाँ भेजा हैं)।। 3 ।। उन (श्रीकृष्ण) का तो हमारे प्रति उतना ही राग है, जितना सूर्य का बादल के जल से होता है। (सूर्य जल को आकर्षित करके मेध रूप में परिणत कर देता है और फिर उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखता।) उन्हें तो (अब) राजा की मर्यादा का पालन करना हैं। (इधर) हम लोगों को तो कठोर उपाधिरहित (निर्गुण रूप) जल-सागर कों अपनी भुजाओं के बल से पार करना हैं ।। 4 ।। तुलसीदास जी कहते हैं- हमारा तो सब प्रकार से भला ही हुआ, एक बार तो हमें मरना था ही। अब तो, श्रीकृष्ण-विरह के नित्य नये संताप से जल-जलकर जीवन बिताना होगा ।। 5 ।।

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टीका टिप्पणी व संदर्भ

  1. अतुलित
  2. परि नाम
  3. नीरनिधि

संबंधित लेख

श्रीकृष्ण गीतावली -तुलसीदास
क्रम संख्या पाठ का नाम पृष्ठ संख्या
1. बाल-लीला 1
2. गोपी-उपालम्भ 4
3. उलूखल-बन्धन 15
4. इन्द्रकोप-गोवर्धन-धारण 21
5. गोचारण अथवा छाक-लीला 40
6. यमुना तट पर वंशीवादन 24
7. शोभा-वर्णन 5
8. गोपी-विरह 29
9. भक्त-मर्यादा-रक्षण 71
पदों की वर्णानुक्रमणिका
1. अब सब साँची कान्ह तिहारी। 6
2. अबहिं उरहनो दै गई, बहुरौ फिरि आई। 8
3. अब ब्रज बास महरि किमि कीबो। 9
4. आजु उनीदे आए मुरारी। 26
5. आलि! अब कहुँ जनि नेह निहारि। 33
6. आली! टति अनुचित, उतरु न दीजैं। 52
7. ऊधो! या ब्रज की दसा बिचारौ। 40
8. ऊधो जू कह्यो तिहारोह कीबो। 42
9. ऊधो! यह ह्या न कछू कहिबे ही। 47
10. ऊधो हैं बड़े, कहैं सोइ कीजै। 53
11. ऊधो! प्रीति करि निरमोहियन सों को न भयो दुख दीन?। 63
12. ऐसो हौंहुँ जानति भृंग! 62
13. कबहुँ न जात पराए धामहिं। 5
14. कहा भयो कपट जुआ जौ हौं हारी। 71
15. करि है हरि बालक की सी केलि। 32
16. कही है भली बात सब के मन मानी। 56
17. कान्ह, अलि, भए नए गुरू ग्यानी। 54
18. काहे को कहत बचन सँवरि। 61
19. कोउ सखि नई बात सुनि आई। 39
20. कौन सुनै अलि की चतुराई। 59
21. गहगह गगन दुंदुभी बाजी। 73
22. गावत गोपात लाल नीकें राग नट हैं। 24
23. गोपाल गोकुल बल्लवी प्रिय गोप गोसुत बल्लभं। 28
24. गेकुल प्रीति नित नई जानि। 25
25. छपद! सुनहु बर बचन हमारे। 66
26. छाँडो मेरे ललन! ललित लरिकाई। 13
27. छोटी मोटी मीसी रोटी चिकनी चुपरि कै तू 2
28. जब ते ब्रज तजि गये कन्हाई। 35
29. जानी है ग्वालि परी फिरि फीकें। 10
30. जो पै अलि! अंत इहै करिबो हो। 46
31. जौलौं हौं कान्ह रहौं गुन गोए। 11
32. टेरीं (कान्ह) गोबर्धन गैया। 22
33. ताकी सिख ब्रज न सुनैगो कोउ भोरें। 51
34. तोहि स्याम की सपथ जसोदा! आइ देखु गृह मेंरें। 3
35. दीन्ही है मधुप सबहि सिख नीकी। 50
36. देखु सखी हरि बदन इंदु पर। 25
37. नहिं कछु दोष स्याम को माई। 30
38. ब्रज पर घन घमंड करि आए। 21
39. बिछुरत श्रीब्रजराज आजु 29
40. भली कही, आली हमहुँ पहिचाने। 25
41. भूलि न जात हौं काहू के काऊ। 45
42. महरि तिहारे पायँ परौं, अपनो ब्रज लीजै। 7
43. मधुकर! कहहु कहन जो पारौ। 41
44. मधुकर! कान्ह कही ते न होही। 48
45. मधुप! समुझि देखहु मन माही। 68
46. मधुप! तुम्ह कान्ह ही की कही क्यों न कही है? 49
47. ( माता) लै उछंग गोबिंद मुख बार-बार निरखै। 1
48. मेने जान और कछु न मन गुनिए। 44
49. मो कहँ झूठेहुँ दोष लगावहिं। 4
50. मोको अब नयन भए रिपु माई! 69
51. ललित लालन निहारि, महरि मन बिचारि, 19
52. लागियै रहति नयननि आगे तें 34
53. लेत भरि भरि नीर कान्ह कमल नैन। 16
54. सब मिलि साहस करिय सयानी। 55
55. ससि तें सीतल मोकौं लागै माई री! तरनि। 36
56. सो कहौ मधुप! जे मोहन कहि पठई। 43
57. सुनत कुलिस सम बचन तिहाने। 64
58. संतत दुखद सखी! रजनीकर। 37
59. हरि को ललित बदन निहारु 15
60. हा हा री महरि! बारो, कहा रिस बस भई, 17
61. हे हम समाचार सब पाए। 57

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