भागवत स्तुति संग्रह पृ. 289

भागवत स्तुति संग्रह

तीसरा अध्याय

किशोरलीला
चतुर्थ प्रकरण
मथुरा छोड़ना

Prev.png
राजा मुचुकुन्दकृत स्तुति

जरासन्ध खिन्नचित्त होकर वन की ओर भाग गया किन्तु अपने मित्र शिशुपालादि के समझाने पर फिर युद्ध के लिए मथुरा में आया और इस बार भी अपनी सेना का संहार कराकर लौट आया, इस प्रकार वह सत्रह बार भगवान् से हारकर भागा।

भगवान की लीला अति अद्भुत है। वे बड़े ही कौतुकी हैं। उन्होंने अठारहवीं बार यह ठानी कि इस समय जरासन्ध के सामने से भाग जाना चाहिए। उस समय ऐसे ही समान जुट गये जिनके कारण मानो श्रीकृष्णचंद्र असमंजस में पड़ गये। एक ओर तो कालयवन नामक[1]वीर तीन करोड़ म्लेच्छों के साथ भगवान से लड़ने के लिए मथुरा के समीप आ गया और दूसरी ओर से जरासन्ध के आने की भी सूचना मिली। ऐसी स्थिति में यदि भगवान एक ओर युद्ध करते हैं तो दूसरा आक्रमणकारी मथुरा को नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। इसलिए उन्होंने विश्वकर्मा द्वारा समुद्र के बीच में द्वार का नामक एक नगर बनवाया। इस नगर की शोभा निराली थी। प्रत्येक घर का द्वार राजमार्ग की ओर खुला था। तथा पीछे की ओर गलियाँ तथा दोनों बगलों में आँगन थे। जहाँ-तहाँ नगर में और घरों में देवमंदिर थे। भगवान ने अपनी माया से सब मथुरावासियों को द्वारका में पहुँचा दिया और आप कालयवन से लड़ने के लिए मथुरा में आये।

Next.png

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कालयवन एक बड़ा वीर था। उसको यह घमण्ड हुआ कि पृथ्वी में मुझसे बढ़कर और कोई योद्धा नहीं है। एक समय उसने नारद जी से सुना कि यादव मेरे समकक्ष हैं। अतः भगवान अपनी सेना लेकर मथुरा पर चढ़ाई कर दी। नारद जी ने भगवान् के रूपादि का भी वर्णन कालयवन से कर दिया था।

संबंधित लेख

भागवत स्तुति संग्रह
प्रकरण पाठ का नाम पृष्ठ संख्या
उपोद्घात
1. श्री शुकदेव कृत स्तुति 1
पहला अध्याय
प्रथम- बाललीला 2. देवगण कृत स्तुति 13
द्वितीय- श्रीकृष्ण जन्म 3. वसुदेव कृत स्तुति 27
4. देवकी कृत स्तुति 32
तृतीय- शिशु लीला 5. नलकूबर और मणिग्रीव कृत स्तुति 36
चतुर्थ- कुमारावस्था लीला 6. ब्रह्मा कृत स्तुति 46
पंचम- पौगण्डावस्था लीला पूर्वार्ध 7. नाग पत्नियों द्वारा की हुई स्तुति 73
8. कालिय कृत स्तुति 87
षष्ठ- पौगण्डावस्था लीला उत्तरार्ध 9. इंद्र तथा कामधेनु कृत स्तुति 89
दूसरा अध्याय
प्रथम- माधुर्य लीला 10. माधुर्य का प्रादुर्भाव 99
द्वितीय- चीरहरण लीला 11. ब्राह्मणों द्वारा की हुई स्तुति 117
तृतीय- रास का आह्वन 12. गोपी कृत स्तुति 131
चर्तुर्थ- रासलीला पूर्वार्ध 13. गोपियों द्वारा विरहावस्था में की हुई स्तुति 153
पंचम- रासलीला उत्तरार्ध 14. युग्मश्लो की गोपीगीत 176
षष्ठ- गोपियों से विदाई 15. गोपी-आक्रन्दन 195
सप्तम- उद्धव जी द्वारा गोपियों को संदेश 16. गोपी क्रंदन 207
अष्टम- परिशिष्ट 17. उद्धव जी कृत गोपी स्तुति 221
नवम- ब्रह्मज्ञानवती गोपियाँ गोपी कृत विनती 234
तीसरा अध्याय
प्रथम- किशोर लीला 18. नारद कृत स्तुति 238
द्वितीय- अक्रूर जी का वैकुण्ठदर्शन 19. अक्रूर कृत स्तुति 250
तृतीय- मथुरा की लीलाएँ 20. अक्रूर जी स्तुति 271
चतुर्थ- मथुरा छोड़ना 21. मुचुकुन्द कृत स्तुति 288
चौथा अध्याय
प्रथम- द्वारका लीला 22.रुक्मिणी का पत्र 299
द्वितीय- श्रीकृष्ण जी के विवाह 23. भूमि कृत स्तुति 310
तृतीय- रुक्मिणी के साथ भगवान का विनोद 24. रुक्मिणी कृत स्तव 320
चतुर्थ- बाणासुर का अभिमान भंजन 25. ज्वर कृत स्तुति 335
26. रुद्र कृत स्तुति 341
पंचम- पौण्ड्रक और राजा नृग का उद्धार 27. नृग कृत स्तुति 348
षष्ठ- भगवान का गार्हस्थ्य जीवन 28. बन्दी राजाओं का प्रार्थना पत्र 354
सप्तम- जरासन्ध और शिशुपालादि का वध 29. कारागृह मुक्त राजाओं द्वारा की गयी स्तुति 362
अष्टम- सुदामा का चरित्र और वसुदेव जी का यज्ञ 30. ऋषि कृत स्तुति 374
नवम- देवकी के छः मृत पुत्रों का उद्धार 31. बलि कृत स्तुति 384
32. वसुदेव कृत स्तुति 392
33. श्रुतदेव कृत स्तुति 402
दशम- महाभारत के युद्ध का अंत 34. कुन्ती कृत स्तुति 406
35. भीष्म कृत स्तुति 425
एकादश- भगवान का इन्द्रप्रस्थ से जाना 36. इन्द्रप्रस्थ की स्त्रियों द्वारा कृत स्तुति 431

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                                 अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र    अः