रासपंचाध्यायी -अखण्डानन्द सरस्वती पृ. 149

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रासपञ्चाध्यायी -स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती

श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का अभिसार

जिज्ञासु सब एक जिज्ञासा करते थे, लेकिन जब संन्यास लेने का मौका आया तो अकेले-अकेले भगे और आपको मालूम है कि बिना नंगा हुए संन्यास भी नहीं होता है। बिना निवारण हुए द्रष्टा का स्वरूप में अवस्थान नहीं होता, बिना निवारण हुए स्वर्ग सुख का आस्वादन नहीं होता, बिना निवारण हुए भगवान् की लीला में प्रवेश नहीं होता, बिना निवारण हुए ब्रह्मज्ञान नहीं होता, बिना निवारण हुए रासलीला नहीं मिलती, परदा तो हटाना ही पड़ेगा।
आजग्मुः अन्योन्यमलक्षितोद्यमाः- हरेक गोपी हरेक गोपी से छिपकर जाती है। अपने प्रियतम के साथ जो संबंध है वह सबका व्यक्तिगत है। अनादिकाल से जो संसार में प्रवाह है, इसमें सबका मन अलग-अलग है, इसकी योग्यता अलग-अलग होता है। जो अयोध्या में जाय सो सब राममंत्र का जप करें, जो वृन्दावन जाय, सो सब कृष्णमंत्र का जप करें, जो काशी जाय सो सब शिव मंत्र का जप करें, यह शास्त्रीय पद्धति नहीं है।

शास्त्रीय पद्धति यह है कि गुरु एक व्यक्ति को देखे कि इसने पूर्वजन्मों में किस मंत्र का जाप किया है, किस इष्ट का ध्यान किया है और वह कहाँ तक पहुँचा हुआ है, फिर वह गुरु उसके आगे उसका संबंध जोड़ दे, तब साधक आगे बढ़ता है। सोलहो धान बाईस पसेरी नहीं होता। सबके समझ में वेदान्त नहीं आता। हजार कोशिश करो सबके हृदय में रस का उल्लास नहीं होता। सबको समाधि नहीं लगती, सब धर्मात्मा नहीं होते क्योंकि सबका चित्त असल में अलग-अलग होता है। यशोदा मैया को कोई समझावे कि भक्ति में सबसे अच्छा श्रृंगार रस का मधुर रस का भाव है, तो मैया मारेगी और गोपियों से कोई कहे कि वात्सल्य रस बड़ा श्रेष्ठ है तो गोपी कहेगी चल हट हमारे सामने बात नहीं करना। सबकी स्थिति अलग-अलग होती है, सबके चित्त की गति अलग-अलग होती है। अलगाव में तो ये जीव बहता आया ही है।

जिन लोगों ने आज तक सबको एक में मिलाने की कोशिश की है, किसी को सफलता हुई नहीं है। समन्वय की बात करते हैं लोग परंतु क्या समन्वय होगा? गौतम और कणाद् आपस में नहीं मिले, गौतम और कपिल आपस में नहीं मिले, कपिल पतंजलि आपस में नहीं मिले, पतंजलि और जैमिनि, फिर जैमिनि और व्यास आपस में नहीं मिले। और हमलोग क्या कहते हैं कि सब आपस में मिले हुए हैं। ये नीचे हैं, ये ऊँचे हैं। उनसे पूछो कि तुम नीचे हो? वह भला मानेंगे? तो समन्वय तो दूसरे लोग लादते हैं।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख

रासपंचाध्यायी -अखण्डानन्द सरस्वती
प्रवचन संख्या विषय का नाम पृष्ठ संख्या
1. उपक्रम 1
2. रास की भूमिका एवं रास का संकल्प 12
3. रास के हेतु, स्वरूप और काल 28
4. रास के संकल्प में गोपी-प्रेम की हेतुता 40
5. रास की दिव्यता का ध्यान 51
6. योगमाया का आश्रय लेने का अर्थ 63
7. योगमायामुपाश्रित:-भगवान की प्रेम-परवशता 75
8. कृपायोग का आश्रय और चंद्रोदय 85
9. रास-रात्रि में पूर्ण चंद्र का दर्शन 96
10. रास में चंद्रमा का योगदान 106
11. भगवान ने वंशी बजायी 116
12. गोपियों ने वंशी-ध्वनि सुनी 127
13. श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का अभिसार 141
14. जो जैसिह तैसिह उठ धायीं-1 152
15. जो जैसिह तैसेहि उठ धायीं-2 163
16. जो जैसेहि तैसेहि उठि धायीं-3 175
17. जार-बुद्धि से भी भगवत्प्राप्ति सम्भव है 187
18. विकारयुक्त प्रेम से भी भगवत्प्राप्ति सम्भव है 198
19. गोपी दौड़कर गयीं कृष्ण के पास और कृष्ण ने कहा कि लौट-जाओ 209
20. श्रीकृष्ण का अमिय-गरल-वर्षण 214
21. गोपी के प्रेम की परीक्षा-धर्म का प्रलोभन 225
22. ‘लौट-जाओ’ सुनकर गोपियों की दशा का वर्णन 238
23-24. प्रेम में सूखी जा रहीं गोपियाँ आखिर बोलीं 248
(प्रणय-गीत प्रारम्भ)
25. गोपियों का समर्पण-पक्ष 261
26. श्रीकृष्ण में रति ही बुद्धिमानी है 276
27. गोपियों की न लौट पा सकने की बेबसी और मर जाने के परिणाम का उद्घाटन 286
28. गोपियों का श्रीकृष्ण को पूर्व रमण की याद दिलाना 297
29-31. गोपियों में दास्य का उदय 307
32. गोपियों में दास्य का हेतु-1 338
33. गोपियों में दास्य का हेतु-2 353
34. गोपियों में दास्य का हेतु-3 366
35-36. गोपियों की चाहत 376
(प्रणय-गीत समाप्त)
37-39. प्रथम रासक्रीड़ा का उपक्रम 393
40. रास में श्रीकृष्ण की शोभा 429
41. रास-स्थली की शोभा 441
42. रासलीला का अन्तरंग-1 453
43. रासलीला का अन्तरंग-2 467
44. रासलीला का अन्तरंग-3 480
45. रासलीला का अन्तरंग-4 494
46. अंतिम पृष्ठ 500

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