हित हरिवंश गोस्वामी -ललिताचरण गोस्वामी पृ. 338

श्रीहित हरिवंश गोस्वामी:संप्रदाय और साहित्य -ललिताचरण गोस्वामी

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साहित्य
श्री दामोदर स्वामी

ताके सदा हिय आनन्द ।
बसत नित चित पद्म पद हरि त्रिविध ताप निकंद ।।
भृंग मन नवरंग भीन्यौ लेत सुख मकरंद ।
काल कर्म कलेस नहि तहाँ सर्वरी हिम चंद ।।
जगमगै नख कांति कमनी तरनि संतत वृन्द ।
चरन ऐसे हित दमोदर भजत नही मति मंद ।।

आँगन आज बधाई बाजै ।
भूषन मनि वृषभान भवन में सुता सुलक्षण राजै ।।
जाके रूप छटा की शोभा सब लोकनि में छाजै ।
जाके प्रेम बँध्यौ मोहन दिन वृन्दा विपिन विराजै ।।
जाकी भृकुटिन की छवि निरखत कोटि मदन रति लाजै ।
जाके बल आनंद मगन मन रसिक सभा दिन गाजै ।।
सुन्दर रस की रासि विलासनि प्रगटी वल्लभ काजै ।
गावत यह जस दामोदर हित मंगल मोद सदा जै ।।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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विषय पृष्ठ संख्या
चरित्र
श्री हरिवंश चरित्र के उपादान 10
सिद्धान्त
प्रमाण-ग्रन्थ 29
प्रमेय
प्रमेय 38
हित की रस-रूपता 50
द्विदल 58
विशुद्ध प्रेम का स्वरूप 69
प्रेम और रूप 78
हित वृन्‍दावन 82
हित-युगल 97
युगल-केलि (प्रेम-विहार) 100
श्‍याम-सुन्‍दर 13
श्रीराधा 125
राधा-चरण -प्राधान्‍य 135
सहचरी 140
श्री हित हरिवंश 153
उपासना-मार्ग
उपासना-मार्ग 162
परिचर्या 178
प्रकट-सेवा 181
भावना 186
नित्य-विहार 188
नाम 193
वाणी 199
साहित्य
सम्प्रदाय का साहित्य 207
श्रीहित हरिवंश काल 252
श्री धु्रवदास काल 308
श्री हित रूपलाल काल 369
अर्वाचीन काल 442
ब्रजभाषा-गद्य 456
संस्कृत साहित्य
संस्कृत साहित्य 468
अंतिम पृष्ठ 508

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