गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 82

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

प्रथम सर्ग
सामोद-दामोदर

अथ द्वितीय सन्दर्भ
2. गीतम्

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पद्मापयोधर-तटी-परिरम्भ-लग्न-
काश्मीर-मुद्रितमुरो मधुसूदनस्य
व्यक्तानुरागमिव खेलदन खेद-
स्वेदाम्बु पूरमनुपुरयतु प्रियं व:[1]


अनुवाद- पद्मा श्रीराधा जी के कुंकुम छाप से चिह्नित स्तन-युगल का परिरम्भण करने से जिन श्रीकृष्ण का वक्ष:स्थल अनुरञ्जित हो गया है, मानो हृदयस्थित अनुराग ही रञ्जित होकर व्यक्त होने लगा है, साथ ही कन्दर्पक्रीड़ा के कारण जात स्वेद-विन्दुओं से जिनका वक्ष:स्थल परिप्लुत हो गया है, ऐसे मधुसूदन का सम्भोगकालीन वक्ष:स्थल आप सबका (हम सबका) मनोरथ पूर्ण करें।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अन्वय- एवं प्रार्थ्य श्रोतृन् प्रति आशिषमातनोति]- पद्मापयोधरतटी-परिरम्भ-लग्नकाश्मीरमुद्रितम् (पद्माया लक्ष्म्या या पयोधरतटी कुचपरिणाह: स्तन-परिसर इति यावत्र, तस्य परिरम्भणेन आलिनेन लग्नं यत्र काश्मीरं कुंकुमं तेन मुद्रितं चिह्नितं) [अत:] व्यक्तानुरागम् (व्यक्त: स्पष्टीभूतोऽनुराग आसक्ति: यत्र तादृशम्) इव तथा खेलदनंग-खेद-स्वेदाम्बुपूरम् (खेलन् क्रीड़न् य: अनंगस्तेन य: खेद: आयास: तेन स्वेदाम्बुपूरम: घर्मजलप्रवाह: यत्र तथाभूतं) मधुसूदनस्य उर: (वक्ष:) व: (युष्माकं) प्रियम् अनुपूरयतु (निरन्तरं विदधातु) [अन्तरुच्छलित: प्रिरनुरागो बहि: काश्मीररूपेण उरसि आविर्भूत इवेत्यर्थ:

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सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

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