गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 347

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

अष्टम: सर्ग:
विलक्ष्यलक्ष्मीपति:

सप्तदश: सन्दर्भ:

17. गीतम्

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वंशीध्वनि को सुनकर व्रज-कुरांगनाएँ हिरणियाँ आकर्षित हो स्तम्भित रह जाती हैं। उच्चाटन तो वंशीरव में प्रमाणित ही है। अन्त:करणों का मोहित हो जाना मोहनत्व है। इस प्रकार मोहनत्व, वशीकरणत्व, स्तम्भत्व, आकर्षणत्व, उच्चाटनत्व एवं मारणत्व के गुणों से युक्त होने के कारण वंशीध्वनि महामंत्र स्वरूप है। इस महामन्त्रत्व का जादू गोपियों से विशेष रूप से सम्बन्धित है।

श्रीकृष्ण श्रीराधा के प्रगाढ़ मान को दूर करने के लिए षट्साधन सम्पन्न महामन्त्रस्वरूप वंशीध्वनि करने लगे।

इति श्रीजयदेवकृतौ श्रीगीतगोविन्दे खण्डितावर्णने विलक्ष्यलक्ष्मीपतिर्नामाष्टम: सर्ग:।


इस प्रकार श्रीजयदेव कवि प्रणीत गीतगोविन्द काव्य के खण्डिता नायिका वर्णन प्रसंग में विलक्ष्यलक्ष्मीपति नामक आठवें सर्ग की बालबोधिनी व्याख्या


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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गीत गोविन्द -श्रील जयदेव गोस्वामी
सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

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