हित हरिवंश गोस्वामी -ललिताचरण गोस्वामी पृ. 444

श्रीहित हरिवंश गोस्वामी:संप्रदाय और साहित्य -ललिताचरण गोस्वामी

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साहित्य
अर्वाचीन काल (1875)

हम कह चुके हैं कि भोलानाथ जी वृंदावन आने से पूर्व भी पद रचना करते थे और उनके उस काल के लगभग 600 पद लेखक को कौलारस से प्राप्‍त हुए है। इनमें से अधिकांश पद ‘विनय’ के हैं और इनमें एक सच्‍चे भक्‍त हृदय की महान आकुलता भरी हुई है। वृंदावन निवास-काल के पद अधिक प्रोढ़ और शांत है किंतु प्रेम की नै‍सर्गिक पीड़ा उनमें भी व्‍यक्‍त हुई है। राधावल्‍लभीय संप्रदाय में नित्‍य संयोग की उपासना है किंतु उसके साथ पूर्ण अतृप्ति भी विद्यमान रहती है। भोलानाथ जी के पदों में यह अतृप्ति उभर आई है और इसी ने उनके पदों में पीड़ा की गहरी छाया फैलादी है।

पद-रचना के अतिरिक्‍त भोलानाथ जी ने वृंदावन में दो बडे़ ग्रन्‍थों की भी रचना की जिनमें से एक ‘सुधर्म बोधिनी’ की बिपुल टीका है और दूसरा ब्रह्म सूत्र पर हिंदी में भाष्‍य है। उनके थोडे़ से पद यहाँ दिये जाते हैं।

ऐसी कृपा किन करहु किशोरी ।
उर में गडै़ मनोहर मूरति मंद हास मुख थोरी ।।

हियरा नन बान सौं बेधहु हँसि-हँसि भौंह मरोरी ।
घायल कर भटकावहु प्‍यारी, झूमत निधुबन खोरी ।।
जियरा टूक-टूक हृवै जावै, इतनौ माँगत भोरी ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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विषय पृष्ठ संख्या
चरित्र
श्री हरिवंश चरित्र के उपादान 10
सिद्धान्त
प्रमाण-ग्रन्थ 29
प्रमेय
प्रमेय 38
हित की रस-रूपता 50
द्विदल 58
विशुद्ध प्रेम का स्वरूप 69
प्रेम और रूप 78
हित वृन्‍दावन 82
हित-युगल 97
युगल-केलि (प्रेम-विहार) 100
श्‍याम-सुन्‍दर 13
श्रीराधा 125
राधा-चरण -प्राधान्‍य 135
सहचरी 140
श्री हित हरिवंश 153
उपासना-मार्ग
उपासना-मार्ग 162
परिचर्या 178
प्रकट-सेवा 181
भावना 186
नित्य-विहार 188
नाम 193
वाणी 199
साहित्य
सम्प्रदाय का साहित्य 207
श्रीहित हरिवंश काल 252
श्री धु्रवदास काल 308
श्री हित रूपलाल काल 369
अर्वाचीन काल 442
ब्रजभाषा-गद्य 456
संस्कृत साहित्य
संस्कृत साहित्य 468
अंतिम पृष्ठ 508

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