सनातन गोस्वामी

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सनातन गोस्वामी
सनातन गोस्वामी
पूरा नाम सनातन गोस्वामी
जन्म 1488 ई.
मृत्यु 1558 ई.
अभिभावक कुमारदेव (पिता), मुकुन्ददेव (पितामह)
कर्म भूमि वृन्दावन (मथुरा)
मुख्य रचनाएँ 'श्रीकृष्णलीलास्तव', 'वैष्णवतोषिणी', 'श्री बृहत भागवतामृत', 'हरिभक्तिविलास' तथा 'भक्तिरसामृतसिंधु' आदि की रचना की।
प्रसिद्धि सन्त, कृष्ण-भक्त
विशेष योगदान वृन्दावनधाम का पहला 'मदनमोहन जी मन्दिर' सनातन गोस्वामी ने ही स्थापित किया था, उसकी सेवा भी वे स्वयं करते थे।
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख चैतन्य महाप्रभु, रूप गोस्वामी, चैतन्य सम्प्रदाय, वैष्णव सम्प्रदाय, वृन्दावनदास ठाकुर, कृष्णदास कविराज, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
अन्य जानकारी सनातन ने भक्ति सिद्धान्त, वृन्दादेवी मन्दिर तथा श्रीविग्रह की स्थापना की तथा वैष्णव-स्मृति ग्रन्थ का संकलन कर वैष्णव सदाचार का प्रचार किया। वृन्दावन पहँचकर सनातन ने अपनी अंतरंग साधना के साथ महाप्रभु द्वारा निर्दिष्ट 'लीलातीर्थ उद्धार', 'कृष्ण-भक्ति प्रचार' और 'कृष्ण-विग्रह-प्रकाश' आदि का कार्य भी आरम्भ किया।

सनातन गोस्वामी (1488-1558 ई.) चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य थे। उन्होंने 'गौड़ीय वैष्णव भक्ति सम्प्रदाय' के अनेकों ग्रन्थों की रचना की थी। अपने भाई रूप गोस्वामी सहित वृन्दावन के छ: प्रभावशाली गोस्वामियों में वे सबसे ज्येष्ठ थे।

परिचय

सनातन गोस्वामी कर्णाट श्रेणीय पंचद्रविड़ भारद्वाज गोत्रीय यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। इनके पूर्वज कर्णाट राजवंश के थे और सर्वज्ञ के पुत्र रूपेश्वर बंगाल में आकर गंगा नदी के तट पर स्थित बारीसाल में बस गए। इनके पौत्र मुकुंददेव बंगाल के नवाब के दरबार में राजकर्मचारी नियत हुए तथा गौड़ के पास रामकेलि ग्राम में रहने लगे। इनके पुत्र कुमारदेव तीन पुत्रों अमरदेव, संतोषदेव तथा वल्लभ को छोड़कर युवावस्था ही में परलोक सिधार गए, जिससे मुकुंददेव ने तीनों पौत्रों का पालन कर उन्हें उचित शिक्षा दिलाई। इन्हीं तीनों को श्री चैतन्य महाप्रभु ने क्रमश: 'सनातन', 'रूप' तथा 'अनुपम' नाम दिया।

जन्मतिथि

सनातन गोस्वामी की जन्मतिथि के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ कहना सम्भव नहीं जान पड़ता। डा. दीनेशचन्द्र सेन ने उनका जन्म सन् 1492 में बताया है।[1] और भी कई विद्वानों ने डा. सेन का अनुसरण करते हुए उनका जन्म सन् 1492 या उसके आस-पास बताया। पर डा. सतीशचन्द्र मित्र ने उनका जन्म सन् 1465 (सं0 1522) में लिखा हैं। यही ठीक जान पड़ता है, क्योंकि महाप्रभु जब रामकेलि गये, उस समय सनातन गोस्वामी हुसैनशाह के प्रधानमन्त्री थे। महाप्रभु की आयु उस समय 28/29 वर्ष की थी। महाप्रभु का आविर्भाव हुआ 1486 में। वे रामकेलि गये सन्न्यास के पंचम वर्ष सन् 1514 या 1515 में। इस हिसाब से सनातन गोस्वामी की आयु डा. सेन के मत के अनुसार उस समय 23 वर्ष की होती। रामकेलि में महाप्रभु से मिलने के कई वर्ष पूर्व वे प्रधानमन्त्री हुए होंगे।[2] उस समय उनकी आयु केवल 18/19 वर्ष की या उससे कम होगी और रूप गोस्वामी की उससे भी कम, जो विश्वास करने योग्य नहीं। यदि उनका जन्म मित्र महाशय के अनुसार सन् 1465 में माना जाय, तो उनकी उम्र रामकेलि में महाप्रभु से उनके मिलने के समय 49।50 की होती है, जो प्रधानमन्त्री पद के लिए ठीक लगती है।

शिक्षा

सनातन गोस्वामी के पितामह मुकुन्ददेव दीर्घकाल से गौड़ राज्य में किसी उच्च पद पर आसीन थे। वे रामकेलि में रहते थे। उनके पुत्र श्रीकुमार देव बाकलाचन्द्र द्वीप में रहते थे। कुमारदेव के देहावसान के पश्चात मुकुन्ददेव श्रीरूप-सनातन आदि को रामकेलि ले आये। उन्होंने रूप-सनातन की शिक्षा की सुव्यवस्था की। उन्हें प्रारम्भिक शिक्षा दिलायी रामभद्र वाणीविलास नामक एक पंडित से। उसके पश्चात उन्हें भेज दिया नवद्वीप, जो उस समय शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र था। वहाँ कुछ दिन प्रसिद्ध नैयायिक श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य से न्याय-शास्त्र की शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात वे उनके छोटे भाई विद्यावाचस्पति[3] की टोल में पढ़ने लगे। विभिन्न भाषाओं और शास्त्रों के अध्ययन में तत्पर रहते हुए भी सनातन गोस्वामी प्रारम्भ से ही श्रीमद्भागवत में विशेष रुचि रखते थे। श्रीजीव गोस्वामी ने लघुवैष्णवतोषणी के अन्त में दी हुई। वंशपरिचायिका में उल्लेख किया है कि उन्हें बाल्यावस्था में स्वप्न में एक ब्राह्मण द्वारा श्रीमद्भागवत की एक प्रति प्राप्त हुई थी और प्रभात होने पर उसी ब्राह्मण ने वही प्रति उन्हें भेंट की थी। तभी से वे नियमित रूप से श्रीमद्भागवत का पाठ किया करते थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. D.C. Sen: The Vaisnava Literature of Medieval Bengal P.29.
  2. भक्तिरत्नाकर में उल्लेख है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने सन्न्यास के पूर्व ही (अर्थात् सन् 1510 के पूर्व) रूप-सनातन की मन्त्री रूप में ख्याति सुनी थी (भक्ति रत्नाकर 1/364-383)।
  3. डा. दीनेशचन्द्र भट्टाचार्य ने सिद्धि किया है कि उनका प्रकृत नाम था विष्णुदास भट्टाचार्य (साहित्य परिषद पत्रिका, वर्ष 56 3य-4र्थ संख्या पृ0 66-81

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