ज्ञानेश्वरी पृ. 107

श्रीज्ञानेश्वरी -संत ज्ञानेश्वर

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अध्याय-4
ज्ञानकर्म संन्यास योग


किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता: ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥16॥

कर्म क्या है और अकर्म के लक्षण क्या हैं, इस बात का विचार करते-करते बुद्धिमान् लोग भी चकरा गये हैं। जैसे नकली सिक्के देखने में असली सिक्कों की ही भाँति प्रतीत होते हैं और परीक्षक को भी भ्रमित कर देते हैं, वैसे ही इस प्रकार के उद्भट महापुरुषों के कर्म भी, जो संकल्प मात्र से एक दूसरी ही सृष्टि तक का सृजन कर सकते हैं, निष्कामता की झूठी परिकल्पना के चक्कर में पड़कर अन्ततः सकाम ही सिद्ध हुए हैं अर्थात् इस भ्रम के कारण कर्मबन्धनरूप पाश में जकड़े जाते हैं। इस विषय में विचार करते समय जब बड़े-बड़े ज्ञानिजन भी धोखा खा गये हैं अर्थात् मूढ़ बने हैं तो फिर मूर्खों की बात ही क्या है? इसलिये मैं यह विषय स्पष्ट रूप से तुम्हें बतलाता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो।[1]


कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण: ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ॥17॥

जिसके द्वारा सहज में ही इस विश्व की सृष्टि होती है, उसी को ‘कर्म’ कहना चाहिये। सर्वप्रथम वह सहज कर्म अच्छी तरह से जान लेना चाहिये फिर ठीक तरह से यह भी जान लेना चाहिये कि शास्त्रों में बतलाये हुए वे कौन-से ‘विहित कर्म’ हैं जो हमारे वर्णाश्रम के लिये बहुत ही उपयुक्त कहे गये हैं और उनका उपयोग क्या है? फिर जिन कर्मों को निषिद्ध कर्म कहा गया है, उन सब कर्मों के भी स्वरूप को भली-भाँति समझ लेना चाहिये। इतना करने से इसका फल यह होगा कि हम भ्रम से अपने-आपको बचा लेंगे इसमें हम कर्मबन्धन से मुक्त हो जायँगे। वास्तव में यह सारा संसार कर्म के अधीन है और इसकी व्याप्ति अत्यन्त ही गहन है; परन्तु हे अर्जुन! यह रहने दो अब कृतकृत्य पुरुष के लक्षण सुनो।[2]

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. (85-88)
  2. (89-92)

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क्रम संख्या विषय पृष्ठ संख्या
पहला अर्जुन विषाद योग 1
दूसरा सांख्य योग 28
तीसरा कर्म योग 72
चौथा ज्ञान कर्म संन्यास योग 99
पाँचवाँ कर्म संन्यास योग 124
छठा आत्म-संयम योग 144
सातवाँ ज्ञान-विज्ञान योग 189
आठवाँ अक्षर ब्रह्म योग 215
नवाँ राज विद्याराज गुह्य योग 242
दसवाँ विभूति योग 296
ग्यारहवाँ विश्व रूप दर्शन योग 330
बारहवाँ भक्ति योग 400
तेरहवाँ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग 422
चौदहवाँ गुणत्रय विभाग योग 515
पंद्रहवाँ पुरुषोत्तम योग 552
सोलहवाँ दैवासुर सम्पद्वि भाग योग 604
सत्रहवाँ श्रद्धात्रय विभाग योग 646
अठारहवाँ मोक्ष संन्यास योग 681

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