अम्बा की कठोर तपस्या

भीष्म और परशुराम जी के बीच जो बहुत दिनों से युद्ध चल रहा हैं, वह नारद, ऋषिओं तथा माता गंगा द्वारा दोनों को समझाने पर समाप्त हो जाता हैं, अब परशुराम जी अम्बा से कहते हैं कि 'मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की परंतु मैं भीष्म को पराजित नहीं कर सका अत: अम्बा तुम अब भीष्म के पास चली जाओ' यह सुनकर अम्बा बोली कि 'मैं भीष्म के पास पुन: वापिस नहीं जाऊँगी बल्कि स्वयं ऐसी बन जाऊँगी जिससे कि मैं भीष्म को मार सकूँ ऐसा कहकर अम्बा कठोर तपस्या का दृढ़ निश्चय करके वहाँ से चली जाती हैं', जिसका उल्लेख महाभारत उद्योग पर्व में अम्बोपाख्‍यान पर्व के अंतर्गत 186वें अध्याय में हुआ है, जो इस प्रकार है-[1]

परशुराम द्वारा अम्बा को समझाना

परशुराम बोले- भाविनी! यह सब लोगों ने प्रत्यक्ष देखा है कि मैंने तेरे लिये पूरी शक्ति लगाकर युद्ध किया और महान पुरुषार्थ दिखाया है। परंतु इस प्रकार उत्तमोत्तम अस्त्र प्रकट करके भी मैं शस्त्रधारियों में श्रेष्‍ठ भीष्‍म से अपनी अधिक विशिष्‍टता नहीं दिखा सका मेरी अधिक-से-‍अधिक शक्ति, अधिक-से-अधिक बल इतना ही है। भद्रे! अब तेरी जहाँ इच्छा हो, चली जा, अथवा बता, तेरा दूसरा कौन-सा कार्य सिद्ध करूं? अब तू भीष्‍म की ही शरण ले। तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं हैं क्योंकि महान अस्त्रों का प्रयोग करके भीष्‍म ने मुझे जीत लिया है। ऐसा कहकर महामना परशुराम लंबी सांस खींचते हुए मौन हो गये।

अम्बा द्वारा भीष्म के पास न जाने का निर्णय

तब राजकन्या अम्बा ने उन भृगुनन्दन से कहा- ‘भगवन! आपका कहना ठीक है। वास्तव में ये उदारबुद्धि भीष्‍म युद्ध में देवताओं के लिये भी अजेय है। ‘आपने अपनी पूरी शक्ति लगाकर पूर्ण उत्साह के साथ मेरा कार्य किया है। युद्ध में ऐसा पराक्रम दिखाया है, जिसे भीष्‍म के सिवा दूसरा कोई रोक नहीं सकता था। इसी प्रकार आपने नाना प्रकार के दिव्यास्त्र भी प्र‍कट किये हैं। ‘परंतु अन्ततोगत्वा आप युद्ध में उनकी अपेक्षा अपनी विशेष्‍यता स्थापित न कर सके। मैं भी अब किसी प्रकार पुन: भीष्‍म के पास नहीं जाऊंगी। ‘भृगुश्रेष्‍ठ तपोधन! अब मैं वहीं जाऊंगी, जहाँ ऐसा बन सकूं कि समरभूमि में स्वयं ही भीष्‍म को मार गिराऊं। ऐसा कहकर रोष भरे नेत्रों वाली वह राजकन्या मेरे वध के उपाय का चिन्तन करती हुई तपस्या के लिये दृढ़ संकल्प लेकर वहाँ से चली गयी।

भीष्म द्वारा वापिस हस्तिनापुर जाना

भारत! तदनन्तर भृगुश्रेष्‍ठ परशुरामजी उन महर्षियों के साथ मुझ से विदा लेकर जैसे आये थे, वैसे ही महेन्द्र पर्वत पर चले गये। महाराज! तत्पश्‍चात मैंने भी ब्राह्मण के मुख से अपनी प्रशंसा सुनते हुए रथ पर आरूढ़ हो हस्तिनापुर में आकर माता सत्यवती से सब समाचार यथा‍र्थ रूप से निवेदन किया। माता ने भी मेरा अभिनन्दन किया। इसके बाद मैंने कुछ बुद्धिमान पुरुषों को उस कन्या के वृत्तान्त का पता लगाने के कार्य में नियुक्त कर दिया। मेरे लगाये हुए गुप्तचर सदा मेरे प्रिय एवं हित में संलग्न रहने वाले थे। वे प्रतिदिन उस कन्या की गतिविधि, बोलचाल और चेष्‍टा का समाचार मेरे पास पहुँचाया करते थे। जिस दिन वह कन्या तपस्या का निश्‍चय करके वन में गयी, उसी दिन मैं व्यथित, दीन और अचेत-सा हो गया। तात! जो तपस्या के द्वारा कठोर व्रत का पालन करने वाले हैं, उन ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण परशुरामजी को छोड़कर कोई भी क्षत्रिय अब तक युद्ध में मुझे पराजित नहीं कर सका है।

अम्बा द्वारा कठोर तपस्या करना

राजन! मैंने यह वृत्तान्त देवर्षि नारद और महर्षि व्यास से भी निवेदन किया था। उस समय उन दोनों ने मुझसे कहा- ‘भीष्‍म! तुम्हें काशिराज की कन्या के विषय में तनिक भी विषाद नहीं करना चाहिये। दैव के विधान को पुरुषार्थ के द्वारा कौन टाल सकता है?’ महाराज! फिर उस कन्या ने आश्रममण्‍डल में पहुँचकर यमुना के तट का आश्रय ले ऐसी कठोर तपस्या की, जो मानवीय शक्ति से परे है। उसने भोजन छोड़ दिया, वह दुबली तथा रुक्ष हो गयी। सिर पर केशों की जटा बन गयी। शरीर में मैल और कीचड़ जम गयी। वह तपोधना कन्या छ: महीनों तक केवल वायु पीकर ठूँठे काठ की भाँति निश्चल भाव से खड़ी रही। फिर एक वर्ष तक यमुनाजी के जल में घुसकर बिना कुछ खाये-पीये वह भाविनी राजकन्या जल में ही र‍हकर तपस्या करती रही।[1] तत्पश्‍चात तीव्र क्रोध से युक्त हुई अम्बा ने पैर के अंगूठे के अग्रभाग पर खड़ी होकर अपने-आप झड़कर गिरा हुआ केवल एक सूखा पत्ता खाकर एक वर्ष व्यतीत किया इस प्रकार बारह वर्षों तक कठोर तपस्या में संलग्न हो उसने पृथ्‍वी और आकाश को संतप्त कर दिया। उसके जाति वालों ने आकर उसे उस कठोर व्रत से निवृत्त करने की चेष्‍टा की परंतु उन्हें सफलता न मिल सकी।[2]

तदनन्तर वह सिद्धों और चरणों द्वारा सेवित वत्स देश की भूमि में गयी और वहाँ पुण्‍यशील तपस्वी महात्माओं के आश्रमों में विचरने लगी। काशिराज की वह कन्या दिन-रात वहाँ के पुण्‍य तीर्थों में स्नान करती और अपनी इच्छा के अनुसार सर्वत्र विचरती रहती थी। महाराज! शुभकारक नन्दाश्रम, उलूकाश्रम च्यवनाश्रम, ब्रह्मस्थान, देवताओं के यज्ञस्थान प्रयाग, देवराण्‍य, भोगवती, कौशिकाश्रम, माण्डव्याश्रम, दिलीपाश्रम, रामहृद और पैलगर्गाश्रम -क्रमश: इन सभी तीर्थों में उन दिनों काशिराज की कन्या ने कठोर व्रत का आश्रय ले स्नान किया।

अम्बा तथा गंगा का संवाद

कुरुनन्दन! उस समय मेरी माता गंगा ने जल में प्रकट होकर अम्बा से कहा- ‘भद्रे! तू किस लिये शरीर को इतना क्लेश देती हैं। मुझे ठीक-ठीक बता।' राजन! तब साध्‍वी अम्बा ने हाथ जोड़कर गंगा जी से कहा- ‘चारूलोचने! भीष्‍म ने युद्ध में परशुरामजी को परास्त कर दिया फिर दूसरा कौन ऐसा राजा है, जो धनुष-बाण लेकर खडे़ हुए भीष्‍म को युद्ध में परास्त कर सके? अत: मैं भीष्‍म के विनाश के लिये अत्यन्त कठोर तपस्या कर रही हूँ। ‘देवि! मैं इस भूतलपर विभिन्न तीर्थों में इसलिये विचर रही हूँ कि योग्य बनकर मैं स्वयं ही भीष्‍म को मार सकू। भगवति! इस जगत में मेरे व्रत और तपस्या का यही सर्वोत्तम फल है, जैसा मैंने आपको बताया है।' तू कुटिल आचरण कर रही है। सुन्दर अंगोंवाली अबले! तेरा यह मनोरथ कभी पूर्ण नहीं हो सकता। ‘काशिराजकन्ये! यदि भीष्‍म के विनाश के लिये तू प्रयत्न कर रही है और व्रत में स्थित रहकर ही यदि तू अपना शरीर छोडे़गी तो शुभे! तुझे टेढ़ी-मेढ़ी नहीं होना पड़ेगा। केवल बरसात में ही तेरे भीतर जल दिखायी देगा। तेरे भीतर तीर्थ या स्नान की सुविधा बड़ी कठिनाई से होगी। तू केवल बरसात की नदी समझी जायगी। शेष आठ महीनों में तेरा पता नहीं लगेगा। ‘बरसात में भी भयंकर ग्राहों से भरी रहने के कारण तू समस्त प्राणियों के लिये अत्यन्त भयंकर और घोरस्वरूपा बनी रहेगी।’ राजन! काशिराज की कन्या से ऐसा कहकर मेरी परम सौभाग्यशालिनी माता गंगा देवी मुस्कराती हुई लौट गयीं।

अम्बा का अम्बा नदी से प्रसिद्ध होना

तदनन्तर वह सुन्दरी कन्या पुन: कठोर तपस्या में प्रवृत्त हो कभी आठवें और कभी दसवें महीने तक जल भी नहीं पीती थी। कुरुनन्दन! काशिराज की वह कन्या तीर्थ सेवन के लोभ से वत्सदेश की भूमि पर इधर-उधर दौड़ती फिरती थी। भारत! कुछ काल के पश्‍चात वह वत्सदेश की भूमि में अम्बा नाम से प्रसिद्ध नदी हुई, जो केवल बरसात में जल से भरी रहती थी। उसमें बहुत-से ग्राह निवास करते थे। उसके भीतर उतरना और स्नान आदि तीर्थकृत्यों का सम्पादन बहुत ही कठिन था। वह नदी टेढ़ी-मेढ़ी होकर बहती थी। राजन! राजकन्या अम्बा उस तपस्या के प्रभाव से आधे शरीर से तो अम्बा नाम की नदी हो गयी और आधे अंग से वत्सदेश में ही एक कन्या होकर प्रकट हुई।[2]

टीका टिप्पणी व संदर्भ

  1. 1.0 1.1 महाभारत उद्योग पर्व अध्याय 186 श्लोक 1-21
  2. 2.0 2.1 महाभारत उद्योग पर्व अध्याय 186 श्लोक 22-41

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प्रजागर पर्व
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सनत्सुजात पर्व
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भगवद्यान पर्व
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सैन्यनिर्याणपर्व
पांडवपक्ष के सेनापति का चुनाव | पांडव सेना का कुरुक्षेत्र में प्रवेश | कुरुक्षेत्र में पांडव सेना का पड़ाव तथा शिविर निर्माण | दुर्योधन द्वारा सेना को सुसज्जित होने और शिविर निर्माण का आदेश | कृष्ण का युधिष्ठिर से युद्ध को ही कर्तव्य बताना | युधिष्ठिर का संताप और अर्जुन द्वारा कृष्ण के वचनों का समर्थन | दुर्योधन द्वारा सेनाओं का विभाजन और सेनापतियों का अभिषेक | दुर्योधन द्वारा भीष्म का सेनापति पद पर अभिषेक | युधिष्ठिर द्वारा अपने सेनापतियों का अभिषेक | बलराम का पांडव शिविर में आगमन और तीर्थयात्रा के लिए प्रस्थान | रुक्मी का सहायता हेतु पांडवों और कौरवों के पास आगमन | धृतराष्ट्र और संजय का संवाद

उलूकदूतागमनपर्व
दुर्योधन का उलूक को दूत बनाकर पांडवों के पास भेजना | पांडव शिविर में उलूक द्वारा दुर्योधन का संदेश सुनाना | पांडवों की ओर से दुर्योधन को उसके संदेश का उत्तर | पंडवों का संदेश लेकर उलूक का लौटना | धृष्टद्युम्न द्वारा योद्धाओं की नियुक्ति

रथातिरथसंख्यानपर्व
भीष्म द्वारा कौरव पक्ष के रथियों और अतिरथियों का परिचय | कौरव पक्ष के रथियों का परिचय | कौरव पक्ष के रथी, महारथी और अतिरथियों का वर्णन | कर्ण और भीष्म का रोषपूर्वक संवाद | भीष्म द्वारा पांडव पक्ष के रथी और उनकी महिमा का वर्णन | पांडव पक्ष के महारथियों का वर्णन तथा विराट और द्रुपद की प्रशंसा | पांडव पक्ष के रथी, महारथी एवं अतिरथी आदि का वर्णन | भीष्म का शिखण्डी और पांडवों का वध न करने का कथन

अम्बोपाख्यानपर्व
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