सती हियैं धरि सिव कौ ध्यान -सूरदास

सूरसागर

चतुर्थ स्कन्ध

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राग बिलावल
पार्वती-विवाह



सती हियैं धरि सिव कौ ध्यान। दच्छ-जज्ञ मै छाँड़े प्रान।
बहुरि हिमाचल कैं सुभ घरो। पारड्रती ह्वै सो अवतरी।
पारबती बय-प्रापत भई। तबहिं हिमाचल तासौं कही।
तेरौ कासौं कीजै ब्याह? तिन कह्यौ, मेरौ पति सिव आह।
कह्यौ हिमाचल, सिव प्रभु ईस। हमसौं-उनसौं केसी रीस।
पारवती सिव-हित तप करयौ। तब सिव आइ तहाँ, तिहिं बसौ।
पारबती-बिवाह व्यवहार। सूर कह्यौ भागवतऽनुसार।।7।।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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