संतनि की संगति नित करै -सूरदास

सूरसागर

तृतीय स्कन्ध

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राग बिलावल
भगवान का ध्यान्



संतनि की संगति नित करै। पापकर्म मन तैं परिहरै।
अरु भोजन सो इहिं बिधि करै। आबौ उदर अन्न सौं भरै।
आधै मैं जल वायु समावै। तब तिहिं आलस कवहुँ न आवै।
अरु जो परालब्ध सौं आवै। ताही कौं सुख सौं बरतावै।
बहुतै कौ उद्यम परिहरै। निर्भय ठौर बसेरौ करै।
तोरथ हू मैं जौ भय होइ। ताहू ठाउँ परिहरै सोइ।
बहुरौ धरै हृदय महँ ध्यान। रूप चतुरभुज स्याम सुजान।
प्रथमौं चरन-कमल कौं ध्यावै। तासु महातम मन मैं ल्यावै।
गंगा प्रगट इनहिं तै भई। सिब सिवता इनहीं तैं लई।
लछमी इनकौं सदा पलोवै। बारंबार प्रीति करि जोवै।
जंधनि कौं कदली सम जानै। अथवा कनकखंभ सम मानै।
उर अरु ग्रीव बढुरि हिय घारै। तापर कौस्तुभ भनिहिं बिचारै।
तहँ भृगु लता, लच्छमो जान। नाभि कमल चित धारै ध्यान।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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