रिषभदेव जब बन कौं गए -सूरदास

सूरसागर

पंचम स्कन्ध

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राग बिलावल
जड़भरत-कथा



हरि-हरि,हरि-हरि, सुमिरन करौ। हरि चरनारविंद उर धरौ।
रिषभदेव जब बन कौं गए। नव सुत नवौ-खंड-नृप भए।
भरत सो भरत-खंड कौ राव। करैं सदाही धर्मऽरु न्याव।
पालै प्रजा सुतनि की नाई। पुरजन बसैं सदा सुख पाई।
भरतहु दै पुत्रनि कौं राज। गए बन कौं तजि राज-समाज।
तहाँ करी नृप हरि की सेव। भए प्रसन्न देवनि के देव।
एक दिवस गंडकि-तट जाइ। करन लगे सुमिरन चित लाइ।
गर्भवती हिरनी तहँ आई। पानी सो पीवन नहिं पाई।
सुनि कै सिंह भयान आवाज। मारि फलाँग चली सो भाज।
कूदत ताकौ तन छुटि गयौ। ताके छौना सुंदर भयौ।
भरत दया ता ऊपर आई। ल्याए आस्रम ताहि लिवाई।
पोषैं ताहि पुत्र कौ नाई। खाहिं आप तब, ताहि खवाई।
सोवैं तब जब वाहि सुवावैं। तासौं क्रीड़त बहु सुख पावै।
सुमिरन भजन विसरि सब गयौ। इक दिन मृगछौना कहुँ गयौ।
भरत मोह-बस ताकैं भयौ। सब दिन बिरह अगिनि अति तयौ।
संध्या समय निकट नहिं आयौ। ताकै ढूँढ़न कौ उठि धायौ।
पग कौ चिन्ह पृथी पर देख। कहयौ, पृथी धनि जहँ पग-रेख।
बहुरौ देख्यौ ससि की ओर। तामैं देखि स्यामता-कोर।
कहन लग्यौ मम सुत ससि-गोद। ता सेती ससि करत बिनोद।
ढूँढ़त-ढूँढ़त बहु स्रम पायौ। पै मृगछौना नहिं दरसायौ।
मृग को ध्यान हृदय रहि गयौ। भरत देह तजि कै मृग भयौ।
पूरब जनम ताहि सुधि रही। आप आप सौं तब यौं कही।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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