भक्त सकामी हुँ जो होइ -सूरदास

सूरसागर

तृतीय स्कन्ध

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राग बिलावल
भक्त महिमा



भक्त सकामी हुँ जो होइ। क्रम-क्रम करिकै उधरै सोइ।
सनै-सनै बिधि-लोकहिं जाइ। ब्रह्मा-सँग हरि-पदहिं समाइ।
निष्कामी बैकुंठ सिघाबै। जनम-मरन तिहिं बहुरि न आवै।
त्रिविध भक्ति कहौं सुनि अब सौइ। जातै हरि-पद प्रापति होइ।
एकै कर्म-जोग कौं करैं। बरन-आसरम घर बिस्तरै।
अरु खधर्म कवहूँ नहिं करै। ते नर याही बिधि निस्तरै।
एकै मक्ति जोग को करें। हरि-सुमिरन पूजा विस्तरें।
हरि-पद-पंकज प्रीति लगावै। ते हरि-पद कौं या बिधि पावै।
एकै ज्ञान-जोग बिस्तारै। ब्रह्म जानि हरि-पदहि समावै।
कपिखदेव बहुरौ यौ कह्यौ। हमैं तुम्हैं संवाद जु भयौ।
कखिजुग मैं यह सुनि है जोइ। सो नर हरि-पद प्रापत होइ।
देवहूति सुज्ञान कौं पाइ। कपिलदेव सौं कह्यौ गिर नाइ।
आगैं मैं तुमकौं सुत मान्यौ। अब मैं तुमकौं इश्वर जान्या।
तुम्हरी कृपा भयौ मौहिं ज्ञान। अब न ब्यापिहै मोहि अज्ञान।
पुनि बन जाइ कियौ तन-त्याग। गहि कै हरि-पद सौं अनुराग।
कपिलदेव सांख्यहिं जो गायौ। सो राजा मैं तुम्हैं सुनायौ।
याहि समुझि जो रहै लव लाइ। सूर बसै सो हरिपुर जाइ।।13।।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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