भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद

भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद
स्वामी प्रभुपाद
पूरा नाम अभय चरणारविन्द भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद
अन्य नाम अभय चरणारविन्द, अभय चरण डे, प्रभुपाद
जन्म 1 सितम्बर, 1896
जन्म भूमि कोलकाता, पश्चिम बंगाल
मृत्यु 14 नवम्बर, 1977
मृत्यु स्थान वृन्दावन, उत्तर प्रदेश
अभिभावक पिता- गौर मोहन डे, माता- रजनी
गुरु श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी
कर्म भूमि भारत
भाषा हिन्दी, अंग्रेज़ी, बांग्ला
प्रसिद्धि कृष्ण भक्त
विशेष योगदान आपने अंग्रेज़ी के माध्यम से वैदिक ज्ञान के प्रसार के लिए "इस्कॉन" (ISKCON) को स्थापित किया और कई वैष्णव धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन और संपादन किया।
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख श्रीकृष्ण, इस्कॉन मंदिर, मथुरा, वृन्दावन
अन्य जानकारी श्रील प्रभुपाद के ग्रंथों की प्रामाणिकता, गहराई और उनमें झलकता उनका अध्ययन अत्यंत मान्य है। कृष्ण को सृष्टि के सर्वेसर्वा के रूप में स्थापित करना और अनुयायियों के मुख पर "हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे" का उच्चारण सदैव रखने की प्रथा इनके द्वारा स्थापित हुई।

अभय चरणारविन्द भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद (अंग्रेज़ी: Abhay Charanaravinda Bhaktivedanta Swami Prabhupada ; जन्म- 1 सितम्बर, 1896, कोलकाता, पश्चिम बंगाल; मृत्यु- 14 नवम्बर, 1977, वृन्दावन, उत्तर प्रदेश) प्रसिद्ध गौड़ीय वैष्णव गुरु तथा धर्मप्रचारक थे। वेदान्त, कृष्ण भक्ति और इससे संबंधित क्षेत्रों पर आपने विचार रखे और कृष्णभावना को पश्चिमी जगत में पहुँचाने का कार्य किया। ये भक्तिसिद्धांत ठाकुर सरस्वती के शिष्य थे, जिन्होंने इनको अंग्रेज़ी के माध्यम से वैदिक ज्ञान के प्रसार के लिए प्रेरित और उत्साहित किया। स्वामी प्रभुपाद ने "इस्कॉन" (ISKCON) को स्थापित किया और कई वैष्णव धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन और संपादन किया।

परिचय

स्वामी प्रभुपाद का जन्म 1896 ईं. में भारत के कोलकाता नगर में हुआ था। इनके बचपन का नाम अभय चरण था। पिता का नाम 'गौर मोहन डे' और माता का नाम 'रजनी' था। इनके पिता एक कपड़ा व्यापारी थे। उनका घर उत्तरी कोलकाता में 151, हैरिसन मार्ग पर स्थित था। गौर मोहन डे ने अपने बेटे अभय चरण का पालन पोषण एक कृष्ण भक्त के रूप में किया। अभय चरण ने 1922 में अपने गुरु महाराज श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी से भेंट की। इसके ग्यारह वर्ष बाद 1933 में वे प्रयाग में उनके विधिवत दीक्षा प्राप्त शिष्य हो गए।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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