बलि बलि जाऊँ सुभग कपोलनि -सूरदास

सूरसागर

1.परिशिष्ट

Prev.png
ब्रज-प्रवेश-शोभा




बलि बलि जाऊँ सुभग कपोलनि।
गोरज सोभित अलकावृत मुख कूल कलिंदसुता बन डोलनि।।
नैन बिसाल बंक भृकुटी, तन अतिसी कुसुम, सुपीत निचोलनि।।
दामिनि दसन समान उवै रवि मकराकृत कुंडल छवि लोलनि।।
अधर मुरलि धरि, मुद्रिकानिकर, बोलत धेनु मधुर सुर बोलनि।
बच्छ सुचिन्ह प्रकास मुद्रिका गुंजा, मनि आभूष अमोलनि।।
सरनागत जन अभय कमल कर बंद कपाट हृदय की खोलनि।
'सूरदास' करत पुन्य पुंज सब चरन ललित अहि बोलनि।। 30 ।।

Next.png

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                                 अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र    अः