ध्रुव विसाता-बचन सुनि रिसायौ -सूरदास

सूरसागर

चतुर्थ स्कन्ध

Prev.png
राग आसावरी
संक्षिप्त ध्रुव-कथा



ध्रुव विसाता-वचन सुनि रिसायौ।
दीन के द्याल गोपाल,करूनामयी मानु सौं सुनि, तुरत सरन आयौ।
बहुरि जब बन चल्यौ,पंथ नारद मिल्यौ, कृष्न-निज-धाम मथुरा बतायौ।
मुकुट सिर धरैं, बनमाल कौस्तुभ गरे, चतुर्भुज स्याम, सुंदरहिं ध्यायौ।
भए अनुकूल हरि, दियौ तिहि, तुरत बर, जगत करि राजपद अटल पायौ।
सूर के प्रभू की सरन आयौ जो नर, करि जगत भोग बैकुँठ सिधायौ।।10।।

Next.png

टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख