गज-मोचन ज्यौं भयौ अवतार -सूरदास

सूरसागर

अष्टम स्कन्ध

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राग-बिलाबल
गज-मोचन अवतार



गज-मोचन ज्यौं भयौ अवतार। कहौं, सेनौ सो अब चित धार।
गंध्रव एक नदी मै जाइ। देपल रिषि कौं पकरयौ पाइ।
देवल कह्मौ, ग्राह तू होहि। कह्मौ गंधर्व दया करि मोहिं।
जब गजेंद्र कौ पग तू गैहै। हरि जू ताकौ आनि छुटैहै।
भऐं अस्पर्स देव -तन धरिहै। मेरौ कह्मौ नाहिं यह टरिहै।
राजा इंद्रधुम्न कियौ ध्यान। आए अगस्त्य, नहीं तिन जान।
दियौ साप गजेंद्र तू होहि। कह्मौ नृप, दया करौ रिषि मोहि।
कह्मो, तोहिं ग्राह आनि जब गैहै। तू नारायन सुमिरन कैहै।
याही विधि तेरी गति होइ। भयौ त्रिकूट पर्वत गज सोइ।
कालहिं पाइ ग्राह गज गह्मौ । गज बल करि-करिकै थकि रह्मौ।
सुत पत्नीहू बल करि रहे। छूटयौ नहीं ग्राह के गहे।
ते सब भखे, दुःखित भए। गज कौ मो छाँडि़ उठ गए।
तब गज हरि कौ सरनहि आयौ। सूरदास प्रभु ताहि छुड़ायौ ।।2।।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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