खेलत श्याम ग्वालनि संग -सूरदास

सूरसागर

दशम स्कन्ध

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राग रामकली
क्रीड़न



खेलत श्याम ग्वालनि संग।
सुबल हलधर अरु श्रीदामा, करत नाना रंग।
हाथ तारी देत भाजत, सबै करि करि होड़।
बरजै हलधर, स्याम, तुम जनि चोट लागै मोड़।
तब कह्यौ मैं दौरि जानत, बहुत बल मो गात।
मेरी जोरी है श्रीदामा, हाथ मारे जात।
उठे बोलि तबै श्रीदामा, जाहु तारी मारि।
आगैं हरि पाछे, श्रीदामा, धरयौ स्याम हंकारि।
जानिकै मैं रह्यौ ठाढौ़, छुवत कहा जु मोहि।
सूर हरि खीझत सखा सौं, मनहिं कीन्हौ कोह।।213।।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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