कहौं सो कथा, सुनौ चित लाइ -सूरदास

सूरसागर

नवम स्कन्ध

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राग भैरो
श्री गंगा आगमन


 
सुकदेव कह्मौ, सुनौ नर-नाह। गंगा ज्यौं आई जग माहँ।
कहौं सो कथा, सुनौ चित लाइ। सुनै सो भवतरि हरि-पुर जाइ।
सौवौ जज्ञ सगर जब ठयौ। इंद्र अस्व कौ हरि लै गयौ।
कपिलास्रम लै ताके राख्यौ। सगर-सुतन तब नृप सौं भाष्यौ।
हम तिहुँ लोक माहिं फिरि आए। अस्व-खोज कतहूँ नहिं पाए।
आज्ञा होइ जाहिं पाताल। जाहू, तिन्है भाष्यौ भूपाल।
तिनके खोदै सागर भए। कपिलास्रम कौ ते पुनि गए।
अस्व देखि कह्मौ, धावहु धावहु। भागि जाहि मति, बिलंब न लावहु।
कपिल कुलाहल सुनि अकुलायौ। कोप-दृष्टि करि तिन्है जरायौ।
सगर नृपति जब यह सुधि पाई। अंसुमान को दियौ पठाई।
कपिल-स्तुति तिन बहुबिधि कीन्ही। कपिल ताहि यह आज्ञा दीन्हीं।
जज्ञ के हेतु अस्व यह लेहु पितर तुम्हारे भए जु खेहु।
सुरसरि जब भुव ऊपर आवै। उनकौ अपनौ जल परसावै।
तबहीं उन सबकी गति होह। ता बिन और उपाइ न कोइ।
अंसुमान राजा ढिग आइ। साठि सहस की कथा सुनाइ।
घोरा सगर राइ कौ दयौ। हर्ष-विषाद हृदय अति भयौ।
सगर राज मष पूरन कियौ। राज सो अंसुमान को दियौ।
अंसुमान पुनि राज बिहाइ। गंगा हेत कियो तप जाइ।
याही बिधि दिलीप तप कीन्हौ। पै गंगा जूव र नहिं दीन्हौ।
बहुरि भगीरथ तप बहु कियौ ।तब गंगा जू दरसन दियौ।
कह्मौ, मनोराति तेरौ करौ। पै मै जब अकास तै परौ।
मोको कौन धारना करै। नृप कह्मौ, संकर तुमकौ धरै।
नब नृप सिव की सेवा कीनी। सिव प्रसन्न ह्नै आज्ञा दीनी।
गंगा सौं नृप जाइ सुनाई। तब गंगा भूतल पर आई।
साठ सहस्र सगर के पुत्र। कीने सुरसरि तुरत पवित्र।
गंग प्रवाह माहिं जो न्हाइ। सो पवित्र ह्वै हरिपुर जाइ।
गंगा इहिं विधि भुव पर आई। नृप मैं तुमसौं भाषि सुनाई।
सुक नृप सौं ज्यौं कहि समुझायौ। सूरदास त्यौंही कहि गायौ।।9।।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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