अर्जुन को ब्रह्मशिर अस्त्र की प्राप्ति

महाभारत आदि पर्व के ‘सम्भव पर्व’ के अंतर्गत अध्याय 132 के अनुसार अर्जुन को ब्रह्मशिर अस्त्र की प्राप्ति की कथा का वर्णन इस प्रकार है।[1]-

अर्जुन को द्रोण द्वारा ब्रह्मशिर अस्त्र की प्राप्ति

तब द्रोणाचार्य ने महारथी महात्‍मा अर्जुन से कहा-। ‘महाबाहो! यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र मैं तुम्‍हे प्रयोग और उपहसंहार के साथ बता रहा हूँ। यह सब अस्त्रों से बढ़कर है तथा इसे धारण करना भी अत्‍यन्‍त कठिन है। तुम इसे ग्रहण करो।[1] मनुष्‍यों पर तुम्‍हें इस अस्त्र का प्रयोग किसी भी दशा में नहीं करना चाहिये। यदि किसी अल्‍प तेज वाले पुरुष पर इसे चलाया गया तो यह उसके साथ ही समस्‍त संसार को भस्‍म कर सकता है। ‘तात! यह अस्त्र तीनों लोकों में असाधारण बताया गया है। तुम मन और इन्द्रियों को संयम में रखकर इस अस्त्र को धारण करो और मेरी यह बात सुनो। ‘वीर! यह कोई अमानव शत्रु तुम्‍हें युद्ध में पीड़ा देने लगे तो तुम उसका वध करने के लिये इस अस्त्र का प्रयोग कर सकते हो’। तब अर्जुन ने ‘तथास्‍तु’ कहकर वैसा ही करने की प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्र को ग्रहण किया। उस समय गुरु द्रोण ने अर्जुन से पुन: यह बात कही- ‘संसार में दूसरा कोई पुरुष तुम्‍हारे समान धनुर्धर न होगा’।[2]

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