राधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ पृ. 142

श्रीराधा कृष्ण की मधुर-लीलाएँ

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श्रीरासपञ्चाध्यायी लीला

सखियाँ-
एवं चेत् तथापि तवैव दोषः। नहि तत्रभवतो भवतोऽसाधुसंग समुचितः।
तौ हू आपकौ ही दोष है। क्योंकि ऐसी असाधु मुरली संग करिबे जोग्य नहीं है।

ठाकुरजी- हे गोपियौ! मेरी मुरली असाधु कैसैं हैं?
सखियाँ- हे प्यारे! वह तौ आपके बाक्यन सौं ही असाधु सिद्ध है गयी है।
(श्लोक)

छिर्द्रर्युता बहुभिरेव कठोरगात्री शून्यान्तरातिमुखरा महती न वंशात्।
जाता परस्य कुलपंकलंककर्त्री वंशी तवेयमिह नार्हति साधुवादम्।।

प्यारे! या बंसी में बहुत से छिद्र हैं, या के अंग कठोर हैं, अंतर ख़ाली है। यह बहुत बकबादी है। अच्छे कुल में उत्पन्न नायँ भई। पराये कुल कूँ ये दाग लगायबे वारी है, यासौं बंसी साधु कहिवे जोग्य नहीं।
पद (राग कान्हरौ)

सुनहु स्याम! अब करौ चतुराई, क्यौं तुम बेनु बजाई बुलाईं।
बिधि मरजाद, लोक की लज्जा, सबै त्यागि हम धाईं आईं।
अब तुम कौं ऐसी न बूझियै, आस निरास करौ जनि साईं।
सोइ कुलीन सोई बड़भागी, जो तुम सन्मुख रहत सदाईं।।
ते धनि पुरुष नारि धनि तेई, पंकज चरन रहत दृढताई।
सूरदास कहि कहा बखानै, यह निसि, यह अँग सुंदरताई।।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख

क्रमांक विषय का नाम पृष्ठ संख्या
1. श्रीप्रेम-प्रकाश-लीला 1
2. श्रीसाँझी-लीला 27
3. श्रीकृष्ण-प्रवचन-गोपी-प्रेम 48
4. श्रीगोपदेवी-लीला 51
5. श्रीरास-लीला 90
6. श्रीठाकुरजी की शयन झाँकी 103
7. श्रीरासपञ्चाध्यायी-लीला 114
8. श्रीप्रेम-सम्पुट-लीला 222
9. श्रीव्रज-प्रेम-प्रशंसा-लीला 254
10. श्रीसिद्धेश्वरी-लीला 259
11. श्रीप्रेम-परीक्षा-लीला 277
12. श्रीप्रेमाश्रु-प्रशंसा-लीला 284
13. श्रीचंद्रावली-लीला 289
14. श्रीरज-रसाल-लीला 304
15. प्रेमाधीनता-रहस्य (श्रीकृष्ण प्रवचन) 318
16. श्रीकेवट लीला (नौका-विहार) 323
17. श्रीपावस-विहार-लीला 346
18. अंतिम पृष्ठ 369

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