बावरी गोपी -प्रेम भिखारी पृ. 47

बावरी गोपी -प्रेम भिखारी

8. इस मक्खन का क्या करूँ?

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हाय, तुम्हारे रुके हुए आँसू निकल पड़े।
क्या कहा तुमने?
अरी ग्वारिन!
तुझे हम पर कुछ भी दया नहीं आती?
एक तो यों ही हम
अपने सखा की याद में बैठे दुखी हो रहे हैं,
दूसरे तूने मक्खन दिखाकर
हम लोगों को और दुखी कर दिया।
अरे, अब मक्खन में क्या स्वाद धरा है?
मक्खन किसे सुहाता है?
जब माखनचोर नहीं
तो माखन का खाना कैसा!
अब तो जब
वही आकर अपने हाथ से खिलायेगा,
तभी खायेंगे।
हा कन्हैया!
हा सखे!!’

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बावरी गोपी -प्रेम भिखारी
क्रम संख्या पाठ का नाम पृष्ठ संख्या
1. कल की बात 1
2. क्या मैं बावरी हूँ? 6
3. मेरी ही भूल थी 11
4. और कूक 18
5. कैसे थे वे दिन? 23
6. कल आयेंगे 29
7. रे भौंरे, मत गूँज 37
8. इस मक्खन का क्या करूँ? 44
9. हाय, यह तो स्वप्न था 52
10. कूबरी, तुझे धिक्कार है 58
11. कूबरी! तू धन्य है 64
12. कुछ न कहना 69
13. मैं भली कि मछली 75
14. कोई तो बताये 83
15. सुनाऊँ किसको मनकी बात 90
16. यह है प्रेम-परिणाम 98
17. यही आशा तो बैरिन हो गयी 105
18. बस, एक झलक 112
19. मैं तो चली पिया की डागरिया 119

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