ज्ञानेश्वरी पृ. 175

श्रीज्ञानेश्वरी -संत ज्ञानेश्वर

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अध्याय-6
आत्मसंयम योग


यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चवात्मनात्मानं पश्यतन्नात्मनि तुष्यति ॥20॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वत: ॥21॥

इसीलिये मैंने दृढ़ आसन लगाकर करने के लिये जो उत्तम योगाभ्यास बतलाया है, उससे इन इन्द्रियों का अच्छा नियन्त्रण होगा। क्योंकि यदि वास्तविक दृष्टि से देखा जाय तो जब योगसाधना से इन्द्रियों का निग्रह होता है, उसी समय चित्त आत्मस्वरूप में प्रवेश करने लगता है। फिर जिस समय चित्त वहाँ से पलटता है तथा आत्मस्वरूप की तरफ उसकी पीठ होती है और वह सिर्फ अपने आत्मस्वरूप की ओर देखता है, उस समय उसे देखते ही वह पहचान जाता है कि यह तत्त्व मैं ही हूँ। पहचानते ही वह सुख के साम्राज्य का भोग करने लगता है और फिर स्वतः उस परमात्म तत्त्व के साथ मिलकर एकाकार हो जाता है। जिसके परे और कुछ है ही नहीं, जिसे इन्द्रियाँ कभी जानती तक नहीं, उसी के साथ वह तन्मय होकर निज स्थान पर आत्ममुख में रहता है।[1]


यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत: ।
यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते ॥22॥

उस समय चाहे मेरु पर्वत से भी भारी दुःख का पहाड़ उस पर क्यों न टूट पड़े, परन्तु फिर भी उसका चित्त कभी अस्थिर नहीं होता अथवा चाहे उसका शरीर शस्त्रों से छलनी कर दिया जाय या आग में फेंक दिया जाय, पर फिर भी आत्मतत्त्व के महासुख में सोया हुआ उसका चित्त जागता ही नहीं। जिस समय चित्त इस प्रकार आत्मतत्त्व में विलीन हो जाता है, उस समय वह इस शरीर की ओर कभी भूलकर भी नहीं देखता। उसे दिव्य आत्मसुख मिल जाता है और यही कारण है कि वह इस शरीर से सम्बन्धित सुख-दुःख की सारी बातें ही भूल जाता है।[2]

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. (364-368)
  2. (369-371)

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क्रम संख्या विषय पृष्ठ संख्या
पहला अर्जुन विषाद योग 1
दूसरा सांख्य योग 28
तीसरा कर्म योग 72
चौथा ज्ञान कर्म संन्यास योग 99
पाँचवाँ कर्म संन्यास योग 124
छठा आत्म-संयम योग 144
सातवाँ ज्ञान-विज्ञान योग 189
आठवाँ अक्षर ब्रह्म योग 215
नवाँ राज विद्याराज गुह्य योग 242
दसवाँ विभूति योग 296
ग्यारहवाँ विश्व रूप दर्शन योग 330
बारहवाँ भक्ति योग 400
तेरहवाँ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग 422
चौदहवाँ गुणत्रय विभाग योग 515
पंद्रहवाँ पुरुषोत्तम योग 552
सोलहवाँ दैवासुर सम्पद्वि भाग योग 604
सत्रहवाँ श्रद्धात्रय विभाग योग 646
अठारहवाँ मोक्ष संन्यास योग 681

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