गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 447

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

एकादश: सर्ग:
सामोद-दामोदर:

द्वाविंश: सन्दर्भ:

22. गीतम्

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विपुल-पुलक-भर-दन्तुरितं रति-केलि-कलाभिरधीरम्।
मणिगण-किरण-समूह-समुज्ज्वल-भूषण-सुभग-शरीरम्॥
हरि.... ॥7॥[1]

अनुवाद- श्रीराधा-अवलोकन से श्रीकृष्ण का शरीर विपुल पुलकों से रोमाञ्चित हो रहा है, रति-केलि-विषयक विविध कथा मन में समुदित होने से वे अति अधीर हो रहे हैं, श्रीविग्रह मणियों की किरणों से समुज्ज्वलित होकर अतीव मनोहर द्युति को धारण कर रहा है।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अन्वय- विपुल-पुलक-भर-दन्तुरितं (विपुलो महान् य: पुलकभर: रोमाञ्चातिशय: तेन दन्तुरितं विषमीकृतं क्कचिदुन्नातं क्कचिच्चानतमिति यावत्) [अतएव तद्दर्शनात् हृदि उद्गतै:] रतिकेलिकलाभि: (सुरतक्रीड़ाविलासै:) अधीरं (व्याकुलं) [तथाच] मणिगण-किरण-समूह-समुज्ज्वल-भूषण-सुभग-शरीरम् (मणिगणानां रत्नसमूहानां परिहितानामित्यर्थ: किरणसमूहै: समुज्ज्वलानि भूषणानि अलंकारा: तै: सुभगं सुन्दरं शरीरं यस्य तादृशं) [हरिं सा ददर्श इति शेष:] ॥7॥

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सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

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