गीता अमृत -जोशी गुलाबनारायण पृ. 1022

गीता अमृत -जोशी गुलाबनारायण

अध्याय-18
मोक्ष-संन्यास-योग
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(7)
नियतस्य तु सन्न्यास:
कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्याग:
तामस: परिकीर्तित: ॥

करना संन्यास नियत[1] कर्मों का
नहीं उचित भी और योग्य भी।
परित्याग मोहवश करना इनका
कहा जाता तामस त्याग ही।।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. शास्त्रों द्वारा जो कर्म करणीय निर्धारित कर दिए हैं उनको “नियत-कर्म” कहा है। चतुर्वर्ण व्यवस्था में जो कर्म प्रत्येक वर्ण के नियत व निर्धारित कर दिए गए हैं वह कर्तव्य-कर्म प्रत्येक वर्ण के लिए यज्ञतप करने के समान होते हैं अतः एक क्षत्रिय के लिए युद्ध करना भी यज्ञ व तप करने के समान है जिसे करना ही उचित है न करना अनुचित है। अध्याय 3 श्लोक 10 व 15 में यह समझाया गया है कि यज्ञ-कर्म व सृष्टि की रचना साथ-साथ हुई है अतः यह संसार कर्म-भूमि है, सृष्टि और कर्म का सह-अस्तित्व है इस कारण कर्म को न तो कोई त्याग सकता है और न त्यागना उचित ही है।

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17. श्रद्धात्रय-विभाग-योग 982
18. मोक्ष-संन्यास-योग 1016
अंतिम पृष्ठ 1142

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