युधिष्ठिर का भाइयों से परामर्श तथा धन लाने हेतु प्रस्थान

महाभारत आश्वमेधिक पर्व के अनुगीता पर्व के अंतर्गत अध्याय 63 में युधिष्ठिर का भाइयों से परामर्श तथा धन लाने हेतु प्रस्थान का वर्णन हुआ है।[1]

जनमेजय द्वारा व्यास के वचनों के बारे में पूछना

जनमेजय! ने पूछा- ब्राह्मन! महात्मा व्यास का कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ के संबंध में फिर क्या किया? राजा मरुत्त ने जो रत्न पृथ्वी तल पर रख छोड़ा था, उसे उन्होंने किस प्रकार प्राप्त किया? द्विजश्रेष्ठ! यह सब मुझे बताइये।

वैशम्पायन का उत्तर

वैशम्पायन जी ने कहा- राजन! व्यास जी की बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव- इन सब भाइयों को बुलवाकर यह समाचोचित वचन कहा- ‘वीर बन्धुओं! कौरवों के हित की कामना रखने वाले बुद्धिमान महात्मा श्रीकृष्ण ने सौहार्दवंश जो बात कही थी, वह सब तुमने सुनी ही थी। ‘सुहृदों की भलाई चाहने वाले महान तपोवृद्ध महात्मा धर्मशील गुरु व्यास ने अद्भुत पराक्रमी भीष्म ने तथा बुद्धिमान गोविन्द ने समय-समय पर जो सलाह दी है, उसे याद करके मैं उनके आदेश का भली-भाँति पालन करना चाहता हूँ। महाप्राज्ञ पाण्डवों! उन महात्माओं का यह वचन भविष्य और वर्तमान में भी हम सबके लिये हितकारक है। ‘ब्रह्मवादी महात्मा व्यास जी का वचन परिणाम में हमारा कल्याण करने वाला है। कौरवों! इस समय इस सारी पृथ्वी पर रत्न एवं धन का नाश हो गया है; अत: हमारी आर्थिक कठिनाई दूर करने के लिए व्यास जी ने उस दिन हमें मरुत्त के धन का पता बताया था। ‘यदि तुम लोग उस धन को पर्याप्त समझो और उसे ले आने की अपने में सामर्थ्य देखो तो व्यास जी ने जैसा कहा है, उसी के अनुसार धर्मत: उसे प्राप्त करने का यत्न करो। अथवा भीमसेन! तुम बोलो, तुम्हारा इस संबंध में क्या विचार है? कुरुकुलशिरोमीणे! राजा युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर भीमसेन ने हाथ जोड़कर उन नृपश्रेष्ठ से इस प्रकार कहा- ‘महाबाहो! आपने जो कुछ कहा है, व्यासजी के बताये हुए धन को लाने के विषय में जो विचार व्यक्त किया है, वह मुझे बहुत पसंद है। ‘प्रभो! महाराज! यदि हमें मरुत्त का धन प्राप्त हो जाय तब तो हमारा सारा काम बन ही जाय। यहीं मेरा मत है। ‘आपका कल्याण हो! हम महात्मा गिरीश के चरणों में प्रणाम करके उन जटाजूटधारी महेश्वर की सम्यक आराधना करके उस धन को ले आवें। ‘हम बुद्धि, वाणी और क्रिया द्वारा आराधनापूर्वक देवाधिदेव महादेव तथा उनके अनुचरों को प्रसन्न करके निश्चय ही उस धन को प्राप्त कर लेंगे।

‘जो रौद्ररुपधारी किन्नर उस धन की रक्षा करते हैं वे भी भगवान शंकर के प्रसन्न होने पर हमारे अधीन हो जायँगे। ‘सदा प्रसन्नचित्त रहने वाले वे सर्वसमर्थ परमेश्वर महादेव अपने भक्तों को अमरत्व भी दे देते हैं; फिर सुवर्ण की तो बात ही क्या?। ‘पूर्वकाल में वन में रहते समय अर्जुन पर प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें महान पाशुपतास्त्र, रौद्रास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र प्रदान किये थे। फिर धन दे देना उनके लिये कौन बड़ी बात है। ‘कौरवनन्दन! हम सब लोग उनके भक्त हैं और वे हम लोगों पर प्रसन्न रहते हैं। उन्हीं की कृपा से हमने राज्य प्राप्त किया है। अभिमन्यु का वध हो जाने पर जब अर्जुन ने जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्न में अर्जुन ने श्रीकृष्ण के साथ रहकर रात में उन्हीं लोकगुरु महेश्वर को प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त किया था। ‘तदन्तर जब रात बीती और प्रात:काल हुआ, तब भगवान शिव ने अर्जुन के आगे रहकर अपने त्रिशूल से शत्रुओं की सेना का संहार किया था। यह बात अर्जुन ने प्रत्यक्ष देखी थी। ‘महाराज! द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे प्रहार कुशल महाधनुर्धरों से युक्त उस कौरव सेना को महान पाशुपतधारी अनेक रूप वाले महेश्वर के सिवा दूसरा कौन मन से परास्त कर सकता था। ‘उन्हीं के कृपाप्रसाद से आपके शत्रु मारे गये हैं। वे ही अश्वमेध यज्ञ को सफलतापूर्वक सम्पन्न करेंगे। भारत! भीमसेन का यह कथन सुनकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन आदि ने भी बहुत ठीक कहकर उन्हीं की बात का समर्थन किया। इस प्रकार समस्त पाण्डवों ने रत्न लाने का निश्चय करके धु्रवसंज्ञक [2] नक्षत्र एवं दिन में सेना को यात्रा के लिए तैयार होने की आज्ञा दी। तदन्तर ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर सुरश्रेष्ठ महेश्वर की पहले ही पूजा करके मिष्ठान्न, खीर, पूआ तथा फल के गूदों से उन महेश्वर को तृप्त करे उनका आशीर्वाद ले समस्त पाण्डवों ने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक यात्रा आरम्भ की। जब वे यात्रा के लिये उद्यत हुए, उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणों और नागरिकों ने प्रसन्नचित्त होकर उनके लिये शुभ मंगल-पाठ किया। तत्पश्चात पाण्डवों ने अग्निसहित ब्राह्मणों की परिक्रमा करके उनके चरणों में मस्तक झुकाकर वहाँ से प्रस्थान किया। प्रस्थान के पूर्व उन्होंने पुत्रशोक से व्याकुल राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी देवी तथा विशाललोचना कुन्ती से आज्ञा ले ली थी। अपने कुल के मूलभुत धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती के समीप उनकी रक्षा के लिये कुरुवंशी धृतराष्ट्रपुत्र युयुत्सु को नियुक्त करके मनीषी ब्राह्मणों और पुरवासियों से पूजित होते हुए वीर पाण्डवों ने वहाँ से प्रस्थान किया। वे सब-के-सब उत्तम व्रत का पालन करते हुए शौच, संतोष आदि नियमों में दृढ़तापूर्वक स्थित थे।[3]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत आश्वमेधिक पर्व अध्याय 63 श्लोक 1-14
  2. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तीनों उत्तरा तथा रोहिणी- ये धु्रवसंज्ञक नक्षत्र हैं। दिनों में रविवार को ध्रुव बताया गया है। उत्तरा और रविवार का संयोग होन पर अमृतसिद्धि नामक योग होता है, अत: इसी योग में पाण्डवों के प्रस्थान करने का अनुमान किया जा सकता है।
  3. महाभारत आश्वमेधिक पर्व अध्याय 63 श्लोक 15-24

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