गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 229

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

पञ्चम: सर्ग:
आकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष:
एकादश: सन्दर्भ
11. गीतम्

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पद्यानुवाद
त्याग मुखर नूपुर सखि! सत्वर साड़ी नीले रंगकी।
पहिन, चलें इस तिमिर पुंजमें कुंज-ओर, क्यों ठिठकी?

बालबोधिनी- सखी श्रीराधा से कह रही है हे- राधे! इस समय अंधकार है जो अभिसार के लिए उचित समय है। इस अंधकार में अभिसारिकाएँ अपने प्रेमियों से मिला करती हैं। अत: तुम इस अंधकार में उस निभृत कुंज की ओर चलो। सखि, इन नूपुरों को उतार दो, ये तो तुम्हारे शत्रु ही हैं। अति चंचल होने के कारण ये चलने के समय तथा विलास-केलि में ध्वनि उत्पन्न करते हैं, शत्रु के समान अवसर को जाने बिना ही मुखरित हो जाते हैं! ये मंजीर अभीष्ट सिद्धि के प्रतिकूल हैं। अब अपना नील वसन पहन लो। इस अभिसरणीय नील वसन के अवगुण्ठन से तुम्हारा गौर वर्ण इस तिमिर में एकाकार हो जायेगा, श्याममय हो जायेगा, तुम्हारे पथ का अन्धकार और भी बढ़ जायेगा।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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गीत गोविन्द -श्रील जयदेव गोस्वामी
सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

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