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भगवान श्रीकृष्ण को हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। श्रीकृष्ण साधारण व्यक्ति न होकर 'युग पुरुष' थे। उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभा सम्पन्न 'राजनीतिवेत्ता' ही नही, एक महान 'कर्मयोगी' और 'दार्शनिक' प्राप्त हुआ, जिसका 'गीता' ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है। 'गीता' किसने और किस काल में कही या लिखी यह शोध का विषय है, किन्तु 'गीता' को कृष्ण से ही जोड़ा जाता है। यह आस्था का प्रश्न है और यूँ भी आस्था के प्रश्नों के उत्तर इतिहास में नहीं तलाशे जाते। गीता में 'कृष्ण' 109 बार ‘मैं' कहते है किंतु मैं से परे का दर्शन प्रतिपादित करते हैं। दर्शन को गीत की शैली में समझाते हैं, शिशुपाल को 99 बार क्षमा कर दंडित करते हैं, कंस का वध कर अंधक संघ के उग्रसेन को ही राजगद्दी देते हैं। कर्म और धर्म की संस्थापना करते हैं। राधा की विरह को प्रेम की परमावस्था और रासलीला को निष्काम प्रेमलीला का प्रतीक बना देते हैं। अपमानित होकर प्रतिशोध नहीं उचित दंड देते हैं।…‘कृष्ण’ काल से परे भी है और समसामयिक भी, कृष्ण आदर्श भी हैं और झूठे आडंबरों से भरी परंपरा के विध्वंसक भी ...पूरा लेख पढ़ें