हित हरिवंश गोस्वामी -ललिताचरण गोस्वामी पृ. 181

श्रीहित हरिवंश गोस्वामी:संप्रदाय और साहित्य -ललिताचरण गोस्वामी

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सिद्धान्त
प्रकट-सेवा


श्री राधाकृष्ण के प्रकट स्वरूपों[1] की परिचर्या को प्रकट सेवा कहते हैं। राधावल्लभीय पद्धति की सेवा में राधावल्लभलाल का त्रिभंग-ललित, वेणुवादन-तत्पर स्वरूप विराजमान रहता है और उनके वाम अंग में, एक विशेष प्रकार से, भव्य वस्त्रों के द्वारा श्रीराधा की ‘गादी’ की रचना रहती है, जिसमें कनक-पत्र पर लिखा हुआ- ‘श्री राधा’ नाम धारण रहता है। इस ‘गादी’ किंवा ‘आसन’ पर ही श्री राधा की परिचर्या में आवश्यक द्रव्य धारण कराये जाते हैं।

स्थापयेद्वामभागे तु प्रेयस्या आसनं प्रभोः।
तदीपं परिचर्याहं द्रव्यं तत्रैव विन्यसेत्।।[2]

कहा गया है ‘श्री राधा के बिना न तो श्री हरि का पूजन करना चाहिये, न ध्यान करना चाहिये और न जप करना चाहिये। क्योंकि राधा के बिना क्षणार्ध में ही श्रीकृष्ण विकल होकर सुध-बुध खो बैठते हैं। इसलिये सार बेत्ता शुद्ध युगल उपासक को, श्री राधा के साथ रह कर ही प्रमुदित रहने वाले अपने स्वामी की, सदैव श्री राधा के साथ ही सेवा करनी चाहिये।’

श्रीमद्राधां विना न प्रभुवर मनिशं श्री हरिं पूजयेच्च,
नध्यायेन्नोजपत्तामल युगलवरोपासकः सारवेत्ता।
यरमादर्ध क्षणेतद्विरह विकलितो मुग्धतामेति कृष्ण-
स्तस्मात्साकं तयैव प्रमुदित मनसं स्वामिनं स्वं भजेत।।[3]

सेवा का आरंभ प्रातः-काल से होता है। ‘स्नानादिक से निवृत्त होकर उपासक मस्तक पर तिलक एवं अंगों में भगवन्नामांकित मुद्रा धारण करता है और फिर भक्ति पूर्ण हृदय से गुरु-प्रदत्त मंत्र का जाप करता है। इसके बाद वह अपने सेव्य के मन्दिर का संमार्जन करके उसको शुद्ध जल से धोता है और सेवा के पात्रों को माँज कर साफ करता है। तदनंतर युगल का गुण-गान करता हुआ वह उनको शय्या पर से उठाता है और उनके सन्मुख जल, कुल्ला करने का पात्र एवं मुख पौंछने के लिये स्वच्छ वस्त्र रखता है स्निग्धभोग सामग्री एवं शीतल जल निवेदन करके उनको ताम्बूल अर्पण करता है और फिर श्री युगल की ‘मंगला आरती’ करता है। इसके बाद प्रभु के शरीर पर सुगंधित तेल का मर्दन करके उनको गुनगुने सुगंधित जल से स्नान कराता है और स्वच्छ वस्त्र से अंग अँगोछ कर उनका विविध वस्त्राभूषणों से श्रृंगार करता है। उनके मुख पर चंदन से मकरी-लेखन[4] करता है और उनको पुष्पों की वैजयंती माला धारण कराकर चरणों में तुलसी अर्पण करता है। तदनंतर भोग एवं जल अर्पण करके प्रीति पूर्वक श्रृंगार आरती करता है और प्रमुदित मन से युगल की परिक्रमा करके उनको दर्पण दिखाता है। इसके बाद सेवा के अपराधों के लिये क्षमा माँगता हुआ, उनके मार्जन के लिये भगवन्नाम का जप करता है। तदनंतर वह अपने प्रभु के सामने रसिक महानुभावों के बनाये हुए पदों का गान करता है और प्रेम पूर्वक नृत्य करता है। इन सुख मय कार्यों से निवृत्त होकर वह युगल को विविध प्रकार की भोग-सामग्री अर्पण करता है और ताम्बूल अर्पण करके मध्याह्न आरती करता है। आरती के बाद सुगंधित पुष्पों के द्वारा शय्या की रचना करके अपने इष्ट को उस पर शयन कराता है और स्वयं प्रीति पूर्वक उनका चरण संवाहन करता है एवं पंखे से धीरे-धीरे हवा करता है।'

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. विग्रहों
  2. अ. वि. 20
  3. से. वि. 6
  4. पत्र रचना

संबंधित लेख

श्रीहित हरिवंश गोस्वामी:संप्रदाय और साहित्य -ललिताचरण गोस्वामी
विषय पृष्ठ संख्या
चरित्र
श्री हरिवंश चरित्र के उपादान 10
सिद्धान्त
प्रमाण-ग्रन्थ 29
प्रमेय
प्रमेय 38
हित की रस-रूपता 50
द्विदल 58
विशुद्ध प्रेम का स्वरूप 69
प्रेम और रूप 78
हित वृन्‍दावन 82
हित-युगल 97
युगल-केलि (प्रेम-विहार) 100
श्‍याम-सुन्‍दर 13
श्रीराधा 125
राधा-चरण -प्राधान्‍य 135
सहचरी 140
श्री हित हरिवंश 153
उपासना-मार्ग
उपासना-मार्ग 162
परिचर्या 178
प्रकट-सेवा 181
भावना 186
नित्य-विहार 188
नाम 193
वाणी 199
साहित्य
सम्प्रदाय का साहित्य 207
श्रीहित हरिवंश काल 252
श्री धु्रवदास काल 308
श्री हित रूपलाल काल 369
अर्वाचीन काल 442
ब्रजभाषा-गद्य 456
संस्कृत साहित्य
संस्कृत साहित्य 468
अंतिम पृष्ठ 508

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