सांख्ययोग के अनुसार साधन का वर्णन

महाभारत शान्ति पर्व के ‘मोक्षधर्म पर्व’ के अंतर्गत अध्याय 301 के अनुसार सांख्ययोग के अनुसार साधन का वर्णन इस प्रकार है[1]-

सांख्ययोग के अनुसार साधन का वर्णन

युधिष्ठिर ने कहा– महाराज! आप मेरे हितैषी हैं, आपने मुझ शिष्‍य के प्रति शिष्‍य पुरुषों के मत के अनुसार इस योगमार्ग का यथोचितरूप से वर्णन किया। अब मैं सांख्‍यविषयक सम्‍पूर्ण विधि पूछ रहा हूँ। आप मुझे उसे बताने की कृपा करें; क्‍योंकि तीनों लोकों में जो ज्ञान है, वह सब आपको विदित है।

भीष्‍म जी ने कहा– युधिष्ठिर! आत्‍मतत्त्व के जानने वाले सांख्‍यशास्‍त्र के विद्वानों का यह सूक्ष्‍म ज्ञान तुम मुझसे सुनो। इसे ईश्‍वर कोटि के कपिल आदि सम्‍पूर्ण यतियों ने प्रकाशित किया है। नरश्रेष्‍ठ! इस मत में किसी प्रकार की भूल नहीं दिखायी देती। इसमें गुण तो बहुत-से हैं; किंतु दोषों का सर्वथा अभाव है। वक्‍ताओं में श्रेष्‍ठ नरेश्‍वर! जो ज्ञान के द्वारा मनुष्‍य, पिशाच, राक्षस, यक्ष, सर्प, गन्‍धर्व, पितर, तिर्यग्‍योनि, गरुड़, मरुद्गण, राजर्शि, ब्रह्मर्षि, असुर, विश्‍वेदेव, देवर्षि, योगी, प्रजापति तथा ब्रह्मा जी के भी सम्‍पूर्ण दुर्जय विषयों को सदोष जानकर, संसार के मनुष्‍यों का परमायुकाल तथा सुख के परमतत्‍व का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्‍त कर लेते हैं और विषयों की इच्‍छा रखने वाले पुरुषों को समय-समय पर जो दुख प्राप्‍त होता है, उसको, तिर्यग्‍योनि और नरक में पड़ने वाले जीवों के दुख को, स्‍वर्ग तथा वेद की फल-श्रुतियों के सम्‍पूर्ण गुण-दोषों को जानकर ज्ञानयोग, सांख्‍यज्ञान और योगमार्ग के गुण-दोषों को भी समझ लेते है तथा भरतनन्‍दन! सत्‍वगुण के दस[2], रजोगुण के नौ [3], तमोगुण के आठ [4], बुद्धि के सात[5], मन के छ: [6]और आकाश के पाँच[7] गुणो का ज्ञान प्राप्‍त करके बुद्धि के दूसरे चार [8], तमोगुण के दूसरे तीन [9], रजोगुण् के दूसरे दो[10] और सत्‍व गुण के पुन: एक[11] गुण को जानकर आत्‍मा की प्राप्ति कराने वाले मार्ग- प्राकृत प्रलय तथा आत्‍मविचार को ठीक-ठीक जान लेते हैं, वे ज्ञान-विज्ञान से तथा मोक्षोपयोगी साधनों के अनुष्‍ठान से शुद्धचित हुए कल्‍याणमय सांख्‍ययोगी परम आकाश को प्राप्‍त होने वाले सूक्ष्‍म भूतों के समान मंगलमय मोक्ष को प्राप्‍त कर लेते हैं। नेत्र रूप-गुण से संयुक्‍त हैं। घ्राणेन्द्रिय गन्‍ध नामक गुण से सम्‍बन्‍ध रखती हैं। श्रो‍त्रेन्द्रिय शब्‍द में आसक्‍त्‍ है और रसना रसगुण में। त्‍वचा स्‍पर्शनामक गुण में आसक्‍त है। इसी प्रकार वायुका आश्रय आकाश, मोह का आश्रय तमोगुण और लोभ का आश्रय इन्द्रियों के विषय हैं। गति का आधार विष्‍णु, बल का इन्‍द्र, उदर का अग्नि तथा पृथ्‍वी देवी का आधार जल है। जल का तेज, तेज का वायु, वायु का आकाश, आकाश का आश्रय महतत्‍व अर्थात महतत्‍व का कार्य अहंकार है और अहंकार का अधिष्‍ठान समष्टि बुद्धि है। बुद्धि का आश्रय तमोगुण, तमोगुण का आश्रय रजोगुण और रजोगुण का आश्रय सत्‍वगुण है। सत्‍वगुण जीवात्‍मा के आश्रित है। जीवात्‍मा को भगवान नारायणदेव के आश्रित समझो। भगवान नारायण का आश्रय है मोक्ष(परब्रह्म) परंतु मोक्ष का कोई भी आश्रय नहीं है (वह अपनी ही महिमा में प्रतिष्ठित है)।[1]

स्‍वभाव और चेतना का वर्णन

इन बातों को भलीभाँति जानकर तथा सत्‍वगुण को, मनसहित ग्‍यारह इन्द्रियाँ, पाँच प्राण- इन सोलह गुणों से घिरे हुए सूक्ष्‍म शरीर को, शरीर के आश्रित रहने वाले स्‍वभाव और चेतना को जाने। नरेश्‍वर!’ जिसमें पाप का लेश भी नही है, वह एकमात्र जीवात्‍मा शरीर के भीतर हृदय रूपी गुफा में उदासीन-भाव से विद्यमान है, इस बात को जानें। विषय की अभिलाषा रखने वाले मनुष्‍यों का जो कर्म है, वह शरीर के भीतर आत्‍मा के अतिरिक्‍त दूसरा तत्‍व है। यह भी अच्‍छी तरह जान लें। इन्द्रिय और इन्द्रियों के विषय– ये सब-के– सब शरीर के भीतर स्थित है। मोक्ष परम दुर्लभ वस्‍तु है। इन सब बातों को वेदों के स्‍वाध्‍यायपूर्वक भलीभाँति समझ लें। प्राण, अपान, समान, व्‍यान और उदान– ये पाँच प्राणवायु हैं। अधोगामी वायु छठा और ऊर्ध्‍वगामी प्रवह नामक वायु सातवाँ है। ये वायु के जो सात भेद हैं, इनमें से प्रत्‍येक के सात-सात भेद ओर हो जाते हैं। इस प्रकार कुल उनचास वायु होते हैं। अनेक प्रजापति, अनेक ऋषि तथा मुक्ति के अनेकानेक उत्‍तम मार्ग हैं। इन सबकी जानकारी प्राप्‍त करनी चाहिये। परंतप! सप्‍तर्षियों, बहुसंख्‍यक राजर्षियों, देवर्षियों, अन्‍यान्‍य महापुरुषों तथा सूर्य के समान तेजस्‍वी ब्रह्मर्षियों का भी ज्ञान प्राप्‍त करे।

पृथ्‍वीनाथ! महान काल की प्रेरणा से मनुष्‍य ऐश्‍वर्य से भ्रष्‍ट कर दिये जाते हैं। बड़े-बड़े जो भूत-समुदाय हैं, उनका भी काल के द्वारा नाश हो जाता है। यह सब देख-सुनकर पापकर्मी मनुष्‍यों को जो अशुभ गति प्राप्‍त होती है तथा यमलोक में जाकर वैतरणी नदी में गिरे हुए प्राणियों को जो दुख होता है, उसको भी जाने। प्राणियों को विचित्र-विचित्र योनियों में अशुभ जन्‍म धारण करने पड़ते हैं। रक्‍त और मूत्र के पात्ररूप अपवित्र गर्भाशय में निवास करना पड़ता है, जो रज और वीर्य का समुदायमात्र है, मज्‍जा एवं स्‍नायु का संग्रह है, सैकड़ों नस-नाड़ियों में व्‍याप्‍त है तथा जिसमें नौ द्वार हैं; उस अपवित्र पुर अर्थात शरीर में जीव को रहना पड़ता है। नरेश्‍वर! इन सब बातों को जानकर अपने परम हितस्‍वरूप आत्‍मा को और उसकी प्राप्ति के लिये शास्‍त्रों द्वारा बताये हुए नाना प्रकार के योगों (साधनों) की जानकारी प्राप्‍त करनी चाहिये। भरतश्रेष्‍ठ! तामस, राजस और सात्त्विक- इन तीन प्रकार के प्राणियों के जो तत्‍वज्ञानी महात्‍मा पुरुषों द्वारा निन्दित मोक्षविरोधी व्‍यवहार हैं, उनको भी जानना चाहिये। नरेश्‍वर! घोर उत्‍पात, चन्‍द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, ताराओं का टूटकर गिरना, नक्षत्रों की गति में उलट-फेर होना तथा पति-पत्निायों का दुखदायक वियोग होना आदि बातें, जो इस जगत में घटित होती हैं, उनको भी जानकर अपने कल्‍याण का उपाय करना चाहिये।[12]

संसार के प्राणी एक-दूसरे को खा जाते हैं, यह कैसी अशुभ घटना है। इस पर दृष्टिपात करो। बाल्‍यावस्‍था में मन पर मोह छाया रहता है और वृद्धावस्‍था में शरीर का अमंगलकारी विनाश उपस्थित होता है। राग और मोह प्राप्‍त होने पर अनेक दोष उत्‍पन्‍न होते हैं, इन सबको जानकर कहीं किसी-किसी को ही सत्‍वगुण से युक्‍त देखा जाता है। सहस्‍त्रों मनुष्‍यों में से कोई बिरला ही मोक्षविषयक बुद्धि का आश्रय लेता है। वेद-वाक्‍यों के श्रवण द्वारा मुक्ति की दुर्लभता को जानकर अभीष्‍ट वस्‍तु की प्राप्ति न होने पर भी उस परिस्थिति के प्रति अधिक आदर-बुद्धि रखे और मनोंवांछित वस्‍तु प्राप्‍त हो जाय, तो भी उसकी ओर से उदासीन ही रहे। नरेश्‍वर! शब्‍द-स्‍पर्श आदि विषय दुखरूप ही हैं, इस बात को जाने। कुन्‍तीनन्‍दन! जिनके प्राण चले जाते हैं, उन मनुष्‍यों के शरीरों की जो अशुभ एवं वीभत्‍स दशा होती है, उस पर भी दृष्टिपात करे। भरतनन्‍दन! प्राणियों का घरों में निवास करना भी दुखरूप ही है, इस बात को अच्‍छी तरह समझे तथा ब्रह्मघाती और पतित मनुष्‍यों की जो अत्‍यन्‍त भयंकर दुर्गति होती है, उसको भी जाने। मदिरापान में आसक्‍त दुरात्‍मा ब्राह्मणों की तथा गुरु पत्‍नीगामी मनुष्‍यों की जो अशुभ गति होती है, उसका भी विचार करे।

युधिष्ठिर! जो मनुष्‍य माताओं, देवताओं तथा सम्‍पूर्ण लोकों के प्रति उत्‍तम बर्ताव नहीं करते हैं, उनकी दुर्गति का ज्ञान जिससे होता है, उसी ज्ञान से पापाचारी पुरुषों की अधोगति का ज्ञान प्राप्‍त करे तथा तिर्यग्‍योनि में पड़े हुए प्राणियों की जो विभिन्‍न गतियाँ होती हैं, उनको भी जान लो। वेदों के भाँति-भाँति के विचित्र वचन, ॠतुओं के परिवर्तन तथा दिन, पक्ष, मास और संवत्‍सर आदि काल जो प्रतिक्षण बीत रहा है, उसकी ओर भी ध्‍यान दे। चन्‍द्रमा की ह्रासवृद्धि तो प्रत्‍यक्ष दिखायी देती है। समुद्रों का ज्‍वारभाटा भी प्रत्‍यक्ष ही है। धनवानों के धनका नाश और नाश के बाद पुन: वृद्धि का क्रम भी दृष्टिगोचर होता ही रहता है। इन सबको देखकर अपने कर्तव्‍य का निश्‍चय करें। संयोग का, युगों का, पर्वतों का और सरिताओं का जो क्षय होता है, उस पर दृष्टि डालें। जन्‍म, मृत्‍यु और जरावस्‍था के दुखों पर दृष्टिपात करें। देह के दोषों को जानकर उनसे मिलने वाले दुख का भी यथार्थ ज्ञान प्राप्‍त करे। शरीर की व्‍याकुलता को भी ठीक-ठीक जानने का प्रयत्‍न करें। अपने शरीर में स्थित जो अपने ही दोष हैं, उन सबको जानकर शरीर से जो निरन्‍तर दुर्गन्‍ध उठती रहती है, उसकी ओर भी ध्‍यान दें (तथा विरक्‍त होकर परमात्‍मा का चिन्‍तन करते हुए भवबन्‍धन से मुक्‍त होने का प्रयत्‍न करें)।

युधिष्ठिर ने पूछा- अमितपराक्रमी पितामह! आपके देखने में कौन-कौन-से दोष ऐसे हैं जो अपने ही शरीर से उत्‍पन्‍न होते हैं? आप मेरे इस सम्‍पूर्ण संदेह का यथार्थरूप से समाधान करने की कृपा करें।

भीष्‍म जी ने कहा- प्रभो! शत्रुसदन! कपिल सांख्‍यमत के अनुसार चलने वाले उत्तम मार्गों के ज्ञाता मनीषी पुरुष इस देह के भीतर पांच दोष बतलाते हैं, उन्‍हें बताता हूँ, सुनों। काम, क्रोध, भय, निद्रा और श्‍वास- ये पांच दोष समस्‍त देहधारियों के शरीर में देखे जाते हैं।

संसार के प्राणी एक-दूसरे को खा जाते हैं, यह कैसी अशुभ घटना है। इस पर दृष्टिपात करो। बाल्‍यावस्‍था में मन पर मोह छाया रहता है और वृद्धावस्‍था में शरीर का अमंगलकारी विनाश उपस्थित होता है। राग और मोह प्राप्‍त होने पर अनेक दोष उत्‍पन्‍न होते हैं, इन सबको जानकर कहीं किसी-किसी को ही सत्‍वगुण से युक्‍त देखा जाता है। सहस्‍त्रों मनुष्‍यों में से कोई बिरला ही मोक्षविषयक बुद्धि का आश्रय लेता है। वेद-वाक्‍यों के श्रवण द्वारा मुक्ति की दुर्लभता को जानकर अभीष्‍ट वस्‍तु की प्राप्ति न होने पर भी उस परिस्थिति के प्रति अधिक आदर-बुद्धि रखे और मनोंवांछित वस्‍तु प्राप्‍त हो जाय, तो भी उसकी ओर से उदासीन ही रहे। नरेश्‍वर! शब्‍द-स्‍पर्श आदि विषय दुखरूप ही हैं, इस बात को जाने। कुन्‍तीनन्‍दन! जिनके प्राण चले जाते हैं, उन मनुष्‍यों के शरीरों की जो अशुभ एवं वीभत्‍स दशा होती है, उस पर भी दृष्टिपात करे। भरतनन्‍दन! प्राणियों का घरों में निवास करना भी दुखरूप ही है, इस बात को अच्‍छी तरह समझे तथा ब्रह्मघाती और पतित मनुष्‍यों की जो अत्‍यन्‍त भयंकर दुर्गति होती है, उसको भी जाने। मदिरापान में आसक्‍त दुरात्‍मा ब्राह्मणों की तथा गुरु पत्‍नीगामी मनुष्‍यों की जो अशुभ गति होती है, उसका भी विचार करे।

युधिष्ठिर! जो मनुष्‍य माताओं, देवताओं तथा सम्‍पूर्ण लोकों के प्रति उत्‍तम बर्ताव नहीं करते हैं, उनकी दुर्गति का ज्ञान जिससे होता है, उसी ज्ञान से पापाचारी पुरुषों की अधोगति का ज्ञान प्राप्‍त करे तथा तिर्यग्‍योनि में पड़े हुए प्राणियों की जो विभिन्‍न गतियाँ होती हैं, उनको भी जान लो। वेदों के भाँति-भाँति के विचित्र वचन, ॠतुओं के परिवर्तन तथा दिन, पक्ष, मास और संवत्‍सर आदि काल जो प्रतिक्षण बीत रहा है, उसकी ओर भी ध्‍यान दे। चन्‍द्रमा की ह्रासवृद्धि तो प्रत्‍यक्ष दिखायी देती है। समुद्रों का ज्‍वारभाटा भी प्रत्‍यक्ष ही है। धनवानों के धनका नाश और नाश के बाद पुन: वृद्धि का क्रम भी दृष्टिगोचर होता ही रहता है। इन सबको देखकर अपने कर्तव्‍य का निश्‍चय करें। संयोग का, युगों का, पर्वतों का और सरिताओं का जो क्षय होता है, उस पर दृष्टि डालें। जन्‍म, मृत्‍यु और जरावस्‍था के दुखों पर दृष्टिपात करें। देह के दोषों को जानकर उनसे मिलने वाले दुख का भी यथार्थ ज्ञान प्राप्‍त करे। शरीर की व्‍याकुलता को भी ठीक-ठीक जानने का प्रयत्‍न करें। अपने शरीर में स्थित जो अपने ही दोष हैं, उन सबको जानकर शरीर से जो निरन्‍तर दुर्गन्‍ध उठती रहती है, उसकी ओर भी ध्‍यान दें (तथा विरक्‍त होकर परमात्‍मा का चिन्‍तन करते हुए भवबन्‍धन से मुक्‍त होने का प्रयत्‍न करें )।

युधिष्ठिर ने पूछा- अमितपराक्रमी पितामह! आपके देखने में कौन-कौन-से दोष ऐसे हैं जो अपने ही शरीर से उत्‍पन्‍न होते हैं? आप मेरे इस सम्‍पूर्ण संदेह का यथार्थरूप से समाधान करने की कृपा करें। भीष्‍म जी ने कहा- प्रभो! शत्रुसदन! कपिल सांख्‍यमत के अनुसार चलने वाले उत्‍तम मार्गों के ज्ञाता मनीषी पुरुष इस देह के भीतर पांच दोष बतलाते हैं, उन्‍हें बताता हूँ, सुनों। काम, क्रोध, भय, निद्रा और श्‍वास- ये पांच दोष समस्‍त देहधारियों के शरीर में देखे जाते हैं।[13]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 301 श्लोक 1-23
  2. ज्ञान‍शक्ति, वैराग्‍य, स्‍वामिभाव, तप, सत्‍य, क्षमा, धैर्य, स्‍वच्‍छता, आत्‍मा का बोध और अधिष्‍ठातृत्‍व– ये दस सात्त्विक गुण बताये गये हैं।
  3. असंतोष, पश्‍चाताप, शोक, लोभ, अक्षमा, दमन करने की प्रवृति, काम, क्रोध और ईर्ष्‍या– ये नौ राजस गुण बताये गये हैं।
  4. अविवेक, मोह, प्रमाद, स्‍वप्‍न, निद्रा, अभिमान, विषाद और प्रीतिका अभाव ये आठ तामस गुण हैं।
  5. महत, अहंकार, शब्‍दतन्‍मात्रा, स्‍पर्शतन्‍मात्रा, रूपतन्‍मात्रा, रसतन्‍मात्रा और गन्‍धतन्‍मात्रा– ये सात गुण बुद्धि के हैं।
  6. श्रोत्र,त्वचा,नेत्र,रसना,और प्राण- इन पांच इंद्रियोंसहित छठा मन - ये मन के छ: गुण है।
  7. आकाश ,वायु ,अग्नि,जल और प्रथ्वी -ये आकाश के पांच गुण है।
  8. संशय ,निश्च्य ,गर्व,और स्मरण - ये बुद्धि के चार गुण है।
  9. अप्रतिपत्ति , विप्रतिपत्ति और विपरीत प्रतिपत्ति -ये तीन गुण तमके है।
  10. प्रवत्ति तथा दुख:- ये दो गुण रजके है।
  11. प्रकाश सत्त्वका गुण है।
  12. महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 301 श्लोक 24-37
  13. महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 301 श्लोक 38-55

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राजधर्मानुशासन पर्व
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युधिष्ठिर को समझाना | व्यास का युधिष्ठिर को समझाते हुए देवासुर संग्राम का औचित्य सिद्ध करना | कर्मों को करने और न करने का विवेचन | पापकर्म के प्रायश्चितों का वर्णन | स्वायम्भुव मनु के कथानुसार का धर्म का स्वरूप | पाप से शुद्धि के लिए प्रायश्चित | अभक्ष्य वस्तुओं का वर्णन | दान के अधिकारी एवं अनधिकारी का विवेचन | व्यासजी और श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर का नगर में प्रवेश | नगर प्रवेश के समय पुरवासियों एवं ब्राह्मणों द्वारा राजा युधिष्ठिर का सत्कार | चार्वाक का ब्राह्मणों द्वारा वध | चार्वाक को प्राप्त हुए वर आदि का श्रीकृष्ण द्वारा वर्णन | युधिष्ठिर का राज्याभिषेक | युधिष्ठिर का धृतराष्ट्र के अधीन रहकर राज्य व्यवस्था के लिए अपने का भाइयों को नियुक्त करना | युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र का युद्ध में मारे गये सगे-संबंधियों का श्राद्धकर्म करना | युधिष्ठिर द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति | युधिष्ठिर द्वारा दिये हुए भवनों में सभी भाइयों का प्रवेश और विश्राम | युधिष्ठिर द्वारा ब्राह्मणों एवं आश्रितों का सत्कार | युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण का संवाद | श्रीकृष्ण द्वारा भीष्म की प्रशंसा तथा युधिष्ठिर को उनके पास चलने का आदेश | भीष्म द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति-भीष्मस्तवराज | परशुराम द्वारा होने वाले क्षत्रिय संहार के विषय में युधिष्ठिर का प्रश्न | परशुराम के उपाख्यान क्षत्रियों का विनाश तथा पुन: उत्पन्न होने की कथा | श्रीकृष्ण द्वारा भीष्म के गुण-प्रभाव का वर्णन | श्रीकृष्ण का भीष्म की प्रशंसा करते हुए उन्हें युधिष्ठिर को धर्मोपदेश देने का आदेश देना | भीष्म द्वारा अपनी असर्मथता प्रकट करने पर भगवान श्रीकृष्ण का उन्हें वर देना | पाण्डवों व ऋषियों का भीष्म से विदा लेना | श्रीकृष्ण की प्रातश्चर्या | सात्यकि द्वारा कृष्ण का संदेश पाकर युधिष्ठिर का भाइयों सहित कुरुक्षेत्र में आना | श्रीकृष्ण और भीष्म की बातचीत | भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को गुण-कथनपूर्वक प्रश्न करने का आदेश देना | भीष्म के आश्वासन पर युधिष्ठिर का उनके समीप जाना | युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म द्वारा राजधर्म का वर्णन | राजा के लिए पुरुषार्थ, सत्य, ब्राह्मणों की अदण्डनीयता | राजा की परिहासशीलता तथा मृदुता में प्रकट होने वाले दोष | राजा द्वारा धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्ताव का वर्णन | भीष्म द्वारा राज्यरक्षा का वर्णन | युधिष्ठिर का भीष्म से विदा लेकर हस्तिनापुर में प्रवेश | ब्रह्मा जी के नीतिशास्त्र का वर्णन | राजा पृथु के चरित्र का वर्णन | वर्णधर्म का वर्णन | आश्रम धर्म का वर्णन | ब्राह्मण धर्म और कर्तव्यपालन का महत्त्व | वर्णाश्रम धर्म का वर्णन | राजर्धम का वर्णन | इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाता का संवाद | राजधर्म के पालन से चारों आश्रमों के धर्म का फल | राष्ट्र की रक्षा और उन्नति | राजा की आवश्यकता का प्रतिपादन | वसुमना और बृहस्पति का संवाद | राजा के न होने से प्रजा की हानि और होने से लाभ का वर्णन | राजा के प्रधान कर्तव्य | दण्डनीति द्वारा युगों के निर्माण का वर्णन | राजा को इहलोक व परलोक में सुख प्राप्ति कराने वाले छत्तीस गुण | धर्मपूर्वक प्रजापालन ही राजा का महान धर्म | राजा के लिए सदाचारी विद्वान पुरोहित की आवश्यकता | विद्वान सदाचारी पुरोहित की आवश्यकता | ब्राह्मण और क्षत्रिय में मेल रहने से लाभविषयक पुरूरवा का उपख्यान | ब्राह्मण और क्षत्रिय में मेल से लाभ का प्रतिपादन करने वाले मुचुकुन्द का उपाख्यान | राज्य के कर्तव्य का वर्णन | युधिष्ठिर का राज्य से विरक्त होने पर भीष्म द्वारा राज्य की महिमा का वर्णन | 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वृद्धि के उपाय | प्रजा से कर लेने तथा कोश संग्रह करने का प्रकार | राजा के कर्तव्य का वर्णन | उतथ्य का मान्धाता को उपदेश | राजा के लिए धर्मपालन की आवश्यकता | उतथ्य के उपदेश में धर्माचरण का महत्व | राजा के धर्म का वर्णन | राजा के धर्मपूर्वक आचार के विषय में वामदेवजी का वसुमना को उपदेश | वामदेव जी के द्वारा राजोचित बर्ताव का वर्णन | वामदेव के उपदेश में राजा और राज्य के लिए हितकर वर्ताव | विजयाभिलाषी राजा के धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीति का वर्णन | राजा के छलरहित धर्मयुक्त बर्ताव की प्रशंसा | शूरवीर क्षत्रियों के कर्तव्य तथा सद्नति का वर्णन | इन्द्र और अम्बरीष के संवाद में नदी और यज्ञ के रूपों का वर्णन | समरभूमि में जुझते हुए मारे जाने वाले शूरवीरों को उत्तम लोकों की प्राप्ति का कथन | शूरवीरों को स्वर्ग और कायरों को नरक की प्राप्ति | सैन्यसंचालन की रीति-नीति का वर्णन | भिन्न-भिन्न देश के योद्धाओं का स्वभाव व आचरण के लक्षण | विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणों व बलवान सैनिकों का वर्णन | शत्रु को वश में करने के लिये राजा का नीति से काम लेना | दुष्टों को पहचानने के विषय में इन्द्र और बृहस्पति का संवाद | राज्य, खजाना और सेना से वंचित क्षेमदर्शी राजा को कालकवृक्षीय मुनि का उपदेश | कालकवृक्षीय मुनि के द्वारा गये हुए राज्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न उपायों का वर्णन | कालकवृक्षीय मुनि का विदेहराज तथा कोसलराजकुमारों का मेल कराना | विदेहराज का कोसलराज को अपना जामाता बनाना | गणतन्त्र राज्य का वर्णन और उसकी नीति | माता-पिता तथा गुरु की सेवा का महत्त्व | सत्य-असत्य का विवेचन | धर्म के लक्षण व व्यावहारिक नीति का वर्णन | सदाचार और ईश्वरभक्ति को दु:खों से छुटने का उपाय | मनुष्य के स्वभाव की पहचान बताने वाली बाघ और सियार की कथा | तपस्वी ऊँट के आलस्य का कुपरिणाम और राजा का कर्तव्य | सरिताओं और समुद्र का संवाद | दुष्ट मनुष्य द्वारा की हुई निन्दा को सह लेने से लाभ | राजा तथा राजसेवकों के आवश्यक गुण | सज्जनों के चरित्र के विषय में महर्षि और कुत्ते की कथा | कुत्ते का शरभ की योनि से महर्षि के शाप से पुन: कुत्ता हो जाना | राजा के सेवक, सचिव आदि और राजा के गुणों व उनसे लाभ का वर्णन | सेवकों को उनके योग्य स्थान पर नियुक्त करने का वर्णन | सत्पुरुषों का संग्रह व कोष की देखभाल के लिए राजा को प्रेरणा देना | राजधर्म का साररूप में वर्णन | दण्ड के स्वरूप, नाम, लक्षण और प्रयोग का वर्णन | दण्ड की उत्पत्ति का वर्णन | दण्ड का क्षत्रियों कें हाथ में आने की परम्परा का वर्णन | त्रिवर्ग के विचार का वर्णन | पाप के कारण राजा के पुनरुत्थान के विषय में आंगरिष्ठ और कामन्दक का संवाद | इन्द्र और प्रह्लाद की कथा | शील का प्रभाव, अभाव में धर्म, सत्य, सदाचार और लक्ष्मी के न रहने का वर्णन | सुमित्र और ऋषभ ऋषि की कथा | राजा सुमित्र का मृग की खोज में तपस्वी मुनियों के आश्रम पर पहुँचना | सुमित्र का मुनियों से आशा के विषय में प्रश्न करना | ऋषभ का सुमित्र को वीरद्युम्न व तनु मुनि का वृतान्त सुनाना | तनु मुनि का वीरद्युम्न को आशा के स्वरूप का परिचय देना | ऋषभ के उपदेश से सुमित्र का आशा को त्याग देना | यम और गौतम का संवाद | आपत्ति के समय राजा का धर्म

आपद्धर्म पर्व

आपत्तिग्रस्त राजा के कर्त्तव्य का वर्णन | ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओं के धर्म का वर्णन | धर्म की गति को सूक्ष्म बताना | राजा के लिए कोश संग्रह की आवश्यकता | मर्यादा की स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्ति की निन्दा | बल की महत्ता और पाप से छूटने का प्रायश्रित्त | मर्यादा का पालन करने वाले कायव्य दस्यु की सद्गति का वर्णन | राजा के द्वारा किसका धन लेने व न लेने तथा कैसे बर्ताव करे इसके विचार का वर्णन | शत्रुओं से घिरे राजा के कृर्त्तव्य का वर्णन | राजा के कृर्त्तव्य के विषय में बिडाल व चूहे का आख्यान | शत्रु से सावधान रहने के विषय में राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़िया का संवाद | भारद्वाज कणिक का सौराष्ट्रदेश के राजा को कूटनीति का उपदेश | विश्वामित्र और चाण्डाल का संवाद | आपत्काल में धर्म का निश्चय | उत्तम ब्राह्मणों के सेवन का आदेश | बहेलिये और कपोत-कपोती का प्रसंग | कबूतर द्वारा अपनी भार्या का गुणगान व पतिव्रता स्त्री की प्रशंसा | कबूतरी का कबूतर से शरणागत व्याध की सेवा के लिए प्रार्थना | कबूतर द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीर का बहेलिये के लिए परित्याग | बहेलिये का वैराग्य | कबूतरी का विलाप और अग्नि में प्रवेश कर उन दोनों को स्‍वर्गलोक की प्राप्ति | बहेलिये को स्‍वर्गलोक की प्राप्ति | इन्द्रोत मुनि का जनमेजय को फटकारना | जनमेजय का इन्द्रोत मुनि की शरण में जाना | इन्द्रोत का जनमेजय को शरण देना | इन्द्रोत का जनमेजय को धर्मोपदेश देना | ब्राह्मण बालक के जीवित होने की कथा | नारद जी का सेमल वृक्ष से प्रश्न | नारद जी का सेमल को उसका अहंकार देखकर फटकारना | वायु का सेमल को धमकाना और सेमल का विचारमग्न होना | सेमल का हार स्वीकार कर बलवान के साथ वैर न करने का उपदेश | समस्त अनर्थो का कारण लोभ को बताकर उसने होने वाले पापों का वर्णन | श्रेष्ठ महापुरुषों के लक्षण | अज्ञान और लोभ को ही समस्त दोषों का कारण सिद्ध करना | मन और इंद्रियों के संयम रूप दम का माहात्म्य | तप की महिमा | सत्य के लक्षण, स्वरूप और महिमा का वर्णन | काम, क्रोध आदि दोषों का निरूपण व नाश का उपाय | नृशंस अर्थात अत्यन्त नीच पुरुष के लक्षण | नाना प्रकार के पापों और प्रायश्रितों का वर्णन | खड्ग की उत्पत्ति और प्राप्ति व महिमा का वर्णन | धर्म, अर्थ और काम के विषय में विदुर व पाण्डवों के पृथक-पृथक विचार | अन्त में युधिष्ठिर का निर्णय | मित्र बनाने व न बनाने योग्य पुरुषों के लक्षण | कृतघ्न गौतम की कथा का आरम्भ | गौतम का समुद्र की ओर प्रस्थान व बकपक्षी के घर पर अतिथि होना | गौतम का आतिथ्यसत्कार व विरूपाक्ष के भवन में प्रवेश | गौतम का राक्षसराज के यहाँ से सुर्वणराशि लेकर लौटना | गौतम का अपने मित्र बक के वध का विचार मन में लाना | कृतघ्न गौतम द्वारा राजधर्मा का वध | राक्षसों द्वार कृतघ्न की हत्या व उसके माँस को अभक्ष्य बताना | राजधर्मा और गौतम का पुन: जीवित होना

मोक्षधर्म पर्व

शोकाकुल चित्त की शांति के लिए सेनजित और ब्राह्मण संवाद | पिता के प्रति पुत्रद्वारा ज्ञान का उपदेश | त्याग की महिमा के विषय में शम्पाक का उपदेश | धन की तृष्णा से दु:ख का वर्णन | धन के त्याग से परम सुख की प्राप्ति | जनक की उक्ति तथा राजा नहुष के प्रश्नों के उत्तर मे बोध्यगीता | प्रह्लाद और अवधूत का संवाद | आजगर वृत्ति की प्रशंसा का वर्णन | काश्यप ब्राह्मण और इन्द्र का संवाद | शुभाशुभ कर्मों के परिणाम कर्ता को भोगने का प्रतिपादन | भरद्वाज और भृगु के संवाद में जगत की उत्पत्ति का वर्णन | आकाश से अन्य चार स्थूल भूतों की उत्पत्ति का वर्णन | पंचमहाभूतों के गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन | शरीर के भीतर जठरानल आदि वायुओं की स्थिति का वर्णन | जीव की सत्ता पर अनेक युक्तियों से शंका उपस्थित करना | जीव की सत्ता तथा नित्यता को युक्तियों से सिद्ध करना | मनुष्यों की और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन | कर्मो का और सदाचार का वर्णन | वैराग्य से परब्रह्मा की प्राप्ति | सत्य की महिमा, असत्य के दोष व लोक और परलोक के सुख-दु:ख का विवेचन | ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमों के धर्म का वर्णन | वानप्रस्थ और संन्यास धर्मों का वर्णन | हिमालय के उत्तर में स्थित लोक की विलक्षणता व महत्ता का प्रतिपादन | भृगु और भरद्वाज के संवाद का उपसंहार | शिष्टाचार का फलसहित वर्णन | पाप को छिपाने से हानि और धर्म की प्रशंसा | अध्यात्मज्ञान का निरूपण | ध्यानयोग का वर्णन | जपयज्ञ के विषय में युधिष्ठिर का प्रश्न | जप और ध्यान की महिमा और उसका फल | जापक में दोष आने के कारण उसे नरक की प्राप्ति | जापक के लिए देवलोक भी नरक तुल्य इसके प्रतिपादन का वर्णन | जापक को सावित्री का वरदान | धर्म, यम और काल का आगमन | राजा इक्ष्वाकु और ब्राह्मण का संवाद | सत्य की महिमा तथा जापक की गति का वर्णन | ब्राह्मण और इक्ष्वाकु की उत्तम गति का वर्णन | जापक को मिलने वाले फल की उत्कृष्टता | मनु द्वारा कामनाओं के त्याग एवं ज्ञान की प्रशंसा | परमात्मतत्त्व का निरूपण | आत्मतत्त्व और बुद्धि आदि पदार्थों का विवेचन | साक्षात्कार का उपाय | शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धि से आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन | आत्मा व परमात्मा के साक्षात्कार का उपाय तथा महत्त्व | परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | मनु बृहस्पति संवाद की समाप्ति | श्री कृष्ण से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति | श्री कृष्ण की महिमा का कथन | ब्रह्मा के पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियों के वंश का वर्णन | प्रत्येक दिशा में निवास करने वाले महर्षियों का वर्णन | विष्णु का वराहरूप में प्रकट हो देवताओं की रक्षा और दानवों का विनाश | नारद को अनुस्मृतिस्तोत्र का उपदेश | नारद द्वारा भगवान की स्तुति | श्री कृष्ण सम्बन्धी अध्यात्मतत्तव का वर्णन | संसारचक्र और जीवात्मा की स्थिति का वर्णन | निषिद्ध आचरण के त्याग आदि के परिणाम तथा सत्त्वगुण के सेवन का उपदेश | जीवोत्पत्ति के दोष और बंधनों से मुक्त तथा विषय शक्ति के त्याग का उपदेश | ब्रह्मचर्य तथा वैराग्य से मुक्ति | आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्म की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने के उपदेश | स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्था में मन की स्थिति का वर्णन | गुणातीत ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | सच्चिदान्नदघन परमात्मा, दश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष उन चारों के ज्ञान से मुक्ति का वर्णन | परमात्मा प्राप्ति के अन्य साधनों का वर्णन | राजा जनक के दरबार में पञ्चशिख का आगमन | नास्तिक मतों के निराकरणपूर्वक शरीर से भिन्न आत्मा की नित्य सत्ता का प्रतिपादन | पञ्चशिख के द्वारा मोक्षतत्त्व के विवेचन का वर्णन | विष्णु द्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेव की परीक्षा और उनके के लिए वर प्रदान | श्वेतकेतु और सुवर्चला का विवाह | पति-पत्नी का अध्यात्मविषयक संवाद | दम की महिमा का वर्णन | व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथि सेवा का विवेचन | सनत्कुमार का ऋषियों को भगवत्स्वरूप का उपदेश | इंद्र और प्रह्लाद का संवाद | इन्द्र के आक्षेप युक्त वचनों का बलि के द्वारा कठोर प्रत्युत्तर | बलि और इन्द्र का संवाद | बलि द्वारा इन्द्र को फटकारना | इन्द्र और लक्ष्मी का संवाद | बलि को त्यागकर आयी हुई लक्ष्मी की इन्द्र के द्वारा प्रतिष्ठा | इन्द्र और नमुचि का संवाद | काल और प्रारब्ध की महिमा का वर्णन | लक्ष्मी का दैत्यों को त्यागकर इन्द्र के पास आना | सद्गुणों पर लक्ष्मी का आना व दुर्गुणों पर त्यागकर जाने का वर्णन | जैगीषव्य का असित-देवल को समत्वबुद्धि का उपदेश | श्रीकृष्ण और उग्रसेन का संवाद | शुकदेव के प्रश्नों के उत्तर में व्यास जी द्वारा काल का स्वरूप बताना | व्यास जी का शुकदेव को सृष्टि के उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मों का उपदेश | ब्राह्मप्रलय एंव महाप्रलय का वर्णन | ब्राह्मणों का कर्तव्य और उन्हें दान देने की महिमा का वर्णन | ब्राह्मण के कर्तव्य का प्रतिपादन करते हुए कालरूप नद को पार करने का उपाय | ध्यान के सहायक योग | फल और सात प्रकार की धारणाओं का वर्णन | मोक्ष की प्राप्ति | सृष्टि के समस्त कार्यों में बुद्धि की प्रधानता | प्राणियों की श्रेष्ठता के तारतम्य का वर्णन | नाना प्रकार के भूतों की समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्व का विवेचन | युगधर्म का वर्णन एवं काल का महत्त्व | ज्ञान का साधन और उसकी महिमा | योग से परमात्मा की प्राप्ति का वर्णन | कर्म और ज्ञान का अन्तर | ब्रह्मप्राप्ति के उपाय का वर्णन | ब्रह्मचर्य-आश्रम का वर्णन | गार्हस्थ्य-धर्म का वर्णन | वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रम के धर्म और महिमा का वर्णन | संन्यासी के आचरण | ज्ञानवान संन्यासी का प्रशंसा | परमात्मा की श्रेष्ठता व दर्शन का उपाय | ज्ञानमय उपदेश के पात्र का निर्णय | महाभूतादि तत्त्वों का विवेचन | बुद्धि की श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक | ज्ञान के साधन व ज्ञानी के लक्षण और महिमा | परमात्मा की प्राप्ति का साधन | ज्ञान से ब्रह्म की प्राप्ति | ब्रह्मवेत्ता के लक्षण व परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | शरीर में पंचभूतों के कार्य व गुणों की पहचान | जीवात्मा और परमात्मा का योग द्वारा साक्षात्कार | कामरूपी अद्भुत वृक्ष व शरीर रूपी नगर का वर्णन | मन और बुद्धि के गुणों का विस्तृत वर्णन | युधिष्ठिर का मृत्युविषयक प्रश्न व ब्रह्मा की रोषाग्नि से प्रजा के दग्ध होने का वर्णन | ब्रह्मा के द्वारा रोषाग्नि का उपसंहार व मृत्यु की उत्पत्ति | मृत्यु की तपस्या व प्रजापति की आज्ञा से मृत्यु का प्राणियों के संहार का कार्य स्वीकार करना | धर्माधर्म के स्वरूप का निर्णय | युधिष्ठिर का धर्म की प्रमाणिकता पर संदेह उपस्थित करना | जाजलि की घोर तपस्या व जटाओं में पक्षियों का घोंसला बनाने से उनका अभिमान | आकाशवाणी की प्रेरणा से जाजलि का तुलाधार वैश्य के पास जाना | जाजलि और तुलाधार का धर्म के विषय में संवाद | जाजलि को तुलाधार का आत्मयज्ञविषयक धर्म का उपदेश | जाजलि को पक्षियों का उपदेश | राजा विचख्नु के द्बारा अहिंसा-धर्म की प्रशंसा | महर्षि गौतम और चिरकारी का उपाख्यान | दीर्घकाल तक सोच-विचारकर कार्य करने की प्रशंसा | द्युमत्सेन और सत्यवान का संवाद | अहिंसापूर्वक राज्यशासन की श्रेष्ठता का कथन | स्यूमरश्मि और कपिल का संवाद | प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्ग के विषय में स्यूमरश्मि व कपिल संवाद | चारों आश्रमों में उत्तम साधनों के द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति का कथन | ब्रह्मण और कुण्डधार मेघ की कथा | यज्ञ में हिंसा की निंदा और अहिंसा की प्रशंसा | धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्ष के विषय में युधिष्ठिर के प्रश्न | मोक्ष के साधन का वर्णन | नारद और असितदेवल का संवाद | तृष्णा के परित्याग के विषय में माण्डव्य मुनि और जनक का संवाद | पिता और पुत्र का संवाद | हारित मुनि के द्वारा आचरण व धर्मों का वर्णन | ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | ब्रह्म की प्राप्ति के विषय में वृत्र और शुक्र का संवाद | वृत्रासुर को सनत्कुमार का आध्यात्मविषयक उपदेश | भीष्म द्वारा युधिष्ठिर की शंका निवारण | इन्द्र और वृत्रासुर के युद्ध का वर्णन | वृत्रासुर के वध से प्रकट हुई ब्रह्महत्या का ब्रह्मा जी के द्वारा चार स्थानों में विभाजन | शिवजी के द्वारा दक्ष के यज्ञ का भंग | शिवजी के क्रोध से ज्वर की उत्पत्ति व उसके विविध रूप | पार्वती के रोष के निवारण के लिए शिव द्वारा दक्ष-यज्ञ का विध्वंस | महादेव जी का दक्ष को वरदान | स्तोत्र की महिमा | अध्यात्म ज्ञान और उसके फल का वर्णन | समंग द्वारा नारद जी से अपनी शोकहीन स्थिति का वर्णन | नारद जी द्वारा गालव मुनि को श्रेय का उपदेश | अरिष्टनेमि का राजा सगर को मोक्षविषयक उपदेश | उशना का चरित्र | उशना को शुक्र नाम की प्राप्ति | पराशर मुनि का राजा जनक को कल्याण की प्राप्ति के साधन का उपदेश | कर्मफल की अनिवार्यता | कर्मफल से लाभ | धर्मोपार्जित धन की श्रेष्ठता, व अतिथि-सत्कार का महत्त्व | गुरुजनों की सेवा से लाभ | सत्संग की महिमा व धर्मपालन का महत्त्व | ब्राह्मण और शूद्र की जीविका | मनुष्यों में आसुरभाव की उत्पत्ति व शिव के द्वारा उसका निवारण | विषयासक्त मनुष्य का पतन | तपोबल की श्रेष्ठता व दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालन का आदेश | वर्ण विशेष की उत्पत्ति का रहस्य | हिंसारहित धर्म का वर्णन | धर्म व कर्तव्यों का उपदेश | राजा जनक के विविध प्रश्नों का उत्तर | ब्रह्मा को साध्यगणों को उपदेश | योगमार्ग के स्वरूप, साधन, फल और प्रभाव का वर्णन | सांख्ययोग के अनुसार साधन का वर्णन | सांख्ययोग के फल का वर्णन | वसिष्ठ और करालजनक का संवाद | प्रकृति-संसर्ग के कारण जीव का बारंबार जन्म ग्रहण करना | प्रकृति के संसर्ग दोष से जीव का पतन | क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुष के विषय में राजा जनक की शंका | योग और सांख्य के स्वरूप का वर्णन तथा आत्मज्ञान से मुक्ति | विद्या-अविद्या व पुरुष के स्वरूप के उद्गार का वर्णन | वसिष्ठ व जनक संवाद का उपसंहार | जनकवंशी वसुमान को मुनि का धर्मविषयक उपदेश | याज्ञवल्क्य का जनक को उपदेश | इन्द्रियों में मन की प्रधानता का प्रतिदान | संहार क्रम का वर्णन | अध्यात्म व अधिभूत वर्णन तथा राजस और तामस के भावों के लक्षण | राजा जनक के प्रश्न | प्रकृति पुरुष का विवेक और उसका फल | योग का वर्णन व उससे परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति | मृत्यु सूचक लक्षण व मृत्यु को जीतने का उपाय | याज्ञयवल्क्य द्वारा सूर्य से वेदज्ञान की प्राप्ति का प्रसंग सुनाना | विश्वावसु को जीवात्मा और परमात्मा की एकता के ज्ञान का उपदेश देना | याज्ञवल्क्य का जनक को उपदेश देकर विदा होना | पञ्चशिख और जनक का संवाद | सुलभा का राजा जनक के शरीर में प्रवेश करना | राजा जनक का सुलभा पर दोषारोपण करना | सुलभा का राजा जनक को अज्ञानी बताना | व्यास जी का शुकदेव को धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना | शुभाशुभ कर्मों के परिणाम का वर्णन | शंकर द्वारा व्यास को पुत्रप्राप्ति के लिये वरदान देना | शुकदेव की उत्पति तथा संस्कार का वृतान्त | पिता की आज्ञा से शुकदेव का मिथिला में जाना | शुकदेव का ध्यान में स्थित होना | राजा जनक द्वारा शुकदेव जी का पूजन तथा उनके प्रश्न का समाधान | जनक द्वारा बह्मचर्याश्रम में परमात्मा की प्राप्ति | शुकदेव द्वारा मुक्त पुरुष के लक्षणों का वर्णन | शुकदेव का पिता के पास लौट आना


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