सखिनि संग बृषभानुकिसोरी 6 -सूरदास

सूरसागर

दशम स्कन्ध

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राग बिलावल
दूसरी गुरु मानलीला



छंद

तिय मान हरि ऐसै छुडायौ भक्त हित लीला करी।
कहै निगम नेति अपार गुन सुखसिंधु नट नागर हरी।।
यह मान चरित पवित्र हरि कौ प्रेम सहित जु गावही।
सब करहि आदर मान तिनकौ संत जन सुख पावही।।


दोहा

राधा रसिक गुपाल कौ कौतूहल रस केलि।
ब्रजवासी प्रभुजननि कौ, सुखद काम-तरु-बेलि।।
सुफल जन्म है तासु, जे अनुदिन गावत सुनत।
तिनकौ सदा हुलासु, 'सूरदास' प्रभु की कृपा।।2828।।

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