श्रीराधा माधव चिन्तन पृ. 958

श्रीराधा माधव चिन्तन -हनुमान प्रसाद पोद्दार

Prev.png

श्रीगोपांगनाओं की महत्ता

सप्रेम हरिस्मरण।....... गोपीजनों को भगवान के स्वरूप का पूर्णतया ज्ञान था, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। गोपियाँ भगवान की अन्तरंग शक्तियाँ थीं, जिनके मन-प्राण सदा भगवान में ही लगे रहते थे; वे उनके स्वरूप और महत्त्व को न जानती हों- यह कैसे सम्भव है।

श्रीमद्भागवत के 29 वें अध्याय में श्रीशुकदेवजी ने जो यह कहा कि- ‘तमेव परमात्मानं जारबुद्धयापि संगताः। जहर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः।।’ और उस पर राजा परीक्षित् ने शंका की कि- ‘कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने।’ इत्यादि, तथा इस शंका को स्वीकार करके जो शुकदेव जी ने उत्तर दिया- ‘उक्तं पुरस्तादेतत्तें चैद्यः सिद्धिं यथा गतः। द्विपन्नपि हषीकेशं किंमुताधोक्षजप्रियाः।।’ यह सब ठीक है। इस प्रसंग से गोपी जनों की महत्ता पर ही प्रकाश पड़ता है।

श्रीधरस्वामी ने जो अपनी व्याख्या में लिखा है- ‘जीवेषृावतं ब्रह्मात्वं कृष्णस्य तु हषीकेशत्वादनावृतमतो न तत्र बुद्धयपेक्षा।’ अर्थात जीवों का चेतन भाव या चित्स्वरूपता आवृत है, अतः उसको समझने के लिये ज्ञान की आवश्यकता है; परंतु श्रीकृष्ण तो सबकी इन्द्रियों के नियामक एवं अन्तर्यामी हैं, इसलिये उनका चिन्मय स्वरूप आवृत नहीं है। अतः उनके इस स्वरूप की अनुभूति के लिये या उनके चिन्तन से होने वाली मुक्ति की सिद्धि के लिये ज्ञान की अपेक्षा नहीं है। इसके द्वारा श्रीकृष्ण के अनावृत सच्चिदानन्दघन स्वरूप का प्रतिपादन मात्र किया गया है। इसका भाव यह नहीं समझना चाहिये कि गोपियों की उनके प्रति परमात्म बुद्धि नहीं थी या वे उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानती थीं। ‘अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्’ इत्यादि पदों से भी इस धारणा की पुष्टि हो जाती है।

यह सब होने पर भी भगवान की स्वरूप भूत माया शक्ति या लीला शक्ति गोपियों के ज्ञान को तिरोहित तथा प्रेम भाव को ही प्रायः जाग्रत किये रहती है। श्रीकृष्ण परमात्मा या ब्रह्म हैं, इस भाव का स्मरण उन्हें नहीं रमता; वे यही अनुभव करती हैं- श्रीकृष्ण हमारे प्रियतम हैं, प्राणवल्लभ हैं। आपको ‘जारबुद्धचापि’ यह कहना खटक सकता है। ब्रह्माजी भी जिनकी चरणरज की वन्दना करते हैं तथा उद्धव-जैसे ज्ञानी भी जिनकी चरणरेनु पाने के लिये तरसते हैं, उन व्रजललनाओं की भी सच्चरित्रता का समर्थन करना पड़े, उनके चरित्र पर भी संदेह का अवसर आये- यह आपको ही नहीं, सभी भगवत्प्रेमियों को व्यथा देता है।

Next.png

संबंधित लेख

श्रीराधा माधव चिन्तन -हनुमान प्रसाद पोद्दार
क्रमांक पाठ का नाम पृष्ठ संख्या
श्रीराधा
1. प्रार्थना (पद्य) 8
2. नारदकृत राधा-स्तवन 9
3. श्रीवृषभानुनन्दिनी से प्रार्थना 12
4. श्रीराधाजी कौन थी? 16
5. श्रीराधा-महिमा 22
6. श्रीराधा-प्रेम का स्वरूप 30
7. श्रीराधा का त्यागमय एकांकी निर्मल भाव 31
8. श्रीराधाभाव की एक झाँकी 34
9. श्रीराधा का स्वरूप 47
10. राधा-कृष्ण की अभिन्नता तथा राधा प्रेम की विशुद्धता 62
11. श्रीराधा की प्रेम-साधना और उनका अनिर्वचनीय स्वरूप 80
12. श्रीराधा-माधव का महत्त्व, स्वरूप, तत्त्व और सम्बन्ध 111
13. श्रीश्रीराधा के परम भाव-राज्य की एक झाँकी 144
14. श्रीराधा-तत्त्व एवं राधा-स्वरूप की नितान्त दुर्गमता 166
15. श्रीराधा-स्वरूप-गुण-महिमा 185
16. श्रीराधा-नाम-रूप-महिमा और राधा-प्रेम का स्वरूप 212
17. श्रीश्रीराधा-स्वरूप-गुण-महिमा 260
18. श्रीराधा के तत्त्व-स्वरूप-लीला का पुण्यस्मरण 284
19. श्रीराधाका स्वरूप और महत्त्व 314
20. रसस्वरूप श्रीकृष्ण और भावस्वरूपा गोपांगनासमन्वित श्रीराधाजी का तत्त्व-महत्त्व 348
21. श्रीराधा के दिव्य रूप और उनके आराधन का महत्त्व 377
22. श्रीराधामाधव का दिव्य स्वरूप 402
23. श्रीराधा-माधव का मधुर रूप-गुण-तत्त्व 431
श्रीकृष्ण
1. प्रार्थना (पद्य) 460
2. श्रीकृष्ण पूर्ण ब्रह्म भगवान हैं 461
3. श्रीराधा के प्रति भगवान श्रीकृष्ण का तत्त्वोपदेश 468
4. श्रीकृष्ण का स्वरूप-तत्व 471
5. गीता और भागवत के श्रीकृष्ण 473
6. भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य पर स्वागतोत्सव 474
7. श्रीकृष्ण का प्राकट्य 492
8. श्रीकृष्ण जन्म-महोत्सव 518
9. स्वयं भगवानका दिव्य जन्म 538
10. श्रीकृष्णका भूलोक में प्राकटय 553
11. ‘स्वयं भगवान’ श्रीकृष्ण का प्राकटय 567
12. श्रीकृष्ण का परम स्वरूप और उनका प्रेम 578
13. चोर-जार-शिखामणि 579
14. श्रीकृष्ण चरित्र की उज्जवलता 592
15. व्रजसुन्दरियों के भगवान 597
16. श्रीकृष्ण दर्शन की साधना 603
17. सौन्दर्य-लालसा 608
18. बिखरे सुमन 614
19. भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप और अवतार के हेतु 616
20. भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य और उनके आदर्श मधुर चरित्र का स्मरण 633
21. अखिलरसामृतमूर्ति भगवान श्रीकृष्ण का आविर्भाव 641
22. भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप-तत्त्व और महत्व 651
23. पूर्ण परात्पर भगवान श्रीकृष्ण का आविर्भाव 671
24. लीला-पुरुषोत्तम का प्राकट्य 686
25. स्वयं-भगवान कब और क्यों आते हैं? 691
26. श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी-महोत्सव 700
श्रीराधा-माधव
1. प्रार्थना (पद्य) 709
2. श्रीराधा-माधव की एकरूपता 710
3. श्रीराधा-कृष्ण एक ही तत्व हैं 710
4. दिव्य युगल 713
5. श्री युगत-तत्व और उनसे प्रार्थना (पद्य) 713
6. युगलतत्व की एकता 716
7. उपनिषद में युगल-स्वरूप 718
8. श्रीयुगल-स्वरूप की उपासना 725
9. श्रीराधा-कृष्ण की उपासना 737
10. श्रीराधा-कृष्ण की अष्टकालीन स्मरणीय सेवा 742
11. विनय (पद्य) 751
12. राधा-माधव से प्रार्थना (पद्य) 752
भावराज्य तथा लीला-रहस्य
1. भावराज्य की विलक्षणता 753
2. भाव-राज्य 754
3. भाव-राज्य की महिमा 755
4. भगवान की नित्य-लीला 762
5. नित्य लीला के समझने का अधिकार 763
6. भगवदवतार का रहस्य 765
7. माखनचोरी का रहस्य 768
8. चीरहरण-रहस्य 777
9. दिव्य रासक्रीडा का स्वरूप तथा महत्त्व 785
10. रासलीला-रहस्य 791
11. श्रीकृष्ण-लीला के अन्ध-अनुकरण से हानि 804
12. श्रीकृष्ण-लीलानुकरण हानिकारक 806
13. भगवान की सब लीलाओं का अनुकरण नहीं हो सकता 809
14. बिखरे सुमन 811
15. निकुन्जलीला के दर्शनाधिकारी 818
प्रेम-तत्त्व
1. प्रेमाधीन भगवान (पद्य) 819
2. भक्ति के विभिन्न स्वरूपों में प्रेम-भक्ति का स्थान 819
3. भाव के विभिन्न स्तर 827
4. रति, प्रेम और राग के तीन-तीन प्रकार 828
5. प्रेम और ब्राह्मी स्थिति 830
6. प्रेमभक्ति में भगवान और भक्त का सम्बन्ध 831
7. दिव्य प्रेम 834
8. प्रेम का स्वरूप 846
9. भगवत्प्रेमसम्बन्धी कुछ बातें 849
10. प्रेम मुँह की बात नहीं है 852
11. प्रियतम प्रभु का प्रेम 853
12. श्रेय-प्रेयस्वरूप श्रीकृष्ण 854
13. प्रेमी का स्वरूप 855
14. प्रेमी के काम-क्रोधादि के पात्र-प्रियतम भगवान 862
15. भगवत्प्रेम की प्राप्ति के साधन 870
16. भगवत्प्रेम की अभिलाषा 871
17. भगवत्प्रेम की प्राप्ति का साधन-उत्कट चाह 872
18. भगवद्विरह की दुर्लभ स्थिति 874
19. प्रेमी की तल्लीनता 877
20. प्रियतम का नित्य-स्मरण 878
21. भगवत्कृपा से ही भगवत्प्रेम की प्राप्ति 880
22. प्रेम में विषय-वैराग्य की अनिवार्यता 881
23. प्रियतम की प्राप्ति कण्टकाकीर्ण मार्ग से ही होती है 882
24. प्रेम और विधि-निषेध 885
25. बिखरे सुमन 887
26. प्रेम-एकादशी (पद्य) 897
27. प्रेम का नेम (पद्य) 899
श्रीगोपांगना
1. वन्दना (पद्य) 900
2. मोक्ष-संन्यासिनी गोपियाँ 901
3. गोपी-प्रेम 914
4. गोपीहृदय में प्रेम-समुद्र 955
5. गोपी-प्रेम की महिमा 956
6. गोपियों के श्रीकृष्ण 957
7. श्रीगोपांगनाओं की महत्ता 958
8. गोपी भाव की साधना 961
9. गोपीभाव की प्राप्ति 976
10. साधक का सिद्धदेह 977
11. सिद्ध सखीदेह 980
12. गोपी-प्रेम की साधना और सिद्धि (पद्य) 981
14. गोपियों की महिमा (पद्य) 983
प्रकीर्ण
1. प्रार्थना (पद्य) 983
2. एक कृष्णप्रेमी के पत्र का उत्तर (पद्य) 984
3. स्वागत की तैयारी करो 990
4. ‘लँगर मोरि गागर फोरि गयौ’ 991
5. तीन मधुर प्रसंग 996
6. नादब्रह्म - मोहन की मुरली 1004
7. मधुर स्वर सुना दो! 1014
8. वह दिन कब आयेगा? 1017
9. एक लालसा 1019
10. प्रियतम से प्रार्थना! 1022
11. प्यारे कन्हैया 1023
परिशिष्ट
1. श्रीराधा, श्रीराधा-नाम और राधा-उपासना सनातन है 1024
2. वृन्दावन वास के लिये स्थिर मन की आवश्यकता 1031
3. ‘श्रीराधा-माधव-चिन्तन’ पर सम्माननीय विद्वानों के विचार 1034
4. श्रीराधा-श्रीकृष्ण का नित्यरूप (पद्य) 1053
5. प्रार्थना (पद्य) 1056
6. अंतिम पृष्ठ 1058

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                                 अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र    अः