वृषोत्सर्ग आदि के विषय में देवताओं, ऋषियों और पितरों का संवाद

महाभारत अनुशासन पर्व के दानधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 125 में वृषोत्सर्ग आदि के विषय में देवताओं, ऋषियों और पितरों के संवाद का वर्णन हुआ है।[1]

देवताओं एवं ऋषियों द्वारा पितरों से प्रस्न पूछना

वैशम्पायन जी कहते हैं जनमेजय! भीष्म जी ने कहा- युधिष्ठिर तब मरुद्गणों सहित सम्‍पूर्ण महाभाग देवता और परम सौभाग्‍यशाली ऋषियों ने पितरों से पूछा- मनुष्‍यों की बुद्धि थोड़ी होती है- ; अत: वे कौन-सा कर्म करें, जिससे आप सम्‍पूर्ण पितर उनके ऊपर संतुष्‍ट होगें? श्राद्ध में दिया हुआ दान किस प्रकार अक्षय हो सकता है? अथवा मनुष्‍य किस कर्म से किस प्रकार पितरों के ऋण से छुटकारा पा सकते हैं? हम यह सुनना चाहते हैं। यह सब सुनने के लिये हमारे मन में बड़ी उत्‍कंठा है’।

वृषोत्सर्ग आदि के विषय में पितरों का संवाद

पितरों ने कहा- महाभाग देवताओं! आपने न्‍यायत: अपना संदेह उपस्‍थित किया है। उत्तम कर्म करने वाले मनुष्‍यों के जिस कार्य से हम संतुष्‍ट होते हैं, उसको सुनिये।[1] ‘नीले रंग के सॉंड़ छोड़ने से, अमावस्‍या को तिल मिश्रित जल द्वारा तर्पण करने से और वर्षा-ऋतु में पितरों के लिये दीप देने से मनुष्‍य उनके ऋण से मुक्‍त हो सकता है। [2]इस तरह निष्‍कपट भाव से किया हुआ दान अक्षय एवं महान फलदायक होता है और उससे हमें भी अक्षय संतोष प्राप्‍त होता है- ऐसा शास्‍त्र का कथन है। जो मनुष्‍य पितरों में श्रद्धा रखकर संतान उत्‍पन्‍न करेंगे, वे अपने प्रपितामहों का दुर्गम नरक से उद्धार कर देंगे। पितरों का यह भाषण सुनकर तपस्‍या के धनी महातेजस्‍वी वृद्धगार्ग्‍य के शरीर में रोमांच हो आया और उनसे इस प्रकार पूछा- ‘तपोधनों! नीले रंग के सॉंड़ छोड़ने, वर्षा-ऋतु में दीप देने और अमावस्‍या को तिल मिश्रित जल द्वारा तर्पण करने करने से क्‍या लाभ होते हैं?”

पितरों ने कहा- मुने! छोड़े हुये नीले रंग के सॉंड़ की पूँछ यदि नदी आदि के जल में भीगकर उस जल को ऊपर उछालती है तो जिसने उस सॉंड़ को छोड़ा है उसके पितर साठ हजार वर्षों तक उस जल से तृप्‍त रहते हैं। जो नदी या तालाब के तट से अपने सींगों द्वारा कीचड़ उछालकर खड़ा होता है, उससे वृषोत्‍सर्ग करने वाले के पितर निसंदेह चन्‍द्रलोक में जाते हैं। वर्षा-ऋतु में दीन दान करने से मनुष्‍य चन्‍द्रमा के समान शोभा पाता है। जो दीपदान करता है, उसके लिये नरक का अन्‍धकार है ही नहीं। तपोधन! जो मनुष्‍य अमावस्‍या के दिन ताँबें के पात्र में मधु एवं तिल से मिश्रित जल लेकर उसके द्वारा पितरों का तपर्ण करते हैं, उनके द्वारा रहस्‍य सहित श्राद्धकर्म यथार्थ रूप से समपादित हो जाता है। उनकी प्रजा सदा ह्ष्‍ट-पुष्‍ट मन वाली होती है। कुल और वंश-परम्‍परा की वृद्धि श्राद्ध का फल है। पिण्‍डदान करने वाले को यह फल सुलभ होता है। जो श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करता है, वह उनके ऋण से छुटकारा पा जाता है। इस प्रकार यह श्राद्ध के काल, क्रम, विधि पात्र और फल का यथावत रूप से वर्णन किया गया है।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 125 श्लोक 56-72
  2. 2.0 2.1 महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 125 श्लोक 73-83

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भीष्मस्वर्गारोहण पर्व
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