विश्वामित्र के जन्म की कथा

महाभारत अनुशासन पर्व के दानधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 4 में विश्वामित्र के जन्म की कथा का वर्णन हुआ है[1]-

ऋचीक द्वारा गाधि को एक हजार घोड़े देना

वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! ऋचीक ने पूछा- राजेन्‍द्र! मैं आपकी पुत्री के लिये आपको क्‍या शुल्‍क दूं? आप निस्‍संकोच होकर बताइये। नरेश्‍वर! इसमें आपको कोई अन्‍यथा विचार नहीं करना चाहिए। गाधि ने कहा- भृगुनन्‍दन! आप मुझे शुल्‍क रूप में एक हजार ऐसे घोड़े ला दीजिये जो चन्‍द्रमा के समान कान्तिमान और वायु के समान वेगवान हों तथा जिनका एक-एक कान श्‍याम रंग का हो। भीष्‍म जी कहते हैं- राजन! तब भृगु श्रेष्‍ठ च्‍यवन पुत्र शक्तिशाली महर्षि ऋचीक ने जल के स्‍वामी अदितिनन्‍दन वरुण देव के पास जाकर कहा- देवशिरोमणे! मैं आप से चंद्रमा के समान कांतिमान तथा वायु के समान वेगवान एक हजार ऐसे घोड़ों की भिक्षा मांगता हूँ जिनका एक ओर का कान श्‍याम रंग का हो। तब अतितिनन्‍दन वरुण देव ने उन भृगुश्रेष्‍ठ ऋचीक से कहा- बहुत अच्‍छा, जहाँ आपकी इच्‍छा होगी, वहीं से इस तरह के घोड़े प्रकट हो जायेंगे। तदनन्‍तर ऋचीक के चिन्‍तन करते ही गंगा जी के जल से चन्‍द्रमा के समान कान्ति वाले एक हजार तेजस्‍वी घोड़े प्रकट हो गये। कन्‍नौज के पास ही गंगा जी का वह उत्‍तम तट आज भी मानवों द्वारा अश्‍वतीर्थ कहलाता है। तात! तब तपस्‍वी मुनियों में श्रेष्‍ठ ऋचीक मुनि ने प्रसन्‍न होकर शुल्‍क के लिये राजा गाधि को वे एक हजार सुन्‍दर घोड़े दे दिये।

ऋचीक एवं सत्‍यवती का विवाह

तब आश्‍चर्यचकित हुए राजा गाधि ने शाप के भय से डरकर अपनी कन्‍या को वस्‍त्राभूषणों से विभूषित करके भृगुनन्‍दन ब्रह्मार्शिरोमणि ऋचीक ने उसका विधिवत पाणिग्रहण किया। वैसे तेजस्‍वी पति को पाकर उस कन्‍या को भी बड़ा हर्ष हुआ।

सत्‍यवती को ऋचीक द्वारा वरदान प्राप्त होना

भरतनन्‍दन! अपनी पत्‍नी के सद्व्‍यवहार से ब्रह्मार्षि बहुत संतुष्‍ट हुए। उन्‍होनें उस परम सुन्‍दरी पत्‍नी को मनोवांछित वर देने की इच्‍छा प्रकट की। नृपश्रेष्‍ठ! तब उस राजकन्‍या ने अपनी माता से मुनि की कही हुई सब बातें बतायीं। वह सुनकर उसकी माता ने संकोच सिर नीचे करके पुत्री से कहा-बेटी! तुम्‍हारे पति को पुत्र प्रदान करने के लिये मुझ पर भी कृपा करनी चाहिए, क्‍योंकि वे महान तपस्‍वी और समर्थ हैं। राजन्! तदनन्‍तर सत्यवती ने तुरंत जाकर माता की वह सारी इच्‍छा ऋचीक से निवेदन की। तब ऋचीक ने उससे कहा- कल्‍याणि! मेरे प्रसाद से तुम्‍हारी माता शीघ्र ही गुणवान पुत्र को जन्‍म देगी। तुम्‍हारा प्रेमपूर्ण अनुरोध असफल नहीं होगा। तुम्‍हारे गर्भ से भी एक अत्‍यन्‍त गुणवान और महान तेजस्‍वी पुत्र उत्‍पन्‍न होगा, जो हमारी वंशपरम्‍परा को चलायेगा। मैं तुम से यह सच्‍ची बात कहता हूँ। कल्‍याणि! तुम्‍हारी माता ऋतुस्‍नान के पश्‍चात पीपल के वृक्ष का आलिंगन करे और तुम गूलर के वृक्ष का। इससे तुम दोनों को अभीष्‍ट पुत्र की प्राप्ति होगी। पवित्र मुस्‍कानवाली देवि! मैंने ये दो मंत्रपूत चरू तैयार किये हैं इन में से एक को तुम खा लो और दूसरे को तुम्‍हारी माता। इससे तुम दोनों को पुत्र प्राप्‍त होंगे। तब सत्‍यवती ने हर्षमग्‍न होकर ऋचीक ने जो कुछ कहा था, वह सब अपनी माता को बताया और दोनों के लिये तैयार किये हुए पृथक-पृथक चरूओं की भी चर्चा की। उस समय माता ने अपनी पुत्री सत्‍यवती से कहा- बेटी! माता होने के कारण पहले से मेरा तुम पर अधिकार है, अत: तुम मेरी बात मानो। तुम्‍हारें पति ने जो मंत्रपूत चरू तुम्‍हारे लिये दिया है, वह तुम मुझे दे दो और मेरा चरू तुम ले लो। पवित्र हास्‍यवाली मेरी अच्‍छी बेटी! यदि तुम मेरी बात मानने योग्‍य समझों तो हम लोग वृक्षों में भी अदल-बदल कर लें। प्राय: सभी लोग अपने लिये निर्मल एवं सर्वगुणसम्‍पन्‍न श्रेष्‍ठ पुत्र की इच्‍छा करते हैं। अवश्‍य ही भगवान ऋचीक ने भी चरू निर्माण करते समय ऐसा तारतम्‍य रखा होगा। सुमध्‍य में! इसीलिये तुम्‍हारे लिये नियत किये गये चरू और वृक्ष में मेरा अनुराग हुआ है। तुम भी यही चिन्‍तन करो कि मेरा भाई किसी तरह श्रेष्‍ठ गुणों से सम्‍पन्‍न हो। युधिष्ठिर! इस तरह सलाह करके सत्‍यवती और उसकी माता ने उसी तरह उन दोनों वस्‍तुओं का अदल-बदलकर उपयोग किया।

विश्वामित्र के जन्म की कथा

फिर तो वे दोनों गर्भवती हो गयीं। अपनी पत्‍नी सत्‍यवती को गर्भवती अवस्‍था में देखकर भृगुश्रेष्‍ठ महर्षि ऋचीक का मन खिन्‍न हो गया। उन्‍होनें कहा- शुभे! जान पड़ता है तुमने बदलकर चरू का उपयोग किया है। इसी तरह तुम लोगों ने वृक्षों के आलिंगन में भी उलट-फेर कर दिया है- ऐसा स्‍पष्‍ट प्रतीत हो रहा है। मैंने तुम्‍हारे चरू में सम्‍पूर्ण ब्रह्मातेज का संनिवेश किया था और तुम्‍हारी माता के चरू में समस्‍त क्षत्रियोचित शक्ति की स्‍थापना की थी। मैनें सोचा था कि तुम त्रिभुवन में विख्‍यात गुणवाले ब्राह्मण को जन्‍म दोगी और तुम्‍हारी माता सर्वश्रेष्‍ठ क्षत्रिय की जननी होगी। इसलिये मैंने दो तरह के चरूओं का निर्माण किया था। शुभे! तुमने और तुम्‍हारी माता ने अदला-बदली कर ली है, इसलिये तुम्‍हारी माता श्रेष्‍ठ ब्राह्मण पुत्र को जन्‍म देगी और भद्रे! तुम भयंकर कर्म करने वाले क्षत्रिय की जननी होओगी। भाविनि! माता के स्नेह में पड़कर तुमने यह अच्‍छा काम नहीं किया।[2]

राजन! पति की यह बात सुनकर सुन्‍दरी सत्‍यवती शोक से संतप्‍त हो वृक्ष से कटी हुई मनोहर लता के समान मूर्च्छित होकर पृथ्‍वी पर गिर पड़ी। थोड़ी देर में जब उसे चेत हुआ, तब वह गाधिकुमारी अपने स्‍वामी भृगुभूषण ऋचीक के चरणों में सिर खाकर प्रणाम पूर्वक बोली- 'ब्रह्मावेत्‍ताओं में श्रेष्‍ठ ब्रह्मर्षे! मैं आपकी पत्‍नी हूं, अत: आपसे कृपा-प्रसाद की भीख चाहती हूँ। आप ऐसी कृपा करें जिससे मेरे गर्भ से क्षत्रिय पुत्र उत्‍पन्‍न न हो। मेरा पौत्र चाहे उग्रकर्मा क्षत्रियस्‍वभाव का हो जाय, परंतु मेरा पुत्र वैसा न हो। ब्रह्मान! मुझे यही वर दीजिये। तब उन महातपस्‍वी ऋषि ने अपनी पत्‍नी से कहा, 'अच्‍छा, ऐसा ही हो' तदनन्‍तर सत्‍यवती ने जमदग्निनामक शुभगुणसम्‍पन्‍न पुत्र को जन्‍म दिया। राजेन्‍द्र! उन्‍हीं ब्रह्मार्षि के कृपा-प्रसाद से गाधि की यशस्विनी पत्‍नी ने ब्रहावादी विश्वामित्र को उत्‍पन्‍न किया। इसीलिये महातपस्‍वी विश्वामित्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणत्‍व को प्राप्‍त हो ब्राह्मणवंश के प्रवर्तक हुए।[3]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 4 श्लोक 1-20
  2. महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 4 श्लोक 21-41
  3. महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 4 श्लोक 42-62

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दान-धर्म-पर्व
युधिष्ठिर की भीष्म से उपदेश देने की प्रार्थना | भीष्म द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और काल के संवाद का वर्णन | प्रजापति मनु के वंश का वर्णन | अग्निपुत्र सुदर्शन की मृत्यु पर विजय | विश्वामित्र को ब्राह्मणत्व की प्राप्ति विषयक युधिष्ठिर का प्रश्न | अजमीढ के वंश का वर्णन | विश्वामित्र के जन्म की कथा | विश्वामित्र के पुत्रों के नाम | इन्द्र और तोते का स्वामिभक्त एवं दयालु पुरुष की श्रेष्ठता विषयक संवाद | दैव की अपेक्षा पुरुषार्थ की श्रेष्ठता का वर्णन | कर्मों के फल का वर्णन | श्रेष्ठ ब्राह्मणों की महिमा | ब्राह्मण विषयक सियार और वानर के संवाद का वर्णन | शूद्र और तपस्वी ब्राह्मण की कथा | लक्ष्मी के निवास करने और न करने योग्य पुरुष, स्त्री और स्थानों का वर्णन | भीष्म का युधिष्ठिर से कृतघ्न की गति और प्रायश्चित का वर्णन | स्त्री-पुरुष का संयोग विषयक भंगास्वन का उपाख्यान | भीष्म का शरीर, वाणी और मन से होने वाले पापों के परित्याग का उपदेश | भीष्म का श्रीकृष्ण से महादेव का माहात्म्य बताने का अनुरोध | श्रीकृष्ण द्वारा महात्मा उपमन्यु के आश्रम का वर्णन | उपमन्यु का शिव विषयक आख्यान 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द्वारा मतंग को समझाना | मतंग की तपस्या और इन्द्र का उसे वरदान | वीतहव्य के पुत्रों से काशी नरेशों का युद्ध | प्रतर्दन द्वारा वीतहव्य के पुत्रों का वध | वीतहव्य को ब्राह्मणत्व प्राप्ति की कथा | नारद द्वारा पूजनीय पुरुषों के लक्षण | नारद द्वारा पूजनीय पुरुषों के आदर-सत्कार से होने वाले लाभ का वर्णन | वृषदर्भ द्वारा शरणागत कपोत की रक्षा | वृषदर्भ को पुण्य के प्रभाव से अक्षयलोक की प्राप्ति | भीष्म द्वारा यूधिष्ठिर से ब्राह्मण के महत्त्व का वर्णन | भीष्म द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणों की प्रशंसा | ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मणों की महत्ता का वर्णन | ब्राह्मण प्रशंसा विषयक इन्द्र और शम्बरासुर का संवाद | दानपात्र की परीक्षा | पंचचूड़ा अप्सरा का नारद से स्त्री दोषों का वर्णन | युधिष्ठिर के स्त्रियों की रक्षा के विषय में प्रश्न | भृगुवंशी विपुल द्वारा योगबल से गुरुपत्नी की रक्षा | विपुल का देवराज इन्द्र से गुरुपत्नी को बचाना | विपुल को गुरु देवशर्मा से वरदान की प्राप्ति | विपुल को दिव्य पुष्प की प्राप्ति और चम्पा नगरी को प्रस्थान | विपुल का अपने द्वारा किये गये दुष्कर्म का स्मरण करना | देवशर्मा का विपुल 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विषयक युधिष्ठिर और इन्द्र के प्रश्न | ब्रह्मा का इन्द्र को गोलोक की महिमा बताना | ब्रह्मा का इन्द्र को गोदान की महिमा बताना | दूसरे की गाय को चुराने और बेचने के दोष तथा गोहत्या के परिणाम | गोदान एवं स्वर्ण दक्षिणा का माहात्म्य | व्रत, नियम, ब्रह्मचर्य, माता-पिता और गुरु आदि की सेवा का महत्त्व | गोदान की विधि और गौओं से प्रार्थना | गोदान करने वाले नरेशों के नाम | कपिला गौओं की उत्पत्ति | कपिला गौओं की महिमा का वर्णन | वसिष्ठ का सौदास को गोदान की विधि और महिमा बताना | गौओं को तपस्या द्वारा अभीष्ट वर की प्राप्ति | विभिन्न गौओं के दान से विभिन्न उत्तम लोकों की प्राप्ति | गौओं तथा गोदान की महिमा | व्यास का शुकदेव से गौओं की महत्ता का वर्णन | व्यास द्वारा गोलोक की महिमा का वर्णन | व्यास द्वारा गोदान की महिमा का वर्णन | लक्ष्मी और गौओं का संवाद | गौओं द्वारा लक्ष्मी को गोबर और गोमूत्र में स्थान देना | ब्रह्मा का इन्द्र को गोलोक और गौओं का उत्कर्ष बताना | ब्रह्मा का गौओं को वरदान देना | भीष्म का पिता शान्तनु को कुश पर पिण्ड देना | सुवर्ण की उत्पत्ति और उसके दान की महिमा | पार्वती का देवताओं को 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भिक्षुरूपधरी इन्द्र द्वारा कृत्या का वध तथा सप्तर्षियों की रक्षा | इन्द्र द्वारा कमलों की चोरी तथा धर्मपालन का संकेत | अगस्त्य के कमलों की चोरी तथा ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों की धर्मोपदेशपूर्ण शपथ | इन्द्र का चुराये हुए कमलों को वापस देना | सूर्य की प्रचण्ड धूप से रेणुका के मस्तक और पैरों का संतप्त होना | जमदग्नि का सूर्य पर कुपित होना | छत्र और उपानह की उत्पत्ति एवं दान की प्रशंसा | गृहस्थधर्म तथा पंचयज्ञ विषयक पृथ्वीदेवी और श्रीकृष्ण का संवाद | तपस्वी सुवर्ण और मनु का संवाद | नहुष का ऋषियों पर अत्याचार | महर्षि भृगु और अगस्त्य का वार्तालाप | नहुष का पतन | शतक्रतु का इन्द्रपद पर अभिषेक तथा दीपदान की महिमा | ब्राह्मण के धन का अपहरण विषयक क्षत्रिय और चांडाल का संवाद | ब्रह्मस्व की रक्षा में प्राणोत्सर्ग से चांडाल को मोक्ष की प्राप्ति | धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मण का संवाद | ब्रह्मा और भगीरथ का संवाद | आयु की वृद्धि और क्षय करने वाले शुभाशुभ कर्मों का वर्णन | गृहस्थाश्रम के कर्तव्यों का विस्तारपूर्वक निरूपण | बड़े और छोटे भाई के पारस्परिक बर्ताव का वर्णन | माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनों के गौरव का वर्णन | मास, पक्ष एवं तिथि सम्बंधी विभिन्न व्रतोपवास के फल का वर्णन | दरिद्रों के लिए यज्ञतुल्य फल देने वाले उपवास-व्रत तथा उसके फल का वर्णन | मानस तथा पार्थिव तीर्थ की महत्ता | द्वादशी तिथि को उपवास तथा विष्णु की पूजा का माहात्म्य | मार्गशीर्ष मास में चन्द्र व्रत करने का प्रतिपादन | बृहस्पति और युधिष्ठिर का संवाद | विभिन्न पापों के फलस्वरूप नरकादि की प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियों में जन्म लेने का वर्णन | पाप से छूटने के उपाय तथा अन्नदान की विशेष महिमा | बृहस्पति का युधिष्ठिर को अहिंसा एवं धर्म की महिमा बताना | हिंसा और मांसभक्षण की घोर निन्दा | मद्य और मांस भक्षण के दोष तथा उनके त्याग की महिमा | मांस न खाने से लाभ तथा अहिंसाधर्म की प्रशंसा | द्वैपायन व्यास और एक कीड़े का वृत्तान्त | कीड़े का क्षत्रिय योनि में जन्म तथा व्यासजी का दर्शन | कीड़े का ब्राह्मण योनि में जन्म तथा सनातनब्रह्म की प्राप्ति | दान की प्रशंसा और कर्म का रहस्य | विद्वान एवं सदाचारी ब्राह्मण को अन्नदान की प्रशंसा | तप की प्रशंसा तथा गृहस्थ के उत्तम कर्तव्य का निर्देश | पतिव्रता स्त्रियों के कर्तव्य का वर्णन | नारद का पुण्डरीक को भगवान नारायण की आराधना का उपदेश | ब्राह्मण और राक्षस का सामगुण विषयक वृत्तान्त | श्राद्ध के विषय में देवदूत और पितरों का संवाद | पापों से छूटने के विषय में महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्र का संवाद | धर्म के विषय में इन्द्र और बृहस्पति का संवाद | वृषोत्सर्ग आदि के विषय में देवताओं, ऋषियों और पितरों का संवाद | विष्णु, देवगण, विश्वामित्र और ब्रह्मा आदि द्वारा धर्म के गूढ़ रहस्य का वर्णन | अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्नि द्वारा धर्म के गूढ़ रहस्य का वर्णन | वायु द्वारा धर्माधर्म के रहस्य का वर्णन | लोमश द्वारा धर्म के रहस्य का वर्णन | अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्त द्वारा धर्म सम्बन्धी रहस्य का वर्णन | प्रमथगणों द्वारा धर्माधर्म सम्बन्धी रहस्य का कथन | दिग्गजों का धर्म सम्बन्धी रहस्य एवं प्रभाव | महादेव जी का धर्म सम्बन्धी रहस्य का वर्णन | स्कन्ददेव का धर्म सम्बन्धी रहस्य का वर्णन | भगवान विष्णु और भीष्म द्वारा धर्म सम्बन्धी रहस्यों के माहात्म्य का वर्णन | जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य है और जिनका ग्रहण करने योग्य नहीं है, उन मनुष्यों का वर्णन | दान लेने और अनुचित भोजन करने का प्रायश्चित | दान से स्वर्गलोक में जाने वाले राजाओं का वर्णन | पाँच प्रकार के दानों का वर्णन | तपस्वी श्रीकृष्ण के पास ऋषियों का आना | ऋषियों का श्रीकृष्ण का प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना | नारद द्वारा हिमालय पर शिव की शोभा का विस्तृत वर्णन | शिव के तीसरे नेत्र से हिमालय का भस्म होना | शिव-पार्वती के धर्म-विषयक संवाद की उत्थापना | वर्णाश्रम सम्बन्धी आचार | प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्म का निरूपण | वानप्रस्थ धर्म तथा उसके पालन की विधि और महिमा | ब्राह्मणादि वर्णों की प्राप्ति में शुभाशुभ कर्मों की प्रधानता का वर्णन | बन्धन मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करने वाले कर्मों का वर्णन | स्वर्ग और नरक प्राप्त कराने वाले कर्मों का वर्णन | उत्तम और अधम कुल में जन्म दिलाने वाले कर्मों का वर्णन | मनुष्य को बुद्धिमान, मन्दबुद्धि तथा नपुंसक बनाने वाले कर्मों का वर्णन | राजधर्म का वर्णन | योद्धाओं के धर्म का वर्णन | रणयज्ञ में प्राणोत्सर्ग की महिमा | संक्षेप से राजधर्म का वर्णन | अहिंसा और इन्द्रिय संयम की प्रशंसा | दैव की प्रधानता | त्रिवर्ग का निरूपण | कल्याणकारी आचार-व्यवहार का वर्णन | विविध प्रकार के कर्मफलों का वर्णन | अन्धत्व और पंगुत्व आदि दोषों और रोगों के कारणभूत दुष्कर्मों का वर्णन | उमा-महेश्वर संवाद में महत्त्वपूर्ण विषयों का विवेचन | प्राणियों के चार भेदों का निरूपण | पूर्वजन्म की स्मृति का रहस्य | मरकर फिर लौटने में कारण स्वप्नदर्शन | दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्म का विवेचन | यमलोक तथा वहाँ के मार्गों का वर्णन | पापियों की नरकयातनाओं का वर्णन | कर्मानुसार विभिन्न योनियों में पापियों के जन्म का उल्लेख | शुभाशुभ आदि तीन प्रकार के कर्मों का स्वरूप और उनके फल का वर्णन | मद्यसेवन के दोषों का वर्णन | पुण्य के विधान का वर्णन | व्रत धारण करने से शुभ फल की प्राप्ति | शौचाचार का वर्णन | आहार शुद्धि का वर्णन | मांसभक्षण से दोष तथा मांस न खाने से लाभ | गुरुपूजा का महत्त्व | उपवास की विधि | तीर्थस्थान की विधि | सर्वसाधारण द्रव्य के दान से पुण्य | अन्न, सुवर्ण और गौदान का माहात्म्य | भूमिदान के महत्त्व का वर्णन | कन्या और विद्यादान का माहात्म्य | तिल का दान और उसके फल का माहात्म्य | नाना प्रकार के दानों का फल | लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओं की पूजा का निरूपण | श्राद्धविधान आदि का वर्णन | दान के पाँच फल | अशुभदान से भी शुभ फल की प्राप्ति | नाना प्रकार के धर्म और उनके फलों का प्रतिपादन | शुभ और अशुभ गति का निश्चय कराने वाले लक्षणों का वर्णन | मृत्यु के भेद | कर्तव्यपालनपूर्वक शरीरत्याग का महान फल | काम, क्रोध आदि द्वारा देहत्याग करने से नरक की प्राप्ति | मोक्षधर्म की श्रेष्ठता का प्रतिपादन | मोक्षसाधक ज्ञान की प्राप्ति का उपाय | मोक्ष की प्राप्ति में वैराग्य की प्रधानता | सांख्यज्ञान का प्रतिपादन | अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वों की उत्पत्ति आदि का वर्णन | योगधर्म का प्रतिपादनपूर्वक उसके फल का वर्णन | पाशुपत योग का वर्णन | शिवलिंग-पूजन का माहात्म्य | पार्वती के द्वारा स्त्री-धर्म का वर्णन | वंश परम्परा का कथन और श्रीकृष्ण के माहात्म्य का वर्णन | श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन और भीष्म का युधिष्ठिर को राज्य करने का आदेश | श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् | जपने योग्य मंत्र और सबेरे-शाम कीर्तन करने योग्य देवता | ऋषियों और राजाओं के मंगलमय नामों का कीर्तन-माहात्म्य | गायत्री मंत्र का फल | ब्राह्मणों की महिमा का वर्णन | कार्तवीर्य अर्जुन को वरदान प्राप्ति और उनमें अभिमान की उत्पत्ति का वर्णन | ब्राह्मणों की महिमा विषयक कार्तवीय अर्जुन और वायु देवता का संवाद | वायु द्वारा उदाहरण सहित ब्राह्मणों की महत्ता का वर्णन | ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्य के प्रभाव का वर्णन | ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठ के प्रभाव का वर्णन | अत्रि और च्यवन ऋषि के प्रभाव का वर्णन | कप दानवों का स्वर्गलोक पर अधिकार | ब्राह्मणों द्वारा कप दानवों को भस्म करना | भीष्म द्वारा श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन | श्रीकृष्ण का प्रद्युम्न को ब्राह्मणों की महिमा बताना | श्रीकृष्ण द्वारा दुर्वासा के चरित्र का वर्णन करना | श्रीकृष्ण द्वारा भगवान शंकर के माहात्म्य का वर्णन | भगवान शंकर के माहात्म्य का वर्णन | धर्म के विषय में आगम-प्रमाण की श्रेष्ठता | भीष्म द्वारा धर्माधर्म के फल का वर्णन | साधु-असाधु के लक्षण तथा शिष्टाचार का निरूपण | युधिष्ठिर का विद्या, बल और बुद्धि की अपेक्षा भाग्य की प्रधानता बताना | भीष्म का शुभाशुभ कर्मों को ही सुख-दु:ख की प्राप्ति का कारण बताना | नित्यस्मरणीय देवता, नदी, पर्वत, ऋषि और राजाओं के नाम-कीर्तन का माहात्म्य | भीष्म की अनुमति से युधिष्ठिर का सपरिवार हस्तिनापुर प्रस्थान
भीष्मस्वर्गारोहण पर्व
भीष्म के अन्त्येष्टि संस्कार की सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदि का आगमन | भीष्म का धृतराष्ट्र और युधिष्ठिर को कर्तव्य का उपदेश देना | भीष्म का श्रीकृष्ण आदि से देहत्याग की अनुमति लेना | भीष्म का प्राणत्याग | धृतराष्ट्र द्वारा भीष्म का दाह संस्कार | गंगा का भीष्म के लिए शोक प्रकट करना और श्रीकृष्ण का उन्हें समझाना

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