योगमार्ग के स्वरूप, साधन, फल और प्रभाव का वर्णन

महाभारत शान्ति पर्व के मोक्षधर्म पर्व के अंतर्गत 300 वें अध्याय में योगमार्ग के स्वरूप, साधन, फल और प्रभाव का वर्णन हुआ है, जो इस प्रकार है[1]-

सांख्य और योग में अन्तर

युधिष्ठिर ने पूछा – तात! धर्मज्ञ कुरुश्रेष्‍ठ! सांख्‍य और योग में क्‍या अन्‍तर है ? यह बताने की कृपा करें; क्‍योंकि आपको सब बातों का ज्ञान है। भीष्‍म जी ने कहा – युधिष्ठिर! सांख्‍य के विद्वान सांख्‍य की और योग के ज्ञाता द्विज योग की प्रशंसा करते हैं। दोनों ही अपने-अपने पक्ष की उत्‍कृष्‍टता सूचित करने के लिये उत्‍तमोत्‍तम युक्तियों का प्रतिपादन करते हैं। शत्रुसूदन! योग के मनीषी विद्वान अपने मत की श्रेष्‍ठता बताते हुए यह युक्ति उपस्थित करते हैं कि ईश्‍वर का अस्तित्‍व स्‍वीकार किये बिना किसी की भी मुक्ति कैसे हो सकती है ? (अत: मोक्षदाता ईश्‍वर की सत्ता अवश्‍य स्‍वीकार करनी चाहिये )। सांख्‍यमत के मानने वाले महाज्ञानी द्विज मोक्ष का युक्तियुक्‍त कारण इस प्रकार बताते हैं-सब प्रकार की गतियों को जानकर जो विषयों से विरक्‍त हो जाता है, वही देहत्‍याग के अनन्‍तर मुक्‍त होता है। यह बात स्‍पष्‍ट रूप से सबकी समझ में आ सकती है। दूसरे किसी उपाय से मोक्ष मिलना असम्‍भव है। इस प्रकार वे सांख्‍य को ही मोक्ष दर्शन कहत हैं। अपने-अपने पक्ष में युक्ति युक्‍त कारण ग्राहृय होता है तथा सिद्धन्‍त के अनुकूल हितकारक वचन मानने योग्‍य समझा जाता है। शिष्‍ट पुरुषो द्वारा सम्‍मानित तुम- जैसे लोगों को श्रेष्‍ठ पुरुषों का ही मत ग्रहण करना चाहिये। योग के विद्वान प्रधानतया प्रत्‍यक्ष प्रमाण को ही मानने वाले होते हैं और सांख्‍य मतानुयायी शास्‍त्र-प्रमाण पर ही विश्‍वास करते हैं। तात युधिष्ठिर! ये दोनों ही मत मुझे तात्त्विक जान पड़ते हैं। नरेश्‍वर! इन दोनों मतों का श्रेष्‍ठ पुरुषों ने आदर किया है। इन दोनों ही मतों को जानकर शास्‍त्र के अनुसार उनका आचरण किया जाय तो वे परमगति की प्राप्ति कर सकते हैं । बाहर-भीतर की पवित्रता, तप, प्राणियों पर दया और व्रतों का पालन आदि नियम दोनों मतों में समान रूप से स्‍वीकार किये गये हैं। केवल उनके दर्शनों में अर्थात पद्धतियोंमें समानता नहीं है।[1]

मतों में उत्तम व्रत

युधिष्ठिर ने पूछा – पितामह! यदि इन दोनों मतों में उत्‍तम व्रत, बाहर-भीतर की पवित्रता और दया समान है एवं दोनों का परिणाम भी एक ही है तो इनके दर्शन में समानता क्‍यों नही है, यह मुझे बताइये। भीष्‍म जी ने कहा- युधिष्ठिर! योगी पुरुष केवल योगबल से राग, मोह, स्‍नेह, काम और क्रोध- इन पाँच दोषों का मूलोच्‍छेद करके परम पद को प्राप्‍त कर लेते हैं। जैसे बड़े-बड़े और मोटे मत्‍स्‍य जाल को काटकर फिर जल में समा जाते हैं, उसी प्रकार योगी अपने पापों का नाश करके परमात्‍मपद को प्राप्‍त करते हैं। राजन! इसी प्रकार जैसे बलवान मृग जाल तोड़कर सारे बन्‍धनों से मुक्‍त हो निर्विध्‍न मार्ग पर चले जाते हैं, वैसे ही योगबल से सम्‍पन्‍न योगी पुरुष लोभजनित सब बन्‍धनों को तोड़कर परम निर्मल कल्‍याणमय मार्ग को प्राप्‍त कर लेते हैं। नरेश्‍वर! जैसे निर्बल मृग तथा दूसरे पशु जाल में पड़कर निस्‍सन्‍देह नष्‍ट हो जाते हैं, उसी प्रकार योगबल से रहित मनुष्‍य की भी दशा होती है। कुन्‍तीनन्‍दन राजेन्‍द्र! जैसे निर्बल मत्‍स्‍य जाल में फँसकर वध को प्राप्‍त होते हैं, वही दशा योगबल से सर्वथा रहित मनुष्‍यों की भी होती है।[1] शत्रुदमन! जैसे निर्बल पक्षी सूक्ष्‍म जाल में फँसकर बन्‍धन को प्राप्‍त हो अपने प्राण खो देते हैं और बलवान पक्षी जाल तोड़कर उसके बन्‍धन से मुक्‍त हो जाते हैं, उसी प्रकार कर्मजनित बन्‍धनों से बँधे हुए निर्बल योगी सर्वथा नष्‍ट हो जाते हैं, किंतु परंतप! योगबल से सम्‍पन्‍न योगी सब प्रकार के बन्‍धनों से छुटकारा पा जाते हैं। राजन! जैसे अल्‍प होने के कारण दुर्बल अग्निपर बड़े-बड़े मोटे ईधन रख देने से वह जलने के बजाय बुझ जाती है, प्रभो! उसी प्रकार निर्बल योगी महान योग के भार से दबकर नष्‍ट हो जाता है। राजन! वही आग जब हवा का सहारा पाकर प्रबल हो जाती है, तब सम्‍पूर्ण पृथ्‍वी को भी तत्‍काल भस्‍म कर सकती है। इसी प्रकार योगी का भी योगबल बढ जाने से जब वह उद्दीप्‍त तेज से सम्‍पन्‍न और महान शक्तिशाली हो जाता है, तब वह जैसे प्रलयकालीन सूर्य समस्‍त जगत को सुखा डालता है, वैसे ही समस्‍त रागादि दोषों का नाश कर देता है। राजन! जैसे दुर्बल मनुष्‍य पानी के वेग से बह जाता है, उसी तरह दुर्बल योगी विवश होकर विषयों की ओर खिंच जाता है। परंतु जल के उसी महान स्‍त्रोत को जैसे गजराज रोक देता है अर्थात उसमें नहीं बहता, उसी प्रकार योग का महान बल पाकर योगी भी उन सभी बहुसंख्‍यक विषयों को अवरुद्ध कर देता है अर्थात उनके प्रवाह में नहीं बहता। कुन्‍तीनन्‍दन! योगशक्ति सम्‍पन्‍न पुरुष स्‍वतन्‍त्रता पूर्वक प्रजापति, ऋषि, देवता और पंचमहाभूतों में प्रवेश कर जाते हैं। उनमें ऐसा करने की सामर्थ्‍य आ जाती है। नरेश्‍वर! अमित तेजस्‍वी योगी पर क्रोध में भरे हुए यमराज, अन्‍तक और भयंकर पराक्रम दिखाने वाली मृत्‍यु का भी शासन नहीं चलता है।[2]-

योगी का योगबल द्वारा हजारों रूप बनाना

भरत श्रेष्‍ठ! योगी योगबल पाकर अपने हजारों रूप बना सकता है और उन सबके द्वारा इस पृथ्‍वी पर विचर सकता है। तात! वह उन शरीरों द्वारा विषयों का सेवन और उग्र तपस्‍या भी करता है। तदनन्‍तर अपनी तेजोमयी किरणों को समेट लेने वाले सूर्य की भाँति सभी रूपों को अपने में लीन कर लेता है। पृथ्‍वीनाथ! बलवान योगी बन्‍धनों को तोड़ने में समर्थ होता है, उसमें अपने को मुक्‍त करने की पूर्ण शक्ति आ जाती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। प्रजापालक नरेश! मैं दृष्‍टान्‍त के लिये योग से प्राप्‍त होने वाली कुछ सूक्ष्‍म शक्तियों का पुन: तुमसे वर्णन करूँगा। प्रभो! भरत श्रेष्‍ठ! आत्‍मसमाधि के लिये जो धारणा की जाती है, उसके विषय में भी कुछ सूक्ष्‍म दृष्‍टान्‍त बतलाता हूँ, सुनो। जैसे सदा सावधान रहने वाला धनुर्धर वीर चित्‍ को एकाग्र करके बाण चलाने पर लक्ष्‍य को अवश्‍य बींध डालता है, उसी प्रकार जो योगी मन को परमात्‍मा के ध्‍यान में लगा देता है, वह निस्‍संदेह मोक्ष को प्राप्‍त कर लेता है। पृथ्‍वीनाथ! जैसे सिर पर रखे हुए तेल से भरे पात्र की ओर मन को स्थिर भाव से लगाये रखने वाला पुरुष एका‍ग्रचित्त हो सीढियों पर चढ जाता है और जरा भी तेल नहीं छलकता, उसी तरह योगी भी योगयुक्‍त होकर जब आत्‍मा को परमात्‍मा में स्थिर करता है, उस समय उसका आत्‍मा अत्‍यन्‍त निर्मल तथा अचल सूर्य के समान तेजस्‍वी हो जाता है।[2] कुन्‍तीकुमार! नृपश्रेष्‍ठ! जैसे सावधान नाविक समुद्र में पड़ी हुई नौका को शीघ्र ही किनारे पर लगा देता है, उसी प्रकार योग के अनुसार तत्‍व को जानने वाला पुरुष समाधि के द्वारा मन को परमात्‍मा में लगाकर इस देह का त्‍याग करने के अनन्‍तर दुर्गम स्‍थान (परमधाम) को प्राप्‍त होता है। पुरुषप्रवर! राजन! जिस तरह अत्‍यन्‍त सावधान रहने वाला सारथि अच्‍छे घोड़ों को रथ में जोतकर धनुर्धर योद्धा को तुरंत ही अभीष्‍ट स्‍थान पर पहुँचा देता है, वैसे ही धारणाओं में एकाग्रचित्त हुआ योगी लक्ष्‍य की ओर छोड़े हुए बाण की भाँति शीघ्र परम पद को प्राप्‍त हो जाता है। जो योगी समाधि के द्वारा आत्‍मा को परमात्‍मा में स्थिर करके अचल हो जाता है, वह अपने पाप को नष्‍ट कर देता है और पवित्र पुरुषों को प्राप्‍त होने वाले अविनाशी पद को पा लेता है। अमित पराक्रमी नरेश! योग के महान व्रत में एकाग्रचित्त रहने वाला जो योगी नाभि, कण्‍ठ, मस्‍तक, हृदय, वृक्ष:स्‍थल, पार्श्‍वभाग, नेत्र, कान और नासिका आदि स्‍थानों में धारणा के द्वारा सूक्ष्‍म आत्‍मा को परमात्‍मा के साथ भलीभाँति संयुक्‍त करता है, वह यदि इच्‍छा करे तो अपने पर्वताकार विशाल शुभाशुभ कर्मों को शीघ्र ही भस्‍म करके उत्‍तम योग का आश्रय लेकर मुक्‍त हो जाता है।[3]-

योगी द्वारा किस प्रकार योगशक्ति प्राप्त करना

युधिष्ठिर ने पूछा- भरतनन्‍दन! योगी कैसे आहार करके और किन-किन को जीतकर योगशक्ति प्राप्‍त कर लेता है, यह आप मुझे बताने की कृपा करें। भीष्‍म जी ने कहा – भारत! जो धान की खुद्दी और तिल की खली खाता तथा घी-तेल का परित्‍याग कर देता है, उसी योगी को योगबल की प्राप्ति होती है। शत्रुदमन नरेश! जो दीर्घकाल तक एक समय जौ का रूखा दलिया खाता है, वह योगी शुद्धचित होकर योगबल की प्राप्ति कर सकता है। जो योगी दुग्‍धमिश्रित जल को दिन में एक बार पीता है; फिर पंद्रह दिनों में एक बार पीता है। तत्‍पश्‍चात एक महीने में, एक ॠतु में और एक वर्ष में एकबार उसे ग्रहण करता है, उसको योगशक्ति प्राप्‍त होती है। नरेश्‍वर! जो लगातार जीवन भर के लिये मांस नहीं खाता है और विधिपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करके अपने अन्‍त: करण को शुद्ध बना लेता है, वह योगी भी योगशक्ति प्राप्‍त कर लेता है। पृथ्‍वीनाथ! नृपश्रेष्‍ठ! काम, क्रोध, सर्दी, गर्मी, वर्षा, भय, शोक, श्‍वास, मनुष्‍यों को प्रिय लगने वाले विषय, दुर्जय असंतोष, घोर तृष्‍णा, स्‍पर्श, निद्रा तथा दुर्जय आलस्‍य को जीतकर वीतराग, महान एवं उत्‍तम बुद्धि से युक्‍त महात्‍मा योगी स्‍वाध्‍याय तथा ध्‍यान का सम्‍पादन करके बुद्धि के द्वारा सूक्ष्‍म आत्‍मा का साक्षात्‍कार कर लेते हैं। भरतश्रेष्‍ठ! विद्वान ब्राह्मणों ने योग के इस मार्ग को दुर्गम माना है। कोई बिरला ही इस मार्ग को कुशलपूर्वक कर स‍कता है।[3] जैसे कोई-कोई बिरला नवयुवक ही अनेकानेक सर्पों तथा बिच्‍छू आदि से भरे हुए गड्ढों और बहुत से काँटों वाले, जलशून्‍य, दुर्गम एवं घोर वन में सकुशल यात्रा कर सकता है तथा जहाँ भोजन मिलना असम्‍भव है, जिसमें प्राय: जंगल-ही-जंगल पड़ता है, जहाँ के वृक्ष दावानल से जलकर भस्‍म हो गये हैं तथा जो चोर-डाकुओं से भरा हुआ है, ऐसे मार्ग को सकुशल तय कर सकता है; उसी प्रकार योगमार्ग आश्रय लेकर कोई बिरला ही द्विज उस पर कुशलपूर्वक चल पाता है, क्‍योंकि वह बहुत-से दोषों (कठिनाइयों) – से भरा हुआ बताया गया है। पृथ्‍वीपते! छुरे की तीखी धार पर कोई सुखपूर्वक खड़ा रह सकता है; किंतु जिनका चित्‍ शुद्ध नही है, ऐसे मनुष्‍यों का योग की धारणाओं में स्थिर रहना नितान्‍त कठिन है। तात! नरेश्‍वर! जैसे समुद्र में बिना नाविक की नाव मनुष्‍यों को पार नही लगा सकती, उसी प्रकार यदि योग की धारणाएँ सिद्ध न हुई तो वे शुभगति की प्रा‍प्ति नही करा सकती। कुन्‍तीनन्‍दन! जो विधिपूर्वक योग की धारणाओं में स्थिर रहता है, वह जन्‍म, मृत्‍यु, दुख और सुख के बन्‍धनों से छुटकारा पा जाता है। यह मैंने तुम्‍हें योगविषयक नाना शास्‍त्रों का सिद्धान्‍त बतलाया है। योग-साधना का जो-जो कृत्‍य है, वह द्विजातियों के लिये ही निश्चित किया गया है अर्थात उन्‍हीं का उसमें अधिकार है। महात्‍मन! योगसिद्ध महात्‍मा पुरुष यदि चाहै तो तुरंत ही मुक्‍त होकर महान परब्रह्म के स्‍वरूप को प्राप्‍त कर लेता है अथवा वह अपने योगबल से भगवान ब्रह्मा, वरदायक विष्‍णु, महादेवजी, धर्म, छ: मुखों वाले कार्तिकेय, ब्रह्माजी के महानुभाव पुत्र सनकादि, कष्‍टदायक तमोगुण, महान रजोगुण, विशुद्ध सत्‍वगुण, मूल प्रकृति, वरुणपत्‍नी सिद्धिदेवी, सम्‍पूर्ण तेज, महान धैर्य, ताराओं सहित आकाश में प्रकाशित होने वाले निर्मल तारापति चन्‍द्रमा, विश्‍वेदेव, नाग, पितर, सम्‍पूर्ण पर्वत, भयंकर समुद्र, सम्‍पूर्ण नदी-समुदाय, वन, मेघ, नाग, वृक्ष, यक्ष, दिशा, गन्‍धर्वगण, समस्‍त पुरुष और स्‍त्री -इनमें प्रत्‍येक के पास पहुँचकर उसके भीतर प्रवेश कर सकता है। नरेश्‍वर! महान बल और बुद्धि से सम्‍पन्‍न परमात्‍मा से संबन्‍ध रखने वाली यह कल्‍याणमयी वार्ता मैंने प्रसंगवश तुम्‍हें सुनायी है। योगसिद्ध महात्‍मा पुरुष सब मनुष्‍यों से ऊपर उठकर नारायणस्‍वरूप हो जाता है और संकल्‍पमात्र से सृष्टि करने लगता है।[4]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 300 श्लोक 1-16
  2. 2.0 2.1 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 300 श्लोक 17-33
  3. 3.0 3.1 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 300 श्लोक 17-33
  4. महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 300 श्लोक 51-62

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राजधर्मानुशासन पर्व
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युधिष्ठिर को समझाना | व्यास का युधिष्ठिर को समझाते हुए देवासुर संग्राम का औचित्य सिद्ध करना | कर्मों को करने और न करने का विवेचन | पापकर्म के प्रायश्चितों का वर्णन | स्वायम्भुव मनु के कथानुसार का धर्म का स्वरूप | पाप से शुद्धि के लिए प्रायश्चित | अभक्ष्य वस्तुओं का वर्णन | दान के अधिकारी एवं अनधिकारी का विवेचन | व्यासजी और श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर का नगर में प्रवेश | नगर प्रवेश के समय पुरवासियों एवं ब्राह्मणों द्वारा राजा युधिष्ठिर का सत्कार | चार्वाक का ब्राह्मणों द्वारा वध | चार्वाक को प्राप्त हुए वर आदि का श्रीकृष्ण द्वारा वर्णन | युधिष्ठिर का राज्याभिषेक | युधिष्ठिर का धृतराष्ट्र के अधीन रहकर राज्य व्यवस्था के लिए अपने का भाइयों को नियुक्त करना | युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र का युद्ध में मारे गये सगे-संबंधियों का श्राद्धकर्म करना | युधिष्ठिर द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति | युधिष्ठिर द्वारा दिये हुए भवनों में सभी भाइयों का प्रवेश और विश्राम | युधिष्ठिर द्वारा ब्राह्मणों एवं आश्रितों का सत्कार | युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण का संवाद | श्रीकृष्ण द्वारा भीष्म की प्रशंसा तथा युधिष्ठिर को उनके पास चलने का आदेश | भीष्म द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति-भीष्मस्तवराज | परशुराम द्वारा होने वाले क्षत्रिय संहार के विषय में युधिष्ठिर का प्रश्न | परशुराम के उपाख्यान क्षत्रियों का विनाश तथा पुन: उत्पन्न होने की कथा | श्रीकृष्ण द्वारा भीष्म के गुण-प्रभाव का वर्णन | श्रीकृष्ण का भीष्म की प्रशंसा करते हुए उन्हें युधिष्ठिर को धर्मोपदेश देने का आदेश देना | भीष्म द्वारा अपनी असर्मथता प्रकट करने पर भगवान श्रीकृष्ण का उन्हें वर देना | पाण्डवों व ऋषियों का भीष्म से विदा लेना | श्रीकृष्ण की प्रातश्चर्या | सात्यकि द्वारा कृष्ण का संदेश पाकर युधिष्ठिर का भाइयों सहित कुरुक्षेत्र में आना | श्रीकृष्ण और भीष्म की बातचीत | भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को गुण-कथनपूर्वक प्रश्न करने का आदेश देना | भीष्म के आश्वासन पर युधिष्ठिर का उनके समीप जाना | युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म द्वारा राजधर्म का वर्णन | राजा के लिए पुरुषार्थ, सत्य, ब्राह्मणों की अदण्डनीयता | राजा की परिहासशीलता तथा मृदुता में प्रकट होने वाले दोष | राजा द्वारा धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्ताव का वर्णन | भीष्म द्वारा राज्यरक्षा का वर्णन | युधिष्ठिर का 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उत्तम-अधम ब्राह्मणों के साथ राजा का बर्ताव | केकयराजा तथा राक्षस का उपख्यान | केकयराजा की श्रेष्ठता का विस्तृत वर्णन | आपत्तिकाल में ब्राह्मण के लिए वैश्यवृत्ति से निर्वाह करने की छूट | लुटेरों से रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने का अधिकार | रक्षक को सम्मान का पात्र स्वीकार करना | ऋत्विजों के लक्षण | यज्ञ और दक्षिणा का महत्व | तप की श्रेष्ठता | राजा के लिए मित्र और अमित्र की पहचान और उनके साथ नीतिपूर्ण बर्ताव | मन्त्री के लक्षणों का वर्णन | कुटुम्बीजनों में दलबंदी होने पर कुल के प्रधान पुरुष के कार्य | श्री कृष्ण और नारद जी का संवाद | मंत्रियों की परीक्षा तथा राजा और राजकीय मनुष्यों से सतर्कता | कालकवृक्षीय मुनि का उपख्यान | सभासद आदि के लक्षण | गुप्त सलाह सुनने के अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणा की विधि एवं निर्देश | इन्द्र और वृहस्पति के संवाद में मधुर वचन बोलने का महत्व | राजा की व्यावहारिक नीति व मंत्रीमण्डल का संघटन | दण्ड का औचित्य तथा दूत व सेनापति के गुण | राजा के निवासयोग्य नगर एवं दुर्ग का वर्णन | प्रजापालन व्यवहार तथा तपस्वीजनों के समादर का निर्देश | राष्ट्र की रक्षा तथा 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राजधर्म का साररूप में वर्णन | दण्ड के स्वरूप, नाम, लक्षण और प्रयोग का वर्णन | दण्ड की उत्पत्ति का वर्णन | दण्ड का क्षत्रियों कें हाथ में आने की परम्परा का वर्णन | त्रिवर्ग के विचार का वर्णन | पाप के कारण राजा के पुनरुत्थान के विषय में आंगरिष्ठ और कामन्दक का संवाद | इन्द्र और प्रह्लाद की कथा | शील का प्रभाव, अभाव में धर्म, सत्य, सदाचार और लक्ष्मी के न रहने का वर्णन | सुमित्र और ऋषभ ऋषि की कथा | राजा सुमित्र का मृग की खोज में तपस्वी मुनियों के आश्रम पर पहुँचना | सुमित्र का मुनियों से आशा के विषय में प्रश्न करना | ऋषभ का सुमित्र को वीरद्युम्न व तनु मुनि का वृतान्त सुनाना | तनु मुनि का वीरद्युम्न को आशा के स्वरूप का परिचय देना | ऋषभ के उपदेश से सुमित्र का आशा को त्याग देना | यम और गौतम का संवाद | आपत्ति के समय राजा का धर्म

आपद्धर्म पर्व

आपत्तिग्रस्त राजा के कर्त्तव्य का वर्णन | ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओं के धर्म का वर्णन | धर्म की गति को सूक्ष्म बताना | राजा के लिए कोश संग्रह की आवश्यकता | मर्यादा की स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्ति की निन्दा | बल की महत्ता और पाप से छूटने का प्रायश्रित्त | मर्यादा का पालन करने वाले कायव्य दस्यु की सद्गति का वर्णन | राजा के द्वारा किसका धन लेने व न लेने तथा कैसे बर्ताव करे इसके विचार का वर्णन | शत्रुओं से घिरे राजा के कृर्त्तव्य का वर्णन | राजा के कृर्त्तव्य के विषय में बिडाल व चूहे का आख्यान | शत्रु से सावधान रहने के विषय में राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़िया का संवाद | भारद्वाज कणिक का सौराष्ट्रदेश के राजा को कूटनीति का उपदेश | विश्वामित्र और चाण्डाल का संवाद | आपत्काल में धर्म का निश्चय | उत्तम ब्राह्मणों के सेवन का आदेश | बहेलिये और कपोत-कपोती का प्रसंग | कबूतर द्वारा अपनी भार्या का गुणगान व पतिव्रता स्त्री की प्रशंसा | कबूतरी का कबूतर से शरणागत व्याध की सेवा के लिए प्रार्थना | कबूतर द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीर का बहेलिये के लिए परित्याग | बहेलिये का वैराग्य | कबूतरी का विलाप और अग्नि में प्रवेश कर उन दोनों को स्‍वर्गलोक की प्राप्ति | बहेलिये को स्‍वर्गलोक की प्राप्ति | इन्द्रोत मुनि का जनमेजय को फटकारना | जनमेजय का इन्द्रोत मुनि की शरण में जाना | इन्द्रोत का जनमेजय को शरण देना | इन्द्रोत का जनमेजय को धर्मोपदेश देना | ब्राह्मण बालक के जीवित होने की कथा | नारद जी का सेमल वृक्ष से प्रश्न | नारद जी का सेमल को उसका अहंकार देखकर फटकारना | वायु का सेमल को धमकाना और सेमल का विचारमग्न होना | सेमल का हार स्वीकार कर बलवान के साथ वैर न करने का उपदेश | समस्त अनर्थो का कारण लोभ को बताकर उसने होने वाले पापों का वर्णन | श्रेष्ठ महापुरुषों के लक्षण | अज्ञान और लोभ को ही समस्त दोषों का कारण सिद्ध करना | मन और इंद्रियों के संयम रूप दम का माहात्म्य | तप की महिमा | सत्य के लक्षण, स्वरूप और महिमा का वर्णन | काम, क्रोध आदि दोषों का निरूपण व नाश का उपाय | नृशंस अर्थात अत्यन्त नीच पुरुष के लक्षण | नाना प्रकार के पापों और प्रायश्रितों का वर्णन | खड्ग की उत्पत्ति और प्राप्ति व महिमा का वर्णन | धर्म, अर्थ और काम के विषय में विदुर व पाण्डवों के पृथक-पृथक विचार | अन्त में युधिष्ठिर का निर्णय | मित्र बनाने व न बनाने योग्य पुरुषों के लक्षण | कृतघ्न गौतम की कथा का आरम्भ | गौतम का समुद्र की ओर प्रस्थान व बकपक्षी के घर पर अतिथि होना | गौतम का आतिथ्यसत्कार व विरूपाक्ष के भवन में प्रवेश | गौतम का राक्षसराज के यहाँ से सुर्वणराशि लेकर लौटना | गौतम का अपने मित्र बक के वध का विचार मन में लाना | कृतघ्न गौतम द्वारा राजधर्मा का वध | राक्षसों द्वार कृतघ्न की हत्या व उसके माँस को अभक्ष्य बताना | राजधर्मा और गौतम का पुन: जीवित होना

मोक्षधर्म पर्व

शोकाकुल चित्त की शांति के लिए सेनजित और ब्राह्मण संवाद | पिता के प्रति पुत्रद्वारा ज्ञान का उपदेश | त्याग की महिमा के विषय में शम्पाक का उपदेश | धन की तृष्णा से दु:ख का वर्णन | धन के त्याग से परम सुख की प्राप्ति | जनक की उक्ति तथा राजा नहुष के प्रश्नों के उत्तर मे बोध्यगीता | प्रह्लाद और अवधूत का संवाद | आजगर वृत्ति की प्रशंसा का वर्णन | काश्यप ब्राह्मण और इन्द्र का संवाद | शुभाशुभ कर्मों के परिणाम कर्ता को भोगने का प्रतिपादन | भरद्वाज और भृगु के संवाद में जगत की उत्पत्ति का वर्णन | आकाश से अन्य चार स्थूल भूतों की उत्पत्ति का वर्णन | पंचमहाभूतों के गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन | शरीर के भीतर जठरानल आदि वायुओं की स्थिति का वर्णन | जीव की सत्ता पर अनेक युक्तियों से शंका उपस्थित करना | जीव की सत्ता तथा नित्यता को युक्तियों से सिद्ध करना | मनुष्यों की और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन | कर्मो का और सदाचार का वर्णन | वैराग्य से परब्रह्मा की प्राप्ति | सत्य की महिमा, असत्य के दोष व लोक और परलोक के सुख-दु:ख का विवेचन | ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमों के धर्म का वर्णन | वानप्रस्थ और संन्यास धर्मों का वर्णन | हिमालय के उत्तर में स्थित लोक की विलक्षणता व महत्ता का प्रतिपादन | भृगु और भरद्वाज के संवाद का उपसंहार | शिष्टाचार का फलसहित वर्णन | पाप को छिपाने से हानि और धर्म की प्रशंसा | अध्यात्मज्ञान का निरूपण | ध्यानयोग का वर्णन | जपयज्ञ के विषय में युधिष्ठिर का प्रश्न | जप और ध्यान की महिमा और उसका फल | जापक में दोष आने के कारण उसे नरक की प्राप्ति | जापक के लिए देवलोक भी नरक तुल्य इसके प्रतिपादन का वर्णन | जापक को सावित्री का वरदान | धर्म, यम और काल का आगमन | राजा इक्ष्वाकु और ब्राह्मण का संवाद | सत्य की महिमा तथा जापक की गति का वर्णन | ब्राह्मण और इक्ष्वाकु की उत्तम गति का वर्णन | जापक को मिलने वाले फल की उत्कृष्टता | मनु द्वारा कामनाओं के त्याग एवं ज्ञान की प्रशंसा | परमात्मतत्त्व का निरूपण | आत्मतत्त्व और बुद्धि आदि पदार्थों का विवेचन | साक्षात्कार का उपाय | शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धि से आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन | आत्मा व परमात्मा के साक्षात्कार का उपाय तथा महत्त्व | परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | मनु बृहस्पति संवाद की समाप्ति | श्री कृष्ण से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति | श्री कृष्ण की महिमा का कथन | ब्रह्मा के पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियों के वंश का वर्णन | प्रत्येक दिशा में निवास करने वाले महर्षियों का वर्णन | विष्णु का वराहरूप में प्रकट हो देवताओं की रक्षा और दानवों का विनाश | नारद को अनुस्मृतिस्तोत्र का उपदेश | नारद द्वारा भगवान की स्तुति | श्री कृष्ण सम्बन्धी अध्यात्मतत्तव का वर्णन | संसारचक्र और जीवात्मा की स्थिति का वर्णन | निषिद्ध आचरण के त्याग आदि के परिणाम तथा सत्त्वगुण के सेवन का उपदेश | जीवोत्पत्ति के दोष और बंधनों से मुक्त तथा विषय शक्ति के त्याग का उपदेश | ब्रह्मचर्य तथा वैराग्य से मुक्ति | आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्म की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने के उपदेश | स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्था में मन की स्थिति का वर्णन | गुणातीत ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | सच्चिदान्नदघन परमात्मा, दश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष उन चारों के ज्ञान से मुक्ति का वर्णन | परमात्मा प्राप्ति के अन्य साधनों का वर्णन | राजा जनक के दरबार में पञ्चशिख का आगमन | नास्तिक मतों के निराकरणपूर्वक शरीर से भिन्न आत्मा की नित्य सत्ता का प्रतिपादन | पञ्चशिख के द्वारा मोक्षतत्त्व के विवेचन का वर्णन | विष्णु द्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेव की परीक्षा और उनके के लिए वर प्रदान | श्वेतकेतु और सुवर्चला का विवाह | पति-पत्नी का अध्यात्मविषयक संवाद | दम की महिमा का वर्णन | व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथि सेवा का विवेचन | सनत्कुमार का ऋषियों को भगवत्स्वरूप का उपदेश | इंद्र और प्रह्लाद का संवाद | इन्द्र के आक्षेप युक्त वचनों का बलि के द्वारा कठोर प्रत्युत्तर | बलि और इन्द्र का संवाद | बलि द्वारा इन्द्र को फटकारना | इन्द्र और लक्ष्मी का संवाद | बलि को त्यागकर आयी हुई लक्ष्मी की इन्द्र के द्वारा प्रतिष्ठा | इन्द्र और नमुचि का संवाद | काल और प्रारब्ध की महिमा का वर्णन | लक्ष्मी का दैत्यों को त्यागकर इन्द्र के पास आना | सद्गुणों पर लक्ष्मी का आना व दुर्गुणों पर त्यागकर जाने का वर्णन | जैगीषव्य का असित-देवल को समत्वबुद्धि का उपदेश | श्रीकृष्ण और उग्रसेन का संवाद | शुकदेव के प्रश्नों के उत्तर में व्यास जी द्वारा काल का स्वरूप बताना | व्यास जी का शुकदेव को सृष्टि के उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मों का उपदेश | ब्राह्मप्रलय एंव महाप्रलय का वर्णन | ब्राह्मणों का कर्तव्य और उन्हें दान देने की महिमा का वर्णन | ब्राह्मण के कर्तव्य का प्रतिपादन करते हुए कालरूप नद को पार करने का उपाय | ध्यान के सहायक योग | फल और सात प्रकार की धारणाओं का वर्णन | मोक्ष की प्राप्ति | सृष्टि के समस्त कार्यों में बुद्धि की प्रधानता | प्राणियों की श्रेष्ठता के तारतम्य का वर्णन | नाना प्रकार के भूतों की समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्व का विवेचन | युगधर्म का वर्णन एवं काल का महत्त्व | ज्ञान का साधन और उसकी महिमा | योग से परमात्मा की प्राप्ति का वर्णन | कर्म और ज्ञान का अन्तर | ब्रह्मप्राप्ति के उपाय का वर्णन | ब्रह्मचर्य-आश्रम का वर्णन | गार्हस्थ्य-धर्म का वर्णन | वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रम के धर्म और महिमा का वर्णन | संन्यासी के आचरण | ज्ञानवान संन्यासी का प्रशंसा | परमात्मा की श्रेष्ठता व दर्शन का उपाय | ज्ञानमय उपदेश के पात्र का निर्णय | महाभूतादि तत्त्वों का विवेचन | बुद्धि की श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक | ज्ञान के साधन व ज्ञानी के लक्षण और महिमा | परमात्मा की प्राप्ति का साधन | ज्ञान से ब्रह्म की प्राप्ति | ब्रह्मवेत्ता के लक्षण व परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | शरीर में पंचभूतों के कार्य व गुणों की पहचान | जीवात्मा और परमात्मा का योग द्वारा साक्षात्कार | कामरूपी अद्भुत वृक्ष व शरीर रूपी नगर का वर्णन | मन और बुद्धि के गुणों का विस्तृत वर्णन | युधिष्ठिर का मृत्युविषयक प्रश्न व ब्रह्मा की रोषाग्नि से प्रजा के दग्ध होने का वर्णन | ब्रह्मा के द्वारा रोषाग्नि का उपसंहार व मृत्यु की उत्पत्ति | मृत्यु की तपस्या व प्रजापति की आज्ञा से मृत्यु का प्राणियों के संहार का कार्य स्वीकार करना | धर्माधर्म के स्वरूप का निर्णय | युधिष्ठिर का धर्म की प्रमाणिकता पर संदेह उपस्थित करना | जाजलि की घोर तपस्या व जटाओं में पक्षियों का घोंसला बनाने से उनका अभिमान | आकाशवाणी की प्रेरणा से जाजलि का तुलाधार वैश्य के पास जाना | जाजलि और तुलाधार का धर्म के विषय में संवाद | जाजलि को तुलाधार का आत्मयज्ञविषयक धर्म का उपदेश | जाजलि को पक्षियों का उपदेश | राजा विचख्नु के द्बारा अहिंसा-धर्म की प्रशंसा | महर्षि गौतम और चिरकारी का उपाख्यान | दीर्घकाल तक सोच-विचारकर कार्य करने की प्रशंसा | द्युमत्सेन और सत्यवान का संवाद | अहिंसापूर्वक राज्यशासन की श्रेष्ठता का कथन | स्यूमरश्मि और कपिल का संवाद | प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्ग के विषय में स्यूमरश्मि व कपिल संवाद | चारों आश्रमों में उत्तम साधनों के द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति का कथन | ब्रह्मण और कुण्डधार मेघ की कथा | यज्ञ में हिंसा की निंदा और अहिंसा की प्रशंसा | धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्ष के विषय में युधिष्ठिर के प्रश्न | मोक्ष के साधन का वर्णन | नारद और असितदेवल का संवाद | तृष्णा के परित्याग के विषय में माण्डव्य मुनि और जनक का संवाद | पिता और पुत्र का संवाद | हारित मुनि के द्वारा आचरण व धर्मों का वर्णन | ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | ब्रह्म की प्राप्ति के विषय में वृत्र और शुक्र का संवाद | वृत्रासुर को सनत्कुमार का आध्यात्मविषयक उपदेश | भीष्म द्वारा युधिष्ठिर की शंका निवारण | इन्द्र और वृत्रासुर के युद्ध का वर्णन | वृत्रासुर के वध से प्रकट हुई ब्रह्महत्या का ब्रह्मा जी के द्वारा चार स्थानों में विभाजन | शिवजी के द्वारा दक्ष के यज्ञ का भंग | शिवजी के क्रोध से ज्वर की उत्पत्ति व उसके विविध रूप | पार्वती के रोष के निवारण के लिए शिव द्वारा दक्ष-यज्ञ का विध्वंस | महादेव जी का दक्ष को वरदान | स्तोत्र की महिमा | अध्यात्म ज्ञान और उसके फल का वर्णन | समंग द्वारा नारद जी से अपनी शोकहीन स्थिति का वर्णन | नारद जी द्वारा गालव मुनि को श्रेय का उपदेश | अरिष्टनेमि का राजा सगर को मोक्षविषयक उपदेश | उशना का चरित्र | उशना को शुक्र नाम की प्राप्ति | पराशर मुनि का राजा जनक को कल्याण की प्राप्ति के साधन का उपदेश | कर्मफल की अनिवार्यता | कर्मफल से लाभ | धर्मोपार्जित धन की श्रेष्ठता, व अतिथि-सत्कार का महत्त्व | गुरुजनों की सेवा से लाभ | सत्संग की महिमा व धर्मपालन का महत्त्व | ब्राह्मण और शूद्र की जीविका | मनुष्यों में आसुरभाव की उत्पत्ति व शिव के द्वारा उसका निवारण | विषयासक्त मनुष्य का पतन | तपोबल की श्रेष्ठता व दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालन का आदेश | वर्ण विशेष की उत्पत्ति का रहस्य | हिंसारहित धर्म का वर्णन | धर्म व कर्तव्यों का उपदेश | राजा जनक के विविध प्रश्नों का उत्तर | ब्रह्मा को साध्यगणों को उपदेश | योगमार्ग के स्वरूप, साधन, फल और प्रभाव का वर्णन | सांख्ययोग के अनुसार साधन का वर्णन | सांख्ययोग के फल का वर्णन | वसिष्ठ और करालजनक का संवाद | प्रकृति-संसर्ग के कारण जीव का बारंबार जन्म ग्रहण करना | प्रकृति के संसर्ग दोष से जीव का पतन | क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुष के विषय में राजा जनक की शंका | योग और सांख्य के स्वरूप का वर्णन तथा आत्मज्ञान से मुक्ति | विद्या-अविद्या व पुरुष के स्वरूप के उद्गार का वर्णन | वसिष्ठ व जनक संवाद का उपसंहार | जनकवंशी वसुमान को मुनि का धर्मविषयक उपदेश | याज्ञवल्क्य का जनक को उपदेश | इन्द्रियों में मन की प्रधानता का प्रतिदान | संहार क्रम का वर्णन | अध्यात्म व अधिभूत वर्णन तथा राजस और तामस के भावों के लक्षण | राजा जनक के प्रश्न | प्रकृति पुरुष का विवेक और उसका फल | योग का वर्णन व उससे परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति | मृत्यु सूचक लक्षण व मृत्यु को जीतने का उपाय | याज्ञयवल्क्य द्वारा सूर्य से वेदज्ञान की प्राप्ति का प्रसंग सुनाना | विश्वावसु को जीवात्मा और परमात्मा की एकता के ज्ञान का उपदेश देना | याज्ञवल्क्य का जनक को उपदेश देकर विदा होना | पञ्चशिख और जनक का संवाद | सुलभा का राजा जनक के शरीर में प्रवेश करना | राजा जनक का सुलभा पर दोषारोपण करना | सुलभा का राजा जनक को अज्ञानी बताना | व्यास जी का शुकदेव को धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना | शुभाशुभ कर्मों के परिणाम का वर्णन | शंकर द्वारा व्यास को पुत्रप्राप्ति के लिये वरदान देना | शुकदेव की उत्पति तथा संस्कार का वृतान्त | पिता की आज्ञा से शुकदेव का मिथिला में जाना | शुकदेव का ध्यान में स्थित होना | राजा जनक द्वारा शुकदेव जी का पूजन तथा उनके प्रश्न का समाधान | जनक द्वारा बह्मचर्याश्रम में परमात्मा की प्राप्ति | शुकदेव द्वारा मुक्त पुरुष के लक्षणों का वर्णन | शुकदेव का पिता के पास लौट आना


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