यदुवंश का नाश

विदुर जब तीर्थयात्रा से लौट रहे थे, तब यमुना के तट पर उनकी भेंट भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के परम भक्त और सखा उद्धव जी से हुई और विदुर जी ने उनसे भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का हाल पूछा। रुँधे कंठ से उद्धव ने बताया- “हे विदुर जी! महाभारत के युद्ध के पश्चात् सान्तवना देने के उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी गांधारी के पास गये। गांधारी अपने सौ पुत्रों की मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल थी। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दे दिया कि तुम्हारे कारण से जिस प्रकार से मेरे सौ पुत्रों का आपस में लड़ करके नाश हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे यदुवंश का भी आपस में एक-दूसरे को मारने के कारण नाश हो जायेगा। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने माता गांधारी के उस श्राप को पूर्ण करने के लिये यादवों की मति को फेर दिया।

अंधक-वृष्णि यादव बड़ी संख्या में महाभारत युद्ध में काम आये थे, जो शेष बचे वे आपस में मिल-जुल कर अधिक समय तक न रह सके। श्रीकृष्ण-बलराम अब काफ़ी वृद्ध हो चुके थे और संभवत: यादवों के ऊपर उनका प्रभाव भी कम हो गया था। पौराणिक विवरणों से पता चलता है कि यादवों में विकास की वृद्धि हो चली थी और ये मदिरा-पान अधिक करने लगे थे। कृष्ण-बलराम के समझाने पर भी ऐश्वर्य से मत्त यादव न माने और वे कई दलों में विभक्त हो गये।

एक दिन प्रभास के मेले में, जब यादव लोग वारुणी के नशे में चूर थे, वे आपस में लड़ने लगे। वह झगड़ा इतना बढ़ गया कि अंत में वे सामूहिक रूप से कट मरे। इस प्रकार यादवों ने गृह-युद्ध कर अपना अन्त कर लिया।[1] इस तरह से भगवान श्रीकृष्णचन्द्र को छोड़कर एक भी यादव जीवित न बचा।

श्रीमद्भागवत महापुराण का उल्लेख

'श्रीमद्भागवत महापुराण'[2] के अनुसार- राजा परीक्षित ने पूछा-"भगवन! जब महाभागवत उद्धवजी बदरीवन को चले गये, तब भूतभावन भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका में क्या लीला रची? प्रभो! यदुवंशशिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने कुल के ब्रह्मशाप ग्रस्त होने पर सबके नेत्रादि इन्द्रियों के परम प्रिय अपने दिव्य श्रीविग्रह की लीला का संवरण कैसे किया? भगवन! जब स्त्रियों के नेत्र उनके श्रीविग्रह में लग जाते थे, तब वे उन्हें वहाँ से हटाने में असमर्थ हो जाती थीं। जब संत पुरुष उनकी रूपमाधुरी का वर्णन सुनते हैं, तब वह श्रीविग्रह कानों के रास्ते प्रवेश करके उनके चित्त में गड़-सा जाता है, वहाँ से हटना नहीं जानता। उसकी शोभा कवियों की काव्यरचना में अनुराग का रंग भर देती है और उनका सम्मान बढ़ा देती हैं, इसके सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है। महाभारत युद्ध के समय जब वे हमारे दादा अर्जुन के रथ पर बैठे हुए थे, उस समय जिन योद्धाओं ने उसे देखते-देखते शरीर-त्याग किया; उन्हें सारुप्यमुक्ति मिल गयी। उन्होंने अपना ऐसा अद्भुत श्रीविग्रह किस प्रकार अन्तर्धान किया?"

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "परीक्षित! जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में बड़े-बड़े उत्पात-अपशकुन हो रहे हैं, तब उन्होंने सुधर्मा-सभा में उपस्थित सभी यदुवंशियों से यह बात कही- "श्रेष्ठ यदुवंशियों! यह देखो, द्वारका में बड़े-बड़े भयंकर उत्पात होने लगे हैं। ये साक्षात यमराज की ध्वजा के समान हमारे महान अनिष्ट के सूचक हैं। अब हमें यहाँ घड़ी-दो-घड़ी भी नहीं ठहरना चाहिये। स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े यहाँ से शंखद्धार क्षेत्र में चल जायँ और हम लोग प्रभास क्षेत्र में चलें। आप सब जानते हैं कि वहाँ सरस्वती पश्चिम की ओर बहकर समुद्र में जा मिली हैं। वहाँ हम स्नान करके पवित्र होंगे, उपवास करेंगे और एकाग्रचित्त से स्नान एवं चन्दन आदि सामग्रियों से देवताओं की पूजा करेंगे। वहाँ स्वस्तिवाचन के बाद हम लोग गौ, भूमि, सोना, वस्त्र, हाथी, घोड़े, रथ और घर आदि के द्वारा महात्मा ब्राह्मणों का सत्कार करेंगे। यह विधि सब प्रकार के अमंगलों का नाश करने वाली और परम मंगल की जननी है। श्रेष्ठ यदुवंशियों! देवता, ब्राह्मण और गौओं की पूजा ही प्राणियों के जन्म का परम लाभ है।"

परीक्षित! सभी वृद्ध यदुवंशियों ने भगवान श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर ‘तथास्तु’ कहकर उसका अनुमोदन किया और तुरंत नौकाओं से समुद्र पार करके रथों द्वारा प्रभास क्षेत्र की यात्रा की। वहाँ पहुँचकर यादवों ने यदुवंशशिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण के आदेशानुसार बड़ी श्रद्धा और भक्ति से शान्ति पाठ आदि तथा और भी सब प्रकार के मंगल कृत्य किये। यह सब तो उन्होंने किया; परन्तु दैव ने उनकी बुद्धि हर ली और वे उस 'मैरेयक' नामक मदिरा का पान करने लगे, जिसके नशे से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। वह पीने में तो अवश्य मीठी लगती है, परन्तु परिणाम में सर्वनाश करने वाली है। उस तीव्र मदिरा के पान से सब-के-सब उन्मत्त हो गये और वे घमंडी वीर एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने लगे। सच पूछो तो श्रीकृष्ण की माया से मूढ़ हो रहे थे। उस समय वे क्रोध से भरकर एक-दूसरे पर आक्रमण करने लगे और धनुष-बाण, तलवार, भाले, गदा, तोमर और ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रों से वहाँ समुद्र तट पर ही एक-दूसरे से भिड गये।

मतवाले यदुवंशी रथों, हाथियों, घोड़ों, गधों, ऊँटों, खच्चरों, बैलों, भैसों और मनुष्यों पर भी सवार होकर एक-दूसरे को बाणों से घायल करने लगे-मानो जंगली हाथी एक-दूसरे पर दाँतों से चोट कर रहे हों। सबकी सवारियों पर ध्वजाएँ फहरा रही थीं, पैदल सैनिक भी आपस में उलझ रहे थे। प्रद्युम्न साम्ब से, अक्रूर भोज से, अनिरुद्ध सात्यकि से, सुभद्र संग्रामजित से, भगवान श्रीकृष्ण के भाई गद उसी नाम के उनके पुत्र से और सुमित्र सुरथ से युद्ध करने लगे। ये सभी बड़े भयंकर योद्धा थे और क्रोध में भरकर एक-दूसरे का नाश करने पर तुल गये थे। इनके अतिरिक्त निशठं, उल्मुक, सहस्रजित, शतजित और भानु आदि यादव भी एक-दूसरे से गुँथ गये। भगवान श्रीकृष्ण की माया ने तो इन्हें अत्यन्त मोहित कर ही रखा था, इधर मदिरा के नशे ने भी इन्हें अंधा बना दिया था। दशार्ह, वृष्णि, अन्धक, भोज, सात्वत, मधु, अर्बुद, माथुर, शूरसेन, विसर्जन, कुकुर और कुन्ति आदि वंशों के लोग सौहार्द और प्रेम को भुलाकर आपस में मार-काट करने लगे। मूढ़तावश पुत्र पिता का, भाई भाई का, भानजा मामा का, नाती नाना का, मित्र मित्र का, सुहृद सुहृद का, चाचा भतीजे का तथा एक गोत्र वाले आपस में एक-दूसरे का खून करने लगे। अन्त में जब उनके सब बाण समाप्त हो गये, धनुष टूट गये और शस्त्रास्त्र नष्ट-भ्रष्ट हो गये, तब उन्होंने अपने हाथों से समुद्रतट पर लगी हुई एरका नाम की घास उखाड़नी शुरू की। यह वही घास थी, जो ऋषियों के शाप के कारण उत्पन्न हुए लोहमय मूसल के चूरे से पैदा हुई थी।

हे राजन! उनके हाथों में आते ही वह घास वज्र के समान कठोर मुद्गरों के रूप में परिणत हो गयी। अब वे रोष में भरकर उसी घास के द्वारा अपने विपक्षियों पर प्रकार करने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें मना किया, तो उन्होंने उनको और बलरामजी को भी अपना शत्रु समझ लिया। उन आततायियों की बुद्धि ऐसी मूढ़ हो रही थी कि वे उन्हें मारने के लिये उनकी ओर दौड़ पड़े। कुरुनन्दन! अब भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी भी क्रोध में भरकर युद्धभूमि में इधर-उधर विचरने और मुट्टी-की-मुट्टी एरका घास उखाड़-उखाड़ कर उन्हें मारने लगे। एरका घास की मुट्टी ही मुद्गर के समान चोट करती थी। जैसे बाँसों की रगड़ से उत्पन्न होकर दावानल बाँसों को ही भस्म कर देता है, वैसे ही ब्रह्मशाप से ग्रस्त और भगवान श्रीकृष्ण की माया से मोहित यदुवंशियों के स्पर्द्धामूलक क्रोध ने उनका ध्वंस कर दिया। जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि समस्त यदुवंशियों का संहार हो चुका है, तब उन्होंने यह सोचकर सन्तोष की साँस ली कि पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतर गया।



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. विभिन्न पुराणों में इस गृह-युद्ध का वर्णन मिलता है और कहा गया है कि ऋषियों के शाप के कारण कृष्ण-पुत्र सांब के पेट से एक मुशल उत्पन्न हुआ, जिससे यादव-वंश का नाश हो गया। (महाभारत, मुशल पर्व; ब्रह्म पुराण 210-12; विष्णु. 37-38; भाग. ग्यारहवां स्कंध अ. 1,6,30,31; लिंग पु. 69,83-94) आदि।
  2. एकादश स्कन्ध, अध्याय 30, श्लोक 1-25

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