महाभारत विराट पर्व अध्याय 47 श्लोक 1-11

सप्तचत्वारिंश (47) अध्याय: विराट पर्व (गोहरण पर्व)

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महाभारत: विराट पर्व: सप्तचत्वारिंश अध्याय: श्लोक 1-11 का हिन्दी अनुवाद


दुर्योधन के द्वारा युद्ध का निश्चय तथा कर्ण की उक्ति

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधन ने समर भूमि में भीष्म, रथियों में श्रेष्ठ द्रोण और महारथी कृपाचार्य से कहा -। ‘आचार्यों! मैंने और कर्ण ने यह बात आप लोगों से कई बार कही है और फिर उसी बात को दुहराता हूँ; क्योंकि उसे बार बार कहकर भी मुझे तृपित नहीं होती। ‘जूआ खेलते समय हम लोगों की यही शर्त थी कि हममें से जो हारेंगे, उन्हें बारह वर्षों तक किसी वन में प्रकट रूप से और एक वर्ष तक किसी नगर में अज्ञात भाव से निवास करना पड़ेगा। ‘अभी पाण्डवों का तेरहवाँ वर्ष पूरा नहीं हुआ है, तो भी अज्ञातवास में रहने वाला अर्जुन आज प्रकट रूप से हमारे साथ युद्ध करने आ रहा है। ‘यदि अज्ञातवास पूर्ण होने के पहले ही अर्जुन आ गया है, तो पाण्डव फिर बारह वर्षों तक वन में निवास करेंगे। ‘वे राज्य के लोभ में अपनी प्रतिज्ञा को स्मरण नहीं रख सके हैं या हम लोगों में ही मोह ( प्रमाद ) आ गया है। इनके तेरहवें वर्ष में अभी कुछ कमी है या अणिक दिन बीत गये हैं; यह भीष्मजी जान सकते हैं। ‘जिन विषयों में दुविधा पड़ जाती है, उनमें सदा संदेह बना रहता है।

किसी विषय को अन्य प्रकार से सोचा जाता है, किन्तु पता लगने पर वह किसी और ही प्रकार का सिद्ध होता है। ‘हम लोग मत्स्य देश के उत्तरगोष्ठ की खोज करते हुए यहाँ आये और मत्स्य देश के सैनिकों के साथ ही युद्ध करना चाहते थे। इस दशा में भी यदि अर्जुन हमसे युद्ध करने आया है, तो हम किसका अपराध कर रहे हैं ?। ‘मत्स्य निवासियों के साथ भी जो हम यहाँ युद्ध के लिये आये हैं, वह अपने स्वार्थ के लिये नी, त्रिगर्तों की सहायता के उद्देश्य से हमारा यहाँ आगमन हुआ है। त्रिगर्तों ने हमारे सामने मत्स्य देशीय सैनिकों के बहुत से अत्याचारों का वर्णन किया था। ‘वे भय से बहुत दबे हुए थे; इसलिये हमने उनकी सहायता के लिये प्रतिज्ञा की थी। हमारी उनकी बात यह हुई थी कि वे लोग सप्तमी तिथि को अपरान्ह काल में मत्स्य देश के ( दक्षिण ) गोष्ठ पर आक्रमण करके वहाँ का महान् गोधन अपने अणिकार में कर लें। ऐसा ही उनहोंने किया भी है। ‘साथ ही यह भी तै हुआ था कि हम लोग अष्टमी को सूर्योदय होते होते उत्तर गोष्ठ की इन गौओं को ग्रहण कर लें; क्योंकि उस समय मत्स्यराज गौओं के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए त्रिगर्तोें के पीछे गये होंगे।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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