महाभारत उद्योग पर्व अध्याय 59 श्लोक 17-31

एकोनषष्टितम (59) अध्‍याय: उद्योग पर्व (यानसंधि पर्व)

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महाभारत: उद्योग पर्व: एकोनषष्टितम अध्याय: श्लोक 17-31 का हिन्दी अनुवाद
  • तत्पश्‍चात बातचीत में कुशल भगवान श्रीकृष्‍ण की वह वाणी मेरे सुनने में आयी, जिसका एक-एक अक्षर शिक्षाप्रद था। वह अभीष्‍ट अर्थ का प्रतिपादन करने वाली तथा मन को मोह लेने वाली थी। (17)
  • भगवान श्रीकृष्‍ण ने कहा- संजय! जब कुरुकुल के प्रधान पुरुष भीष्‍म तथा आचार्य द्रोण भी सुन रहे हों, उसी समय तुम बुद्धिमान राजा धृतराष्‍ट्र से यह बात कहना। (18)
  • सूत! हम दोनों की ओर से पहले तुम हमसे बड़ी अवस्था वाले श्रेष्‍ठ पुरुषों को प्रणाम कहना और जो लोग अवस्था में हमसे छोटे हों, उनकी कुशल पूछना। इसके बाद हमारा यह उत्तर सुना देना (19)
  • कौरवो! नाना प्रकार के यज्ञों का अनुष्‍ठान आरम्भ करो, ब्राह्मणों को दक्षिणाएं दो, पुत्रों और स्त्रियों से मिल-जुलकर आनन्द भोग लो; क्योंकि तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा भय आ पहुँचा है। (20)
  • ‘तुम सुपात्र व्यक्तियों को धन का दान दे लो, अपनी इच्छा के अनुसार पुत्र पैदा कर लो तथा अपने प्रेमीजनों का प्रिय कार्य सिद्ध कर लो; क्योंकि राजा युधिष्ठिर अब हम लोगों पर विजय पाने के लिये उतावले हो रहे हैं। (21)
  • ‘जिस समय कौरव सभा में द्रौपदी का वस्त्र खींचा जा रहा था, मैं हस्तिनापुर से बहुत दूर था। उस समय कृष्‍णा ने आर्तभाव से ‘गोविन्द’ कहकर जो मुझे पुकारा था, उसका मेरे ऊपर बहुत बड़ा ऋण है और यह ऋण बढ़ता ही जा रहा है। अपराधी कौरवों का संहार किये बिना उसका भार मेरे हृदय से दूर नहीं हो सकता। (22)
  • ‘जिनके पास अजेय तेजस्वी गांडीव नामक धनुष है और जिनका मित्र या सहायक दूसरा मैं हूँ, उन्हीं सव्यसाची अर्जुन के साथ यहाँ तुमने वैर बढा़या है। (23)
  • ‘जिसको काल ने सब ओर से घेर न लिया हो, ऐसा कौन पुरुष, भले ही वह साक्षात इन्द्र ही क्यों न हो, उस अर्जुन के साथ युद्ध करना चाहता है, जिसका सहायक दूसरा मैं हूँ। (24)
  • ‘जो अर्जुन को युद्ध में जीत ले, वह अपनी दोनों भुजाओं पर इस पृथ्वी को उठा सकता है, कुपित होकर इन समस्त प्रजा को भस्म कर सकता है और सम्पूर्ण देवताओं को स्वर्ग से नीचे गिरा सकता है। (25)
  • ‘देवताओं, असुरों, मनुष्‍यों, यक्षों, गन्धर्वों तथा नागों में भी मुझे कोई ऐसा वीर नहीं दिखायी देता, जो पाण्‍डुनन्दन अर्जुन का सामना कर सके। (26)
  • ‘विराटनगर में अकेले अर्जुन और बहुत से कौरवों का जो अद्भुत और महान संग्राम सुना जाता है, वही मेरे उपर्युक्त कथन की सत्यता का पर्याप्त प्रमाण है। (27)
  • ‘जब विराटनगर में एकमात्र पाण्‍डुकुमार अर्जुन से पराजित हो तुम लोगों ने भागकर विभिन्न दिशाओं की शरण ली थी, वह एक ही दृष्‍टान्त अर्जुन की प्रबलता का पर्याप्त प्रमाण है। (28)
  • ‘बल, पराक्रम, तेज, शीघ्रकारिता, हाथों की फुर्ती, विषादहीनता तथा धैर्य- ये सभी सद्गुण कुन्तीपुत्र अर्जुन के सिवा एक साथ दूसरे किसी पुरुष में नहीं है’। (29)
  • जैसे इन्द्र आकाश में गर्जता हुआ समय पर वर्षा करता है, उसी प्रकार भगवान श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को अपनी वाणी से आनन्दित करते हुए उपर्युक्त बात कही। (30)
  • भगवान श्रीकृष्‍ण का वचन सुनकर किरीटधारी श्‍वेत-वाहन अर्जुन ने भी उसी रोमाञ्चकारी महावाक्य को दुहरा दिया। (31)
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्व के अन्तर्गत यानसंधिपर्व में संजयद्वारा श्रीकृष्‍ण के संदेश का कथनविषयक उनसठवां अध्‍याय पूरा हुआ।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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