भारद्वाज कणिक का सौराष्ट्रदेश के राजा को कूटनीति का उपदेश

महाभारत शान्ति पर्व में आपद्धर्म पर्व के अंतर्गत 140वें अध्याय में भारद्वाज कणिक का सौराष्ट्रदेश के राजा को कूटनीति के उपदेश देने का वर्णन हुआ है, जो इस प्रकार है[1]

भीष्म का युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर देना

युधिष्ठिर ने पूछा- भरतनंदन! पितामह! सत्‍ययुग, त्रेता और द्वापर- ये तीनों युग प्राय: समाप्त हो रहे हैं, इसलिये जगत में धर्म का क्षय हो चला है। डाकू और लुटेरे इस धर्म में और भी बाधा डाल रहे हैं; ऐसे समय में किस तरह रहना चाहिये? भीष्‍म जी ने कहा- भरतनंदन! ऐसे समय में मैं तुम्‍हें आपत्तिकाल की वह नीति बता रहा हूँ, जिसके अनुसार भूमिपाल को दया का परित्‍याग करके भी समयोचित बर्ताव करना चाहिये। इस विषय में भारद्वाज कणिक तथा राजा शत्रुंजय के संवादरूप एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है।

कणिक का शत्रुंजय को कूटनीति के उपदेश देना

सौवीर देश में शत्रुंजय नाम से प्रसिद्ध एक महारथी राजा थे। उन्‍होंने भारद्वाज कणिक के पास जाकर अपने कर्तव्‍य का निश्‍चय करने के लिये उनसे इस प्रकार प्रश्‍न किया- ‘अप्राप्त वस्‍तु की प्राप्ति कैसे होती है? प्राप्त द्रव्‍य की वृद्धि किस प्रकार हो सकती है? बढे़ हुए द्रव्‍य की रक्षा किससे की जाती है? और उस सुरक्षित द्रव्‍य का सदुपयोग कैसे किया जाना चाहिये ?’

राजा शत्रुंजय को शास्त्र का तात्‍पर्य निश्चितरूप से ज्ञात था। उन्‍होंने जब कर्तव्‍य-निश्‍चय के लिये प्रश्‍न उपस्थित किया, तब ब्रह्मण भारद्वाज कणिक ने यह युक्तियुक्‍त उत्‍तम वचन बोलना आरम्‍भ किया- ‘राजा को सर्वदा दण्‍ड देने के लिये उद्यत रहना चाहिये और सदा ही पुरुषार्थ प्रकट करना चाहिये। राजा अपने में छिद्र अर्थात दुर्बलता न रहने दे। शत्रुपक्ष के छिद्र या दुर्बलता पर सदा ही दृष्टि रखे और यदि शत्रुओं की दुर्बलता का पता चल जाय तो उन पर आक्रमण कर दे। ‘जो सदा दण्‍ड देने के लये उद्यत रहता है, उससे प्रजाजन बहुत डरते हैं इसलिये समस्‍त प्राणियों को दण्‍ड के द्वारा ही काबू में करे। ‘इस प्रकार तत्त्वदर्शी विद्वान दण्‍ड की प्रशंसा करते हैं; अत: साम, दान आदि चारों उपायों में दण्‍ड को ही प्रधान बताया जाता है। ‘यदि मूल आधार नष्ट हो जाय तो उसके आश्रय से जीवन निर्वाह करने वाले सभी शत्रुओं का जीवन नष्ट हो जाता है। यदि वृक्ष की जड़ काट दी जाय तो उसकी शाखाएँ कैसे रह सकती हैं? ‘विद्वान पुरुष पहले शत्रुपक्ष के मूल का ही उच्‍छेद कर डाले। तत्‍पश्‍चात उसके सहायकों और पक्षपातियों को भी उस मूल के पथ का ही अनुसरण करावे। ‘संकटकाल उपस्थित होने पर राजा सुंदर मंत्रणा, उत्‍तम पराक्रम एवं उत्‍साहपूर्वक युद्ध करे तथा अवसर आ जाय तो सुंदर ढंग से पलायन भी करे। आपतकाल के समय आवश्‍यक कर्म ही करना चाहिये, पर सोच-विचार नहीं करना चाहिये। ‘राजा केवल बातचीत में ही अत्‍यंत विनयशील हो, हृदय को छूरे के समान तीखा बनाये रखे; पहले मुस्कराकर मीठे वचन बोले तथा काम-क्रोध को त्‍याग दे। ‘शत्रु के साथ किये जाने वाले समझौते आदि कार्य में संधि करके भी उस पर विश्‍वास न करे। अपना काम बना लेने पर बुद्धिमान पुरुष शीघ्र ही वहाँ से हट जाय। ‘शत्रु को उसका मित्र बनकर मीठे वचनों से ही सान्‍त्‍वना देता रहे; परंतु जैसे सर्पयुक्‍त गृह से मनुष्‍य डरता है, उसी प्रकार उस शत्रु से भी सदा उद्विग्‍न रहे।[1]

‘जिसकी बुद्धि संकट में पड़कर शोकाभिभूत हो जाय, उस भूतकाल की बातें (राजा नल त‍था भगवान श्रीराम आदि के जीवन-वृतान्‍त) सुनाकर सान्‍त्‍वना दे, जिसकी बुद्धि अच्‍छी नहीं है, उसे भविष्‍य में लाभ की आशा दिलाकर तथा विद्वान पुरुषों को तत्‍काल ही धन आदि देकर शान्‍त करे। ‘ऐश्‍वर्य चाहने वाले राजा को चाहिये कि वह अवसर देखकर शत्रु के सामने हाथ जोड़े, शपथ खाय, आश्‍वासन दे और चरणों में सिर झुकाकर बातचीत करे। इतना ही नहीं, वह धीरज देकर उसके आँसू तक पोंछे। ‘जब तक समय बदलकर अपने अनुकूल न हो जाय, तब तक शत्रु को कंधे पर बिठाकर ढोना पड़े तो वह भी करे; परंतु जब अनुकूल समय आ जाय, तब उसे उसी प्रकार नष्ट कर दे, जैसे घडे़ को पत्‍थर पर पटककर फोड़ दिया जाता है। ‘राजेन्‍द्र, दो ही घड़ी सही, मनुष्‍य तिंदुक की लकड़ी की मशाल के समान जोर-जोर से प्रज्‍वलित हो उठे (शत्रु के सामने घोर पराक्रम प्रकट करे), दीर्घकाल तक भूसी की आग के समान बिना ज्‍वाला के ही धूआँ न उठावे (मंद पराक्रम का परिचय न दे)[2]

‘अनेक प्रकार के प्रयोजन रखने वाला मनुष्‍य कृतघ्‍न के साथ आर्थिक संबंध न जोड़े, किसी का भी काम पूरा न करे, क्‍योंकि जो अथा (प्रयोजन-सिद्धि की इच्‍छावाला) होता है, उससे तो बारंबार काम लिया जा सकता है; परंतु जिसका प्रयोजन सिद्ध हो जाता है, वह अपने उपकारी पुरुष की उपेक्षा कर देता है; इसलिये दूसरों के सारे कार्य (जो अपने द्वारा होने वाले हों) अधूरे ही रखने चाहिये। ‘कोयल, सूअर, सुमरू पर्वत , शून्‍यगृह, नट तथा अनुरक्‍त सुहृद-इनमें जो श्रेष्ठ गुण या विशेषताएँ हैं, उन्‍हें राजा काम में लावे[3] ‘राजा को चाहिये कि वह प्रतिदिन उठ-उठकर पूर्ण सावधान हो शत्रु के घर जाय और उसका अमंगल ही क्‍यों न हो रहा हो, सदा उसकी कुशल पूछे और मंगल कामना करे। ‘जो आलसी हैं, कायर हैं, अभिमानी हैं, लोकचर्चा से डरने वाले और सदा समय की प्रतीक्षा में बैठे रहने वाले हैं, ऐसे लोग अपने अभीष्ट अर्थ को नहीं पा सकते। ‘राजा इस तरह सतर्क रहे कि उसके छिद्र का शत्रु को पता न चले, परंतु वह शत्रु के छिद्र को जान ले। जैसे कछुआ अपने सब अंगों को समेटकर छिपा लेता है, उसी प्रकार राजा अपने छिद्रों को छिपाये रखे। ‘राजा बगुले के समान एकाग्रचित्त होकर कर्तव्‍यविषय को चिंतन करे। सिंह के समान पराक्रम प्रकट करे। भेड़ियें की भाँति सहसा आक्रमण करके शत्रु का धन लूट ले तथा बाण की भाँति शत्रुओं पर टूट पड़े। ‘पान, जूआ, स्त्री, शिकार, तथा गाना-बजाना- इन सबका संयमपूर्वक अनासक्‍तभाव से सेवन करे; क्‍योंकि इनमें आसक्ति होना अनिष्टकारक है। ‘राजा बाँस का धनुष बनावे, हिरन के समान चौकन्‍ना होकर सोये, अंधा बने रहने योग्‍य समय हो तो अंधें का भाव किये रहे और अवसर के अनुसार बहरे का भाव भी स्‍वीकार कर लो।

‘बुद्धिमान पुरुष देश और काल को अपने अनुकूल पाकर पराक्रम प्रकट करे। देशकाल की अनुकूलता न होने पर किया गया पराक्रम निष्‍फल होता है। ‘अपने लिये समय अच्‍छा है या खराब? अपनापक्ष प्रबल है या निर्बल? इन सब बातों का निश्‍चय करके तथा शत्रु के भी बल को समझकर युद्ध या संधि के कार्य में अपने आप को लगावे।[2] ‘जो राजा दण्‍ड से नतमस्‍तक हुए शत्रु को पाकर भी उसे नष्ट नहीं कर देता, वह अपनी मृत्यु को आमन्त्रित करता है। ठीक उसी तरह जैसे, खच्‍चरी मौत के लिये गर्भ धारण करती है। ‘नीतिज्ञ राजा ऐसे वृक्ष के समान रहे, जिसमें फूल तो खूब लगे हों, परंतु फल न हो। फल लगने पर भी उस पर चढ़ना अत्‍यंत कठिन हो, वह रहे तो कच्‍चा, पर दीखे पके के समान तथा स्‍वयं कभी जीर्ण-शीर्ण न हो। ‘राजा शत्रु की आशा पूर्ण होने में विलंब पैदा करे, उसमें विध्‍न डाल दे। उस विध्‍न का कुछ कारण बता दे और उस कारण को युक्तिसंग‍त सिद्ध कर दे। ‘जब तक अपन ऊपर भय न आया हो, तब तक डरे हुए की भाँति उसे टालने का प्रयत्‍न करना चाहिये; परंतु जब भय को सामने आया हुआ देखे तो निडर होकर शत्रु पर प्रहार करना चाहिये। जहाँ प्राणों का संशय हो, ऐसे कष्ट को स्‍वीकार किये बिना मनुष्‍य कल्‍याण का दर्शन नहीं कर पाता। प्राण-संकट में पड़ कर यदि वह पुन: जीवित रह जाता है तो अपना भला देखता है।[4]

‘भविष्‍य में जो संकट आने वाले हों, उन्‍हें पहले से ही जानने का प्रयत्‍न करे और जो भय सामने उपस्थित हो जाय, उसे दबाने की चेष्टा करे। दबा हुआ भय भी पुन: बढ़ सकता है, इस डर से यही समझे कि अभी वह निवृत ही नहीं हुआ है (और ऐसा समझकर सतत सावधान रहे)। ‘जिसके सुलभ होने का समय आ गया हो, उस सुख को त्‍याग देना और भविष्‍य में मिलने वाले सुख की आशा करना- यह बुद्धिमानों की नीति नहीं है। ‘जो शत्रु के साथ संधि करके विश्‍वासपूर्वक सुख से सोता है, वह उसी मनुष्‍य के समान है, जो वृक्ष की शाखा पर गाढ़ी नींद में सो गया हो। ऐसा पुरुष नीचे गिरने (शत्रु द्वारा संकट में पड़ने) पर ही सजग या सचेत होता है। ‘मनुष्‍य कोमल या कठोर, जिस किसी भी उपाय संभव हो, दीन‍दशा से अपना उद्धार करे। इसके बाद शक्तिशाली हो पुन: धर्माचरण करे। ‘जो लोग शत्रु के शत्रु हों, उन सबका सेवन करना चाहिये। अपने ऊपर शत्रुओं द्वारा जो गुप्तचर नियुक्‍त किये गये हों, उनको भी पहचानने का प्रयत्‍न करे। ‘अपने तथा शत्रु के राज्‍य में ऐसे गुप्तचर नियुक्‍त करे जिसको कोई जानता-पहचानता न हो। शत्रु के राज्‍यों में पाखण्‍डवेषधारी और तपस्‍वी आदि को ही गुप्तचर बनाकर भेजना चाहिये। ‘वे गुप्तचर बगीचा, घूमने-फिरने के स्‍थान, पौंसला, धर्मशाला, मदबिक्री के स्‍थान, नगर के प्रवेशद्वार, तीर्थस्‍थान और सभाभवन-इन सब स्‍थलों में विचरें।

‘कपटपूर्ण धर्म का आचरण करने वाले, पापात्‍मा, चोर तथा जगत के लिये कण्‍टकरूप मनुष्‍य वहाँ छद्मवेष धारण करके आते रहते हैं, उन सबका पता लगाकर उन्‍हें कैद कर ले अथवा भय दिखाकर उनकी पापवृत्ति शांत कर दे। ‘जो विश्‍वासपात्र नहीं है, उस पर कभी विश्‍वास न करे, परंतु जो विश्‍वासपात्र है, उस पर भी अधिक विश्‍वास न करे; क्‍योंकि अधिक विश्‍वास से भय उत्पन्‍न होता है, अत: बिना जाँचे-बूझे किसी पर भी विश्‍वास न करे। ‘किसी यथार्थ कारण से शत्रु के मन में विश्‍वास उत्‍पन्‍न करके जब कभी उसका पैर लड़खड़ाता देखे अर्थात उसे कमज़ोर समझे तभी उस पर प्रहार कर दे।[4] ‘जो संदेह करने योग्‍य न हो, ऐसे व्‍यक्ति पर भी संदेह करे-उसकी ओर से चौकन्‍ना रहे और जिससे भय की आशंका हो, उसकी ओर से तो सदा सब प्रकार से सावधान रहे ही; क्‍योंकि जिसकी ओर से भय की आशंका न हो, उसकी ओर से यदि भय उत्‍पन्‍न होता है तो वह जड़मूलसहित नष्ट कर देता है। शत्रु के हित के प्रति मनोयोग दिखाकर, मौनव्रत लेकर, गेरूआ वस्त्र पहनकर तथा जटा और मृगचर्म धारण करके अपने प्रति विश्‍वास उत्‍पन्‍न करे और जब विश्‍वास हो जाय तो मौका देखकर भूखे भेड़िये की तरह शत्रु पर टूट पड़े। ‘पुत्र, भाई, पिता अथवा मित्र जो भी अर्थप्राप्ति में विध्‍न डालने वाले हों, उन्‍हें ऐश्‍वर्य चाहने वाला राजा अवश्‍य मार डाले। ‘यदि गुरु भी घमंड में भरकर कर्तव्‍य और अकर्तव्‍य को नहीं समझ रहा हो और बुरे मार्ग पर चलता हो तो उसके लिये भी दण्‍ड देना उचित है; दण्ड उसे राह पर लाता है।[5]

‘शत्रु के आने पर उठकर उसका स्‍वागत करे, उसे प्रणाम करे और कोई अपूर्व उपहार दे। इन सब बर्तावों के द्वारा पहले उसे वश में करे। इसके बाद ठीक वैसे ही जैसे तीखी चोंचवाला पक्षी वृक्ष के प्रत्‍येक फूल और फल पर चोंच मारता है, उसी प्रकार उसके साधन और साध्‍य पर आघात करे। ‘राजा मछलीमारों की भाँति दूसरों के मर्म विदीर्ण किये बिना, अत्‍यंत क्रूर कर्म किये बिना तथा बहुतों के प्राण लिये बिना बड़ी भारी सम्‍‍पत्ति नहीं पा सकता है। ‘कोई जन्‍म से ही मित्र अथवा शत्रु नहीं होता है। सामर्थ्‍ययोग से ही शत्रु और मित्र उत्‍पन्‍न होते रहते हैं। ‘शत्रु करुणाजनक वचन बोल रहा हो तो भी उसे मारे बिना न छोड़े। जिसने पहले अपना अपकार किया हो, उसको अवश्‍य मार डाले और उसमें दु:ख न माने। ‘ऐश्‍वर्य की इच्‍छा रखने वाला राजा दोषदृष्टि का परित्‍याग करके सदा लोगों को अपने पक्ष में मिलाये रखने तथा दूसरों पर अनुग्रह करने के लिये यत्‍नशील बना रहे और शत्रुओं का दमन भी प्रयत्‍नपूर्वक करे। ‘प्रहार करने के लिये उद्यत होकर भी प्रिय वचन बोले, प्रहार करने के पश्‍चात भी प्रिय वाणी ही बोले, तलवार से शत्रु का मस्‍तक काटकर भी उसके लिये शोक करे और रोये। ‘ऐश्‍वर्य की इच्‍छा रखने वाले राजा को मधुर वचन बोलकर दूसरों को सम्‍मान करके और सहनशील होकर लोगों को अपने पास आने के लिये निमन्त्रित करना चाहिये, यही लोक की आराधना अथवा साधारण जनता का सम्‍मान है। इसे अवश्‍य करना चाहिये। ‘सूखा वैर न करे तथा दोनों बांहों से तैरकर नदी के पार न जाये। यह निरर्थक और आयुनाशक कर्म है। यह कुत्‍तें के द्वारा गाय का सींग चबाने-जैसा कार्य है, जिससे उसके दाँत भी रगड़ उठते हैं और रस भी नहीं मिलता है। धर्म, अर्थ और काम- इन त्रिविध पुरुषार्थों के सेवन में लोभ, मूर्खता और दुर्बलता-यह तीन प्रकार की बाधा-अड़चन उपस्थित होती है। उसी प्रकार उनके शान्ति, सर्वहितकारी कर्म और उपभोग-ये तीन ही प्रकार के फल होते हैं। इन (तीनों प्रकार के) फलों को शुभ जानना चाहिये; परंतु (उक्‍त तीनों प्रकार की) बाधाओं से यत्‍नपूर्वक बचना चाहिये। ‘ऋण, अग्नि और शत्रु में से कुछ बाकी रह जाय तो वह बारंबार बढ़ता रहता है; इसलिये इनमें से किसी को शेष नहीं छोड़ना चाहिये। ‘यदि बढ़ता हुआ ऋण रह जाय, तिरस्‍कृत शत्रु जीवित रहें और उपेक्षित रोग शेष रह जाए तो ये सब तीव्र भय उत्‍पन्‍न करते हैं। ‘किसी कार्य को अच्‍छी तरह सम्‍पन्‍न किये बिना न छोडे़ और सदा सावधान रहे। शरीर में गडा़ हुआ काँटा भी यदि पूर्णरूप से निकाल न दिया जाय-उसका कुछ भाग शरीर में ही टूटकर रह जाय तो वह चिरकाल तक विकार उत्‍पन्‍न करता है। ‘मनुष्‍यों का वध करके, सड़कें तोड़-फोड़कर और घरों को नष्ट-भ्रष्ट करके शत्रु के राष्ट्र का विध्‍वंस करना चाहिये।[5]

‘राजा गीध के समान दूर तक दृष्टि डाले, बगुले के समान लक्ष्‍य पर दृष्टि जमाये, कुत्‍ते के समान चौकन्‍ना रहे और सिंह के समान पराक्रम प्रकट करे, मन में उद्वेग को स्‍थान न दे, कौए की भाँति सशंक रहकर दूसरों की चेष्टा पर ध्‍यान रखे और दूसरे के बिल में प्रवेश करने वाले सर्प के समान शत्रु का छिद्र देखकर उस पर आक्रमण करे। ‘जो अपने से शूरवीर हो, उसे हाथ जोड़कर वश में करे, जो डरपोक हो, उसे भय दिखाकर फोड़ ले, लोभी को धन देकर काबू में कर ले तथा जो बराबर हो उसके साथ युद्ध छेड़ दे। अनेक जाति के लोग जो एक कार्य के लिये संगठित होकर अपना दल बना लेते हैं, उसे दल को श्रेणी कहते हैं। ऐसी श्रेणियों के जो प्रधान हैं, उनमें जब भेद डाला जा रहा हो और अपने मित्रों को अनुनय-विनय के द्वारा जब दूसरे लोग अपनी ओर खींच रहे हों तथा जब सब ओर भेदनीति और दलबंदी के जाल बिछाये जा रहे हों, ऐसे अवसरों पर अपने मन्त्रियों की पूर्ण रूप से रक्षा करनी चाहिये। (न तो वे फूटने पावें और और न स्‍वयं ही कोई दल बनाकर अपने विरुद्ध कार्य करने पावें। इसके लिये सतत सावधान रहना चाहिये) ‘राजा सदा कोमल रहे तो लोग उसकी अवहेलना करते हैं और सदा कठोर बना रहे तो उससे उद्विग्‍न हो उठते हैं, अत: जब कठोरता दिखाने का समय हो तो वह कठोर बने और जब कोमलतापूर्ण बर्ताव करने का अवसर हो तो कोमल बन जाय। ‘बुद्धिमान राजा कोमल उपाय से कोमल शत्रु का नाश करता है और कोमल उपाय से ही दारुण शत्रु का भी संहार कर डालता है। कोमल उपाय से कुछ भी असाध्‍य नहीं है; अत: कोमल ही अत्‍यन्‍त तीक्ष्‍ण है। ‘जो समय पर कोमल होता है और समय पर कठोर बन जाता है, वह अपने सारे कार्य सिद्ध कर लेता है और शत्रु पर भी उसका अधिकार हो जाता है। ‘विद्वान पुरुष से विरोध करके ‘में दूर हूँ’ ऐसा समझकर निश्चिन्‍त नहीं होना चाहिये; क्‍योंकि बुद्धिमान की बाँहे बहुत बड़ी होती हैं (उसके द्वारा किये गये प्रतीकार के उपाय दूर तक प्रभाव डालते हैं) अत: यदि बु्द्धिमान पुरुष पर चोट की गयी तो वह अपनी उन विशाल भुजाओं द्वारा दूर से भी शत्रु का विनाश कर सकता है। ‘जिसके पार न उतर सके, उस नदी को तैरने का साहस न करे।[6]

जिसको शत्रु पुन: बलपूर्वक वापस ले सके ऐसे धन का अपहरण ही न करे। ऐसे वृक्ष या शत्रु को खोदने या नष्ट करने की चेष्टा न करे जिसकी जड़ को उखाड़ फेंकना सम्‍भव न हो सके तथा उस वीर पर आघात न करे, जिसका मस्‍तक काटकर धरती पर गिरा न सके। ‘यह जो मैंने शत्रु के प्रति पापपूर्ण बर्ताव का उपदेश किया है, इसे समर्थ पुरुष सम्‍पत्ति के समय कदापि आचरण में न लावे। परंतु जब शत्रु ऐसे ही बर्तावों द्वारा अपने ऊपर संकट उपस्थित कर दे, तब उसके प्रतीकार के लिये वह वह इन्‍हीं उपायों को काम में लाने का विचार क्‍यों न करे, इसीलिये तुम्‍हारे हित की इच्‍छा से मैंने यह सब कुछ बताया है’। हितार्थी ब्राह्मण भारद्वाज कणिक की कही हुई उन यथार्थ बातों को सुनकर सौ वीर देश के राजा ने उनका यथोचित रूप से पालन किया, जिससे वे बंधु-बांधवों-सहित समुज्‍ज्‍वल राजलक्ष्‍मी का उपभोग करने लगे।[6]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 140 श्लोक 1-15
  2. 2.0 2.1 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 140 श्लोक 16-29
  3. कोयल का श्रेष्ठ गुण है कण्ठ की मधुरता, सूअर के आक्रमण को रोकना कठिन है, यही उसकी विशेषता है; मेरु का गुण है सबसे अधिक उन्नत होना, सूने घर की विशेषता है अनेक को आश्रय देना, नट का गुण है, दूसरों को अपने क्रिया-कौशल द्वारा सन्तुष्ट करना तथा अनुरक्त सुहृद की विशेषता है हितपरायणता। ये सारे गुण राजा को अपनाने चाहिये।
  4. 4.0 4.1 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 140 श्लोक 30-44
  5. 5.0 5.1 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 140 श्लोक 45-61
  6. 6.0 6.1 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 140 श्लोक 62-71

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उनके पास चलने का आदेश | भीष्म द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति-भीष्मस्तवराज | परशुराम द्वारा होने वाले क्षत्रिय संहार के विषय में युधिष्ठिर का प्रश्न | परशुराम के उपाख्यान क्षत्रियों का विनाश तथा पुन: उत्पन्न होने की कथा | श्रीकृष्ण द्वारा भीष्म के गुण-प्रभाव का वर्णन | श्रीकृष्ण का भीष्म की प्रशंसा करते हुए उन्हें युधिष्ठिर को धर्मोपदेश देने का आदेश देना | भीष्म द्वारा अपनी असर्मथता प्रकट करने पर भगवान श्रीकृष्ण का उन्हें वर देना | पाण्डवों व ऋषियों का भीष्म से विदा लेना | श्रीकृष्ण की प्रातश्चर्या | सात्यकि द्वारा कृष्ण का संदेश पाकर युधिष्ठिर का भाइयों सहित कुरुक्षेत्र में आना | श्रीकृष्ण और भीष्म की बातचीत | भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को गुण-कथनपूर्वक प्रश्न करने का आदेश देना | भीष्म के आश्वासन पर युधिष्ठिर का उनके समीप जाना | युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म द्वारा राजधर्म का वर्णन | राजा के लिए पुरुषार्थ, सत्य, ब्राह्मणों की अदण्डनीयता | राजा की परिहासशीलता तथा मृदुता में प्रकट होने वाले दोष | राजा द्वारा धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्ताव का वर्णन | भीष्म द्वारा राज्यरक्षा का वर्णन | युधिष्ठिर का भीष्म से विदा लेकर हस्तिनापुर में प्रवेश | ब्रह्मा जी के नीतिशास्त्र का वर्णन | राजा पृथु के चरित्र का वर्णन | वर्णधर्म का वर्णन | आश्रम धर्म का वर्णन | ब्राह्मण धर्म और कर्तव्यपालन का महत्त्व | वर्णाश्रम धर्म का वर्णन | राजर्धम का वर्णन | इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाता का संवाद | राजधर्म के पालन से चारों आश्रमों के धर्म का फल | राष्ट्र की रक्षा और उन्नति | राजा की आवश्यकता का प्रतिपादन | वसुमना और बृहस्पति का संवाद | राजा के न होने से प्रजा की हानि और होने से लाभ का वर्णन | राजा के प्रधान कर्तव्य | दण्डनीति द्वारा युगों के निर्माण का वर्णन | राजा को इहलोक व परलोक में सुख प्राप्ति कराने वाले छत्तीस गुण | धर्मपूर्वक प्रजापालन ही राजा का महान धर्म | राजा के लिए सदाचारी विद्वान पुरोहित की आवश्यकता | विद्वान सदाचारी पुरोहित की आवश्यकता | ब्राह्मण और क्षत्रिय में मेल रहने से लाभविषयक पुरूरवा का उपख्यान | ब्राह्मण और क्षत्रिय में मेल से लाभ का प्रतिपादन करने वाले मुचुकुन्द का उपाख्यान | राज्य के कर्तव्य का वर्णन | युधिष्ठिर का राज्य से विरक्त होने पर भीष्म द्वारा राज्य की महिमा का वर्णन | उत्तम-अधम ब्राह्मणों के साथ राजा का बर्ताव | केकयराजा तथा राक्षस का उपख्यान | केकयराजा की श्रेष्ठता का विस्तृत वर्णन | आपत्तिकाल में ब्राह्मण के लिए वैश्यवृत्ति से निर्वाह करने की छूट | लुटेरों से रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने का अधिकार | रक्षक को सम्मान का पात्र स्वीकार करना | ऋत्विजों के लक्षण | यज्ञ और दक्षिणा का महत्व | तप की श्रेष्ठता | राजा के लिए मित्र और अमित्र की पहचान और उनके साथ नीतिपूर्ण बर्ताव | मन्त्री के लक्षणों का वर्णन | कुटुम्बीजनों में दलबंदी होने पर कुल के प्रधान पुरुष के कार्य | श्री कृष्ण और नारद जी का संवाद | मंत्रियों की परीक्षा तथा राजा और राजकीय मनुष्यों से सतर्कता | कालकवृक्षीय मुनि का उपख्यान | सभासद आदि के लक्षण | गुप्त सलाह सुनने के अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणा की विधि एवं निर्देश | इन्द्र और वृहस्पति के संवाद में मधुर वचन बोलने का महत्व | राजा की व्यावहारिक नीति व मंत्रीमण्डल का संघटन | दण्ड का औचित्य तथा दूत व सेनापति के गुण | राजा के निवासयोग्य नगर एवं दुर्ग का वर्णन | प्रजापालन व्यवहार तथा तपस्वीजनों के समादर का निर्देश | राष्ट्र की रक्षा तथा वृद्धि के उपाय | प्रजा से कर लेने तथा कोश संग्रह करने का प्रकार | राजा के कर्तव्य का वर्णन | उतथ्य का मान्धाता को उपदेश | राजा के लिए धर्मपालन की आवश्यकता | उतथ्य के उपदेश में धर्माचरण का महत्व | राजा के धर्म का वर्णन | राजा के धर्मपूर्वक आचार के विषय में वामदेवजी का वसुमना को उपदेश | वामदेव जी के द्वारा राजोचित बर्ताव का वर्णन | वामदेव के उपदेश में राजा और राज्य के लिए हितकर वर्ताव | विजयाभिलाषी राजा के धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीति का वर्णन | राजा के छलरहित धर्मयुक्त बर्ताव की प्रशंसा | शूरवीर क्षत्रियों के कर्तव्य तथा सद्नति का वर्णन | इन्द्र और अम्बरीष के संवाद में नदी और यज्ञ के रूपों का वर्णन | समरभूमि में जुझते हुए मारे जाने वाले शूरवीरों को उत्तम लोकों की प्राप्ति का कथन | शूरवीरों को स्वर्ग और कायरों को नरक की प्राप्ति | सैन्यसंचालन की रीति-नीति का वर्णन | भिन्न-भिन्न देश के योद्धाओं का स्वभाव व आचरण के लक्षण | विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणों व बलवान सैनिकों का वर्णन | शत्रु को वश में करने के लिये राजा का नीति से काम लेना | दुष्टों को पहचानने के विषय में इन्द्र और बृहस्पति का संवाद | राज्य, खजाना और सेना से वंचित क्षेमदर्शी राजा को कालकवृक्षीय मुनि का उपदेश | कालकवृक्षीय मुनि के द्वारा गये हुए राज्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न उपायों का वर्णन | कालकवृक्षीय मुनि का विदेहराज तथा कोसलराजकुमारों का मेल कराना | विदेहराज का कोसलराज को अपना जामाता बनाना | गणतन्त्र राज्य का वर्णन और उसकी नीति | माता-पिता तथा गुरु की सेवा का महत्त्व | सत्य-असत्य का विवेचन | धर्म के लक्षण व व्यावहारिक नीति का वर्णन | सदाचार और ईश्वरभक्ति को दु:खों से छुटने का उपाय | मनुष्य के स्वभाव की पहचान बताने वाली बाघ और सियार की कथा | तपस्वी ऊँट के आलस्य का कुपरिणाम और राजा का कर्तव्य | सरिताओं और समुद्र का संवाद | दुष्ट मनुष्य द्वारा की हुई निन्दा को सह लेने से लाभ | राजा तथा राजसेवकों के आवश्यक गुण | सज्जनों के चरित्र के विषय में महर्षि और कुत्ते की कथा | कुत्ते का शरभ की योनि से महर्षि के शाप से पुन: कुत्ता हो जाना | राजा के सेवक, सचिव आदि और राजा के गुणों व उनसे लाभ का वर्णन | सेवकों को उनके योग्य स्थान पर नियुक्त करने का वर्णन | सत्पुरुषों का संग्रह व कोष की देखभाल के लिए राजा को प्रेरणा देना | राजधर्म का साररूप में वर्णन | दण्ड के स्वरूप, नाम, लक्षण और प्रयोग का वर्णन | दण्ड की उत्पत्ति का वर्णन | दण्ड का क्षत्रियों कें हाथ में आने की परम्परा का वर्णन | त्रिवर्ग के विचार का वर्णन | पाप के कारण राजा के पुनरुत्थान के विषय में आंगरिष्ठ और कामन्दक का संवाद | इन्द्र और प्रह्लाद की कथा | शील का प्रभाव, अभाव में धर्म, सत्य, सदाचार और लक्ष्मी के न रहने का वर्णन | सुमित्र और ऋषभ ऋषि की कथा | राजा सुमित्र का मृग की खोज में तपस्वी मुनियों के आश्रम पर पहुँचना | सुमित्र का मुनियों से आशा के विषय में प्रश्न करना | ऋषभ का सुमित्र को वीरद्युम्न व तनु मुनि का वृतान्त सुनाना | तनु मुनि का वीरद्युम्न को आशा के स्वरूप का परिचय देना | ऋषभ के उपदेश से सुमित्र का आशा को त्याग देना | यम और गौतम का संवाद | आपत्ति के समय राजा का धर्म

आपद्धर्म पर्व

आपत्तिग्रस्त राजा के कर्त्तव्य का वर्णन | ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओं के धर्म का वर्णन | धर्म की गति को सूक्ष्म बताना | राजा के लिए कोश संग्रह की आवश्यकता | मर्यादा की स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्ति की निन्दा | बल की महत्ता और पाप से छूटने का प्रायश्रित्त | मर्यादा का पालन करने वाले कायव्य दस्यु की सद्गति का वर्णन | राजा के द्वारा किसका धन लेने व न लेने तथा कैसे बर्ताव करे इसके विचार का वर्णन | शत्रुओं से घिरे राजा के कृर्त्तव्य का वर्णन | राजा के कृर्त्तव्य के विषय में बिडाल व चूहे का आख्यान | शत्रु से सावधान रहने के विषय में राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़िया का संवाद | भारद्वाज कणिक का सौराष्ट्रदेश के राजा को कूटनीति का उपदेश | विश्वामित्र और चाण्डाल का संवाद | आपत्काल में धर्म का निश्चय | उत्तम ब्राह्मणों के सेवन का आदेश | बहेलिये और कपोत-कपोती का प्रसंग | कबूतर द्वारा अपनी भार्या का गुणगान व पतिव्रता स्त्री की प्रशंसा | कबूतरी का कबूतर से शरणागत व्याध की सेवा के लिए प्रार्थना | कबूतर द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीर का बहेलिये के लिए परित्याग | बहेलिये का वैराग्य | कबूतरी का विलाप और अग्नि में प्रवेश कर उन दोनों को स्‍वर्गलोक की प्राप्ति | बहेलिये को स्‍वर्गलोक की प्राप्ति | इन्द्रोत मुनि का जनमेजय को फटकारना | जनमेजय का इन्द्रोत मुनि की शरण में जाना | इन्द्रोत का जनमेजय को शरण देना | इन्द्रोत का जनमेजय को धर्मोपदेश देना | ब्राह्मण बालक के जीवित होने की कथा | नारद जी का सेमल वृक्ष से प्रश्न | नारद जी का सेमल को उसका अहंकार देखकर फटकारना | वायु का सेमल को धमकाना और सेमल का विचारमग्न होना | सेमल का हार स्वीकार कर बलवान के साथ वैर न करने का उपदेश | समस्त अनर्थो का कारण लोभ को बताकर उसने होने वाले पापों का वर्णन | श्रेष्ठ महापुरुषों के लक्षण | अज्ञान और लोभ को ही समस्त दोषों का कारण सिद्ध करना | मन और इंद्रियों के संयम रूप दम का माहात्म्य | तप की महिमा | सत्य के लक्षण, स्वरूप और महिमा का वर्णन | काम, क्रोध आदि दोषों का निरूपण व नाश का उपाय | नृशंस अर्थात अत्यन्त नीच पुरुष के लक्षण | नाना प्रकार के पापों और प्रायश्रितों का वर्णन | खड्ग की उत्पत्ति और प्राप्ति व महिमा का वर्णन | धर्म, अर्थ और काम के विषय में विदुर व पाण्डवों के पृथक-पृथक विचार | अन्त में युधिष्ठिर का निर्णय | मित्र बनाने व न बनाने योग्य पुरुषों के लक्षण | कृतघ्न गौतम की कथा का आरम्भ | गौतम का समुद्र की ओर प्रस्थान व बकपक्षी के घर पर अतिथि होना | गौतम का आतिथ्यसत्कार व विरूपाक्ष के भवन में प्रवेश | गौतम का राक्षसराज के यहाँ से सुर्वणराशि लेकर लौटना | गौतम का अपने मित्र बक के वध का विचार मन में लाना | कृतघ्न गौतम द्वारा राजधर्मा का वध | राक्षसों द्वार कृतघ्न की हत्या व उसके माँस को अभक्ष्य बताना | राजधर्मा और गौतम का पुन: जीवित होना

मोक्षधर्म पर्व

शोकाकुल चित्त की शांति के लिए सेनजित और ब्राह्मण संवाद | पिता के प्रति पुत्रद्वारा ज्ञान का उपदेश | त्याग की महिमा के विषय में शम्पाक का उपदेश | धन की तृष्णा से दु:ख का वर्णन | धन के त्याग से परम सुख की प्राप्ति | जनक की उक्ति तथा राजा नहुष के प्रश्नों के उत्तर मे बोध्यगीता | प्रह्लाद और अवधूत का संवाद | आजगर वृत्ति की प्रशंसा का वर्णन | काश्यप ब्राह्मण और इन्द्र का संवाद | शुभाशुभ कर्मों के परिणाम कर्ता को भोगने का प्रतिपादन | भरद्वाज और भृगु के संवाद में जगत की उत्पत्ति का वर्णन | आकाश से अन्य चार स्थूल भूतों की उत्पत्ति का वर्णन | पंचमहाभूतों के गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन | शरीर के भीतर जठरानल आदि वायुओं की स्थिति का वर्णन | जीव की सत्ता पर अनेक युक्तियों से शंका उपस्थित करना | जीव की सत्ता तथा नित्यता को युक्तियों से सिद्ध करना | मनुष्यों की और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन | कर्मो का और सदाचार का वर्णन | वैराग्य से परब्रह्मा की प्राप्ति | सत्य की महिमा, असत्य के दोष व लोक और परलोक के सुख-दु:ख का विवेचन | ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमों के धर्म का वर्णन | वानप्रस्थ और संन्यास धर्मों का वर्णन | हिमालय के उत्तर में स्थित लोक की विलक्षणता व महत्ता का प्रतिपादन | भृगु और भरद्वाज के संवाद का उपसंहार | शिष्टाचार का फलसहित वर्णन | पाप को छिपाने से हानि और धर्म की प्रशंसा | अध्यात्मज्ञान का निरूपण | ध्यानयोग का वर्णन | जपयज्ञ के विषय में युधिष्ठिर का प्रश्न | जप और ध्यान की महिमा और उसका फल | जापक में दोष आने के कारण उसे नरक की प्राप्ति | जापक के लिए देवलोक भी नरक तुल्य इसके प्रतिपादन का वर्णन | जापक को सावित्री का वरदान | धर्म, यम और काल का आगमन | राजा इक्ष्वाकु और ब्राह्मण का संवाद | सत्य की महिमा तथा जापक की गति का वर्णन | ब्राह्मण और इक्ष्वाकु की उत्तम गति का वर्णन | जापक को मिलने वाले फल की उत्कृष्टता | मनु द्वारा कामनाओं के त्याग एवं ज्ञान की प्रशंसा | परमात्मतत्त्व का निरूपण | आत्मतत्त्व और बुद्धि आदि पदार्थों का विवेचन | साक्षात्कार का उपाय | शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धि से आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन | आत्मा व परमात्मा के साक्षात्कार का उपाय तथा महत्त्व | परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | मनु बृहस्पति संवाद की समाप्ति | श्री कृष्ण से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति | श्री कृष्ण की महिमा का कथन | ब्रह्मा के पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियों के वंश का वर्णन | प्रत्येक दिशा में निवास करने वाले महर्षियों का वर्णन | विष्णु का वराहरूप में प्रकट हो देवताओं की रक्षा और दानवों का विनाश | नारद को अनुस्मृतिस्तोत्र का उपदेश | नारद द्वारा भगवान की स्तुति | श्री कृष्ण सम्बन्धी अध्यात्मतत्तव का वर्णन | संसारचक्र और जीवात्मा की स्थिति का वर्णन | निषिद्ध आचरण के त्याग आदि के परिणाम तथा सत्त्वगुण के सेवन का उपदेश | जीवोत्पत्ति के दोष और बंधनों से मुक्त तथा विषय शक्ति के त्याग का उपदेश | ब्रह्मचर्य तथा वैराग्य से मुक्ति | आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्म की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने के उपदेश | स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्था में मन की स्थिति का वर्णन | गुणातीत ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | सच्चिदान्नदघन परमात्मा, दश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष उन चारों के ज्ञान से मुक्ति का वर्णन | परमात्मा प्राप्ति के अन्य साधनों का वर्णन | राजा जनक के दरबार में पञ्चशिख का आगमन | नास्तिक मतों के निराकरणपूर्वक शरीर से भिन्न आत्मा की नित्य सत्ता का प्रतिपादन | पञ्चशिख के द्वारा मोक्षतत्त्व के विवेचन का वर्णन | विष्णु द्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेव की परीक्षा और उनके के लिए वर प्रदान | श्वेतकेतु और सुवर्चला का विवाह | पति-पत्नी का अध्यात्मविषयक संवाद | दम की महिमा का वर्णन | व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथि सेवा का विवेचन | सनत्कुमार का ऋषियों को भगवत्स्वरूप का उपदेश | इंद्र और प्रह्लाद का संवाद | इन्द्र के आक्षेप युक्त वचनों का बलि के द्वारा कठोर प्रत्युत्तर | बलि और इन्द्र का संवाद | बलि द्वारा इन्द्र को फटकारना | इन्द्र और लक्ष्मी का संवाद | बलि को त्यागकर आयी हुई लक्ष्मी की इन्द्र के द्वारा प्रतिष्ठा | इन्द्र और नमुचि का संवाद | काल और प्रारब्ध की महिमा का वर्णन | लक्ष्मी का दैत्यों को त्यागकर इन्द्र के पास आना | सद्गुणों पर लक्ष्मी का आना व दुर्गुणों पर त्यागकर जाने का वर्णन | जैगीषव्य का असित-देवल को समत्वबुद्धि का उपदेश | श्रीकृष्ण और उग्रसेन का संवाद | शुकदेव के प्रश्नों के उत्तर में व्यास जी द्वारा काल का स्वरूप बताना | व्यास जी का शुकदेव को सृष्टि के उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मों का उपदेश | ब्राह्मप्रलय एंव महाप्रलय का वर्णन | ब्राह्मणों का कर्तव्य और उन्हें दान देने की महिमा का वर्णन | ब्राह्मण के कर्तव्य का प्रतिपादन करते हुए कालरूप नद को पार करने का उपाय | ध्यान के सहायक योग | फल और सात प्रकार की धारणाओं का वर्णन | मोक्ष की प्राप्ति | सृष्टि के समस्त कार्यों में बुद्धि की प्रधानता | प्राणियों की श्रेष्ठता के तारतम्य का वर्णन | नाना प्रकार के भूतों की समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्व का विवेचन | युगधर्म का वर्णन एवं काल का महत्त्व | ज्ञान का साधन और उसकी महिमा | योग से परमात्मा की प्राप्ति का वर्णन | कर्म और ज्ञान का अन्तर | ब्रह्मप्राप्ति के उपाय का वर्णन | ब्रह्मचर्य-आश्रम का वर्णन | गार्हस्थ्य-धर्म का वर्णन | वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रम के धर्म और महिमा का वर्णन | संन्यासी के आचरण | ज्ञानवान संन्यासी का प्रशंसा | परमात्मा की श्रेष्ठता व दर्शन का उपाय | ज्ञानमय उपदेश के पात्र का निर्णय | महाभूतादि तत्त्वों का विवेचन | बुद्धि की श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक | ज्ञान के साधन व ज्ञानी के लक्षण और महिमा | परमात्मा की प्राप्ति का साधन | ज्ञान से ब्रह्म की प्राप्ति | ब्रह्मवेत्ता के लक्षण व परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | शरीर में पंचभूतों के कार्य व गुणों की पहचान | जीवात्मा और परमात्मा का योग द्वारा साक्षात्कार | कामरूपी अद्भुत वृक्ष व शरीर रूपी नगर का वर्णन | मन और बुद्धि के गुणों का विस्तृत वर्णन | युधिष्ठिर का मृत्युविषयक प्रश्न व ब्रह्मा की रोषाग्नि से प्रजा के दग्ध होने का वर्णन | ब्रह्मा के द्वारा रोषाग्नि का उपसंहार व मृत्यु की उत्पत्ति | मृत्यु की तपस्या व प्रजापति की आज्ञा से मृत्यु का प्राणियों के संहार का कार्य स्वीकार करना | धर्माधर्म के स्वरूप का निर्णय | युधिष्ठिर का धर्म की प्रमाणिकता पर संदेह उपस्थित करना | जाजलि की घोर तपस्या व जटाओं में पक्षियों का घोंसला बनाने से उनका अभिमान | आकाशवाणी की प्रेरणा से जाजलि का तुलाधार वैश्य के पास जाना | जाजलि और तुलाधार का धर्म के विषय में संवाद | जाजलि को तुलाधार का आत्मयज्ञविषयक धर्म का उपदेश | जाजलि को पक्षियों का उपदेश | राजा विचख्नु के द्बारा अहिंसा-धर्म की प्रशंसा | महर्षि गौतम और चिरकारी का उपाख्यान | दीर्घकाल तक सोच-विचारकर कार्य करने की प्रशंसा | द्युमत्सेन और सत्यवान का संवाद | अहिंसापूर्वक राज्यशासन की श्रेष्ठता का कथन | स्यूमरश्मि और कपिल का संवाद | प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्ग के विषय में स्यूमरश्मि व कपिल संवाद | चारों आश्रमों में उत्तम साधनों के द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति का कथन | ब्रह्मण और कुण्डधार मेघ की कथा | यज्ञ में हिंसा की निंदा और अहिंसा की प्रशंसा | धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्ष के विषय में युधिष्ठिर के प्रश्न | मोक्ष के साधन का वर्णन | नारद और असितदेवल का संवाद | तृष्णा के परित्याग के विषय में माण्डव्य मुनि और जनक का संवाद | पिता और पुत्र का संवाद | हारित मुनि के द्वारा आचरण व धर्मों का वर्णन | ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | ब्रह्म की प्राप्ति के विषय में वृत्र और शुक्र का संवाद | वृत्रासुर को सनत्कुमार का आध्यात्मविषयक उपदेश | भीष्म द्वारा युधिष्ठिर की शंका निवारण | इन्द्र और वृत्रासुर के युद्ध का वर्णन | वृत्रासुर के वध से प्रकट हुई ब्रह्महत्या का ब्रह्मा जी के द्वारा चार स्थानों में विभाजन | शिवजी के द्वारा दक्ष के यज्ञ का भंग | शिवजी के क्रोध से ज्वर की उत्पत्ति व उसके विविध रूप | पार्वती के रोष के निवारण के लिए शिव द्वारा दक्ष-यज्ञ का विध्वंस | महादेव जी का दक्ष को वरदान | स्तोत्र की महिमा | अध्यात्म ज्ञान और उसके फल का वर्णन | समंग द्वारा नारद जी से अपनी शोकहीन स्थिति का वर्णन | नारद जी द्वारा गालव मुनि को श्रेय का उपदेश | अरिष्टनेमि का राजा सगर को मोक्षविषयक उपदेश | उशना का चरित्र | उशना को शुक्र नाम की प्राप्ति | पराशर मुनि का राजा जनक को कल्याण की प्राप्ति के साधन का उपदेश | कर्मफल की अनिवार्यता | कर्मफल से लाभ | धर्मोपार्जित धन की श्रेष्ठता, व अतिथि-सत्कार का महत्त्व | गुरुजनों की सेवा से लाभ | सत्संग की महिमा व धर्मपालन का महत्त्व | ब्राह्मण और शूद्र की जीविका | मनुष्यों में आसुरभाव की उत्पत्ति व शिव के द्वारा उसका निवारण | विषयासक्त मनुष्य का पतन | तपोबल की श्रेष्ठता व दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालन का आदेश | वर्ण विशेष की उत्पत्ति का रहस्य | हिंसारहित धर्म का वर्णन | धर्म व कर्तव्यों का उपदेश | राजा जनक के विविध प्रश्नों का उत्तर | ब्रह्मा को साध्यगणों को उपदेश | योगमार्ग के स्वरूप, साधन, फल और प्रभाव का वर्णन | सांख्ययोग के अनुसार साधन का वर्णन | सांख्ययोग के फल का वर्णन | वसिष्ठ और करालजनक का संवाद | प्रकृति-संसर्ग के कारण जीव का बारंबार जन्म ग्रहण करना | प्रकृति के संसर्ग दोष से जीव का पतन | क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुष के विषय में राजा जनक की शंका | योग और सांख्य के स्वरूप का वर्णन तथा आत्मज्ञान से मुक्ति | विद्या-अविद्या व पुरुष के स्वरूप के उद्गार का वर्णन | वसिष्ठ व जनक संवाद का उपसंहार | जनकवंशी वसुमान को मुनि का धर्मविषयक उपदेश | याज्ञवल्क्य का जनक को उपदेश | इन्द्रियों में मन की प्रधानता का प्रतिदान | संहार क्रम का वर्णन | अध्यात्म व अधिभूत वर्णन तथा राजस और तामस के भावों के लक्षण | राजा जनक के प्रश्न | प्रकृति पुरुष का विवेक और उसका फल | योग का वर्णन व उससे परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति | मृत्यु सूचक लक्षण व मृत्यु को जीतने का उपाय | याज्ञयवल्क्य द्वारा सूर्य से वेदज्ञान की प्राप्ति का प्रसंग सुनाना | विश्वावसु को जीवात्मा और परमात्मा की एकता के ज्ञान का उपदेश देना | याज्ञवल्क्य का जनक को उपदेश देकर विदा होना | पञ्चशिख और जनक का संवाद | सुलभा का राजा जनक के शरीर में प्रवेश करना | राजा जनक का सुलभा पर दोषारोपण करना | सुलभा का राजा जनक को अज्ञानी बताना | व्यास जी का शुकदेव को धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना | शुभाशुभ कर्मों के परिणाम का वर्णन | शंकर द्वारा व्यास को पुत्रप्राप्ति के लिये वरदान देना | शुकदेव की उत्पति तथा संस्कार का वृतान्त | पिता की आज्ञा से शुकदेव का मिथिला में जाना | शुकदेव का ध्यान में स्थित होना | राजा जनक द्वारा शुकदेव जी का पूजन तथा उनके प्रश्न का समाधान | जनक द्वारा बह्मचर्याश्रम में परमात्मा की प्राप्ति | शुकदेव द्वारा मुक्त पुरुष के लक्षणों का वर्णन | शुकदेव का पिता के पास लौट आना


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