भक्ति सुधा -करपात्री महाराज पृ. 327

भक्ति सुधा -करपात्री महाराज

भक्तिरसामृतास्वादन

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श्रीभगवद्धर्म से द्रुत, शुद्ध हृदय में प्रादुर्भूत निरुपम सुखसंविद्रूप, दुःख को छाया से विनिर्मुक्त श्रीभक्ति का माहात्म्य यत्र-तत्र शास्त्रों में वर्णित है। सर्वाधिष्ठान, परमानन्दस्वरूप, औपनिषद्, परम पुरुष की रसस्वरूपता “रसो वै सः” इत्यादि श्रुतियों में प्रसिद्ध है। लौकिक आनन्दों में भी उसी रसस्वरूप भगवान की आंशिक अभिव्यक्ति होती है। रस के विषय एवं आश्रय की मलिनता से शुद्ध रस में भी मालिन्य की प्रतीति होती है। ‘भक्तिरसायन’ कार ने कहा है- “किंच न्यूनाञ्ज रसतां याति जाड्यविमिश्रणात्[1] अर्थात विषयावच्छिन्न-चैतन्य ही द्रवावस्थापन्न अन्तःकरण की वृत्ति पर उपारूढ़ होकर भावरूपता को प्राप्त कर पीछे रसस्वरूप हो जाता है।

लौकिक रस परमानन्दस्वरूप नहीं हो सकता, किन्तु भक्तिरस में अनवच्छिन्न-चिदानन्दघन भगवान की स्फूर्ति होती है, अतः वह परमानन्दस्वरूप है। इसीलिये जो लोग कृष्णविषयक रति को रसरूप नहीं, भावरूप ही मानते हैं, क्योंकि देवताविषयक रति भावस्वरूपा ही हेाती है, उनका मत ठीक नहीं है। क्योंकि कृष्णभिन्न-देवताविषयक रति भावरूपा होती है। भगवान श्रीकृष्ण परमानन्द स्वरूप हैं, अतः कृष्णविषयक रति रसरूपा ही होगी, भावरूपा नहीं। बल्कि कान्तादिविषयक रति की वैसी रसता पुष्ट नहीं होती, जैसी भगवद्विषयक रति की। श्रीमधुसूदन सरस्वती ने कहा है कि-भगवद्विषयिणी रति परिपूर्णरसस्वरूप होने के कारण क्षुद्रकान्तादिविषयक रति से वैसी ही बलवती है, जैसे खद्योतों से आदित्य प्रभा-

 

“परिपूर्णरसा क्षुद्ररसेभ्यो भगवद्रतिः।
खद्योतेभ्य इवादित्यप्रभेव बलवत्तरा।।”[2]

विषय और आश्रय दोनों या दोनों में से एक यदि रसात्मक हो, तो रति भी विशुद्ध रसस्वरूपा होती है। विशेषतः समुद्वेलित सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उभयविध श्रृंगार रससारसर्वस्व भगवान ही मनोवृत्ति में विशिष्ट रसभाव को प्राप्त करते हैं। जैसे रस में रसोद्रेक की कल्पना होती है, वैसे ही यहाँ भी कल्पना की गयी है।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. प्रथम उल्ला. 13 कारि.
  2. भक्तिरसा. उल्ला. कारि. 76

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