निवृत्तिमार्ग का उपदेश

महाभारत आश्वमेधिक पर्व के अनुगीता पर्व के अंतर्गत अध्याय 42 में निवृत्तिमार्ग का उपदेश का वर्णन हुआ है।[1]

ब्रह्मा द्वारा निवृत्तिमार्ग का उपदेश का वर्णन

वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! ब्रह्मा जी ने कहा- महर्षिगण! अब मैं मन की सूक्ष्म भावना को जाग्रत करने वाली कल्याणमयी निवृत्ति के विषय में उपदेश देता हूँ, जो कोमल और कठोर भाव से समस्त प्राणियों में रहती है। जहाँ गुण होते हुए भी नहीं के बराबर हैं, जो अभिमान से रहित और एकान्तचर्या से युक्त हैं तथा जिसमें भेद दृष्टि का सर्वथा अभाव हैं, वही ब्रह्ममय बर्ताव बतलाया गया है, वही समस्त सुखों का एकमात्र आधार है। जैस कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, उसी प्रकार जो विद्वान मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाओं का सब ओर से संकुचित करके रजोगुण से रहित हो जाता है, वह सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त एवं सदा के लिये सुखी हो जाता है। जो कामनाओं को अपने भीतर लीन करके तृष्णा से रहित, एकाग्रचित्त तथा सम्पूर्ण प्राणियों का सुह्रद और मित्र होता है, वह ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है। विषयों की अभिलाषा रखने वाली समस्त इन्द्रियों को रोक कर जन समुदाय के स्थान का परित्याग करने से मुनि का अध्यात्म ज्ञान रूपी तेज अधिक प्रकाशित होता है। जैसे ईंधन डालने से आग प्रज्वलित होकर अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देती है, उसी प्रकार इन्द्रियों का निरोध करने से परमात्मा के प्रकाश का विशेष अनुभव होने लगता है। जिस समय योगी प्रसन्नचित होकर सम्पूर्ण प्राणियेां को अपने अन्त:करण में स्थित देखने लगता है, उस समय वह स्वयंज्योति: स्वरूप होकर सूक्ष्म से भी सूक्ष्म सर्वोततम परमात्मा को प्राप्त होता है। अग्नि जिसका रूप है, रुधिर जिसका प्रवाह हे, पवन जिसका स्पर्श है, पृथ्वी जिसमें हाड़-मांस आदि कठोर रूप में प्रकट है, आकाश जिसका कान है, जो रोग और शोक से चारों ओर से घिरा हुआ है, जो पाँच प्रवाहों से आवृत है, जो पाँच भूतों से भली-भाँति युक्त है, जिसके नौ द्वार हैं, जिसके दो (जीव और ईश्वर) देवता हैं, जो रजोगुणमय, अदृश्य (नाशवान्), (सुख दु:ख और मोहरूप) तीन गुणों से तथा वात, पित्त और कफ इन तीन धातुओं से युक्त है, जो संसर्ग में रत और जड है, उसको शरीर समझना चाहिये।

जिसका सम्पूण लोक में विचरण करना दु:खद है, जो बुद्धि के आश्रित है, वही इस लोक में कालच्रक है। यह कालचक्र और अगाध और मोह नाम से कहा जाने वाला बड़ा भारी समुद्र रूप है। यह देवताओं के सहित समस्त जागत का संक्षेप और विस्तार करता है तथा सबको जगाता है। सदा इन्द्रियों के निरोध से मनुष्य काम, क्रोध, भय, लोभ, द्रोह और असत्य- इन सब दुस्त्यज अवगुणों को त्याग देता है। जिसने इस लोक में तीन गुणों वाले पांचभौतिक देह का अभिमान त्याग दिया है, उसे अपने हृदयाकाश में पर ब्रह्मरूप उत्तम पद की उपलब्धि होती है- वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।[1] जिसमें पाँच इन्द्रिय रूपी बड़े कगारे हैं, जो मनोवेग रूपी महान जलराशि से भरी हुई है और जिसके भीतर मोहमय कुण्ड है, उस देहरूपी नदी को लाँघकर जो काम और क्रोध- दोनों को जीत लेता है, वही सब दोषों से युक्त होकर पर ब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार करता है। जो मन को हृदय कमल में स्थापित करके अपने भीतर ही ध्यार के द्वारा आत्मदर्शन का प्रयत्न करता है, वह सम्पूर्ण भूतों में सर्वज्ञ होता है और उसे अन्त:करण में परमात्म तत्त्व का अनुभव हो जाता है। जैसे एक दीप से सैकड़ों दीप जला लिये जाते हैं, उसी प्रकार एक ही परमात्मा यत्र-तत्र अनेक रूपों में उपलब्ध होता है। ऐसा निश्चय करके ज्ञानी पुरुष नि:सन्देह सब रूपों को एक से ही उत्पन्न देखता है। वास्तव में वही परमात्मा विष्णु, मित्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति, धाता, विधाता, प्रभु, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण प्राणियों का हृदय तथा महान आत्मा के रूप में प्रकाशित है। ब्राह्मण समुदाय, देवता, असुर, यक्ष, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षस, भूत और सम्पूर्ण महर्षि भी सदा उस परमात्मा की स्तुति करते हैं।[2]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 महाभारत आश्वमेधिक पर्व अध्याय 42 श्लोक 42-57
  2. महाभारत आश्वमेधिक पर्व अध्याय 42 श्लोक 58-63

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