नारद जी द्वारा गालव मुनि को श्रेय का उपदेश

महाभारत शान्ति पर्व के मोक्षधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 287 में नारद जी द्वारा गालव मुनि को श्रेय के उपदेश देने का वर्णन किया गया है, जो इस प्रकार है[1]-

भीष्म द्वारा नारद और गालव के संवाद का वर्णन

युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! जो शास्‍त्रों के तत्त्व को नहीं जानता, जिसका मन सदा संशय में ही पड़ा रहता है तथा जिसने परमार्थ के लिये कोई निश्चित ध्‍येय नहीं बनाया है, उस पुरुष का कल्याण कैसे हो स‍कता है?

भीष्म जी ने कहा- युधिष्ठिर! सदा गुरुजनों की पूजा, वृद्ध पुरुषों की सेवा और शास्‍त्रों का श्रवण- ये तीन कल्याण के अमोघ साधन बताये जाते हैं। इस विषय में भी जानकार मनुष्य देवर्षि नारद और महर्षि गालव के संवादरूप प्राचीन इतिहास को उदाहरण दिया करते हैं। एक समय की बात है, कल्याण की इच्‍छा रखने वाले जितेन्द्रिय गालव मुनि ने अपने आश्रम पर पधारे हुए देवोपम तेजस्‍वी ब्राह्मण, मोह और क्‍लान्ति से रहित, ज्ञानानन्‍द से परिपूर्ण एवं मन को वश में रखने वाले देवर्षि नारद जी से इस प्रकार पूछा- 'मुने! संसार में कोई भी पुरुष जिन गुणों द्वारा सम्मानित होता है, उन समस्‍त गुणों का मैं आपमें कभी अभाव नहीं देखता हूँ। लोक-तत्त्व के ज्ञान से शून्‍य और चिरकाल से अज्ञान में पड़े हुए हम-जैसे लोगों के संशय का निवारण सर्वगुणसम्पन्‍न आप-जैसा महात्मा ही कर सकता है। मुने! शास्‍त्रों में बहुत- से कर्तव्‍यकर्म बताये गये हैं, उनमें अमुक कर्म के इस प्रकार करने से ज्ञानमार्ग में प्रवृति हो सकती है, इसका विशेषरूप से हमें निश्‍चय नहीं हो पाता है; अत: हमारे लिये जो कर्तव्‍य हो और जिसका निर्धारण हम न कर पाते हों, उसे आप ही हमें बताने की कृपा करें।

भगवान! सभी आश्रमों वाले पृथक-पृथक आचार का दर्शन कराते हैं तथा 'यह श्रेष्ठ है, यह श्रेष्ठ है' ऐसा उपदेश देते हुए वे (अपने ही सिद्धान्‍तों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करते हैं और) सभी मनुष्यों की बुद्धि में यही बात जमा देते हैं। जिनके मन में वह बात बैठ गयी है, उन सबको उन शास्‍त्रों के उपदेश के अनुसार नाना प्रकार के आचार मार्ग से चलते और अपने-अपने शास्‍त्रों का अभिनन्‍दन करते देखकर जैसे हम अपनी मान्‍यता में संतुष्ट हैं, वैसे ही उन्‍हें भी संतुष्ट पाकर हमारे मन में संशय उत्पन्‍न हो गया है। हम यह ठीक-ठीक निश्‍चय नहीं कर पा रहे हैं कि परमकल्याण की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय क्‍या है? यदि शास्‍त्र एक होता तो श्रेय की प्राप्ति का उपाय भी एक ही होने के कारण वह स्‍पष्ट रूप से समझ में आ जाता, परंतु बहुत-से शास्‍त्रों ने नाना प्रकार से वर्णन करके श्रेय को गुह्य अवस्‍था में पहुँचा दिया है- उसे अत्यन्‍त गूढ़ बना डाला है। इस कारण से मुझे श्रेय का स्‍वरूप संशयाच्‍छन्‍न जान पड़ता है। भगवान! अब आप ही मुझे उसका उपदेश दें। मैं आपकी शरण में आया हूँ, आप मुझ शिष्य को श्रेयोमार्ग का बोध करायें।'

नारद जी ने कहा- तात! आश्रम चार हैं और शास्‍त्रों में उनकी पृथक-पृथक व्‍यवस्‍था की गयी है। गालव! तुम ज्ञान का आश्रय लेकर उन सबको यथार्थरूप से जानो। विप्रवर! उन-उन आश्रमों के जो नाना प्रकार से गुण-सम्पन्‍न धर्म बताये गये हैं, उनकी पृथक-पृथक स्थिति है। इस बात को तुम देखो और समझो।[1] जो साधारण मनुष्य हैं, वे उन आश्रमों के वा‍स्‍तविक अभिप्राय को भली-भाँति संशयरहित नहीं जान पाते, किंतु उनसे भिन्‍न जो तत्त्वज्ञ हैं, वे इन आश्रमों के परमतत्त्व को ठीक-ठीक समझते हैं। जो अच्‍छी तरह कल्याण करने वाला साधन होता है, वह सर्वथा संशयरहित होता है। सुहृदों पर अनुग्रह करना, शत्रुभाव रखने वाले दुष्टों को दण्ड देना तथा धर्म, अर्थ और काम का संग्रह करना- इसे मनीषी पुरुष श्रेय कहते हैं। पापकर्म से दूर रहना, निरन्‍तर पुण्यकर्मों में लगे रहना और सत्यपुरुषों के साथ रहकर सदाचार का ठीक-ठीक पालन करना- यह संशयरहित कल्याण का मार्ग है। सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति कोमलता का बर्ताव करना, व्‍यवहार में सरल होना तथा मीठे वचन बोलना- यह भी कल्याण का संदेहरहित मार्ग है। देवताओं, पितरों और अतिथियों को उनका भाग देना तथा भरण-पोषण करने योग्‍य व्‍यक्तियों का त्याग न करना- यह कल्याण का निश्चित साधन है। सत्य बोलना भी श्रेयस्‍‍कर है; परंतु सत्य को यथार्थरूप से जानना कठिन है। मैं तो उसी को सत्य कहता हूँ, जिससे प्राणियों का अत्यन्‍त हित होता हो। अहंकार का त्याग, प्रमाद को रोकना, संतोष और एकान्‍तवास- यह सुनिश्चित श्रेय कहलाता है।

धर्माचरणपूर्वक वेद और वेदांगों का स्‍वाध्‍याय करना तथा उनके सिद्धान्‍त को जानने की इच्‍छा को जगाये रखना निस्‍संदेह कल्याण का साधन है। जिसे कल्याण प्राप्ति की इच्‍छा हो, उस मनुष्य को किसी तरह भी शब्‍द, स्‍पर्श, रूप, रस और गन्‍ध- इन विषयों का अधिक सेवन नहीं करना चाहिये। कल्याण चाहने वाला पुरुष रात में घूमना, दिन में सोना, आलस्‍य, चुगली, मादक वस्‍तु का सेवन, आहार-विहार का अधिक मात्रा में सेवन और उसका सर्वथा त्याग- ये सब बातें त्याग दे। दूसरों की निन्‍दा करके अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयत्न न करे। साधारण मनुष्यों की अपेक्षा जो अपनी उत्कृष्टता है, उसे अपने गुणों द्वारा ही सिद्ध करे (बातों से नहीं)। गुणहीन मनुष्य ही अधिकतर अपनी प्रशंसा किया करते हैं। वे अपने में गुणों की कमी देखकर दूसरे गुणवान पुरुषों के गुणों में दोष बताकर उन पर आक्षेप किया करते हैं। यदि उनको उत्तर दिया जाय तो फिर वे घमंड में भरकर अपने-आपको महापुरुषों से भी अधिक गुणवान मानने लगें। परंतु जो दूसरे किसी की निन्‍दा तथा अपनी प्रशंसा नहीं करता, ऐसा उत्तम गुणसम्पन्‍न विद्वान पुरुष ही महान यश का भागी होता है। फूलों की पवित्र एवं मनोरम सुगन्‍ध बिना कुछ बोले ही महक उठती है। निर्मल सूर्य अपनी प्रशंसा किये बिना ही आकाश में प्रकाशित होने लगते हैं। इस प्रकार संसार में और भी बहुत-सी ऐसी बुद्धि से रहित वस्‍तुएँ हैं, जो अपनी प्रशंसा नहीं करती हैं, किंतु अपने यश से जगमगाती रहती हैं। मूर्ख मनुष्य केवल अपनी प्रशंसा करने से ही जगत में ख्‍याति नहीं पा सकता। विद्वान पुरुष गुफा में छिपा रहे तो भी उसकी सर्वत्र प्रसिद्धि हो जाती है। बुरी बात जोर-जोर से कही गयी हो तो भी वह शून्‍य में विलीन हो जाती है, लोक में उसका आदर नहीं होता है; किंतु अच्‍छी बात धीरे से कही जाय तो भी वह संसार में प्रकाशित होती है- उसका आदर होता और प्रभाव बढ़ता है।[2]

घमंडी मूर्खों की कही हुई असार बातें उनके दूषित अन्‍त:करण का ही प्रदर्शन कराती हैं, ठीक उसी तरह जैसे सूर्य सूर्यकान्‍तमणि के योग से अपने दाहक अग्निरूप को ही प्रकट करता है। इस कारण कल्याण की इच्‍छा रखने वाले साधु पुरुष अनेक शास्‍त्रों के अध्‍ययन से नाना प्रकार की प्रज्ञा (उत्तम बुद्धि) का ही अनुसंधान करते हैं। मुझे तो सभी प्राणियों के लिये प्रज्ञा का लाभ ही उत्तम जान पड़ता है। बुद्धिमान पुरुष ज्ञानवान होने पर भी बिना पूछे किसी को कोई उपदेश न करे। अन्‍यायपूर्वक पूछने पर भी किसी के प्रश्‍न का उत्तर न दे। जड़ की भाँति चुपचाप बैठा रहे। मनुष्य को सदा धर्म में लगे रहने वाले साधु-महात्माओं तथा स्‍वधर्मपरायण उदार पुरुषों के समीप निवास करने की इच्‍छा रखनी चाहिये। जहाँ चारों वर्णों के धर्मों का उल्लघंन होता हो, वहाँ कल्याण की इच्‍छा वाले पुरुष को किसी तरह भी नहीं रहना चाहिये। किसी कर्म का आरम्भ न करने वाला और जो कुछ मिल जाय, उसी से जीवन-निर्वाह करने वाला पुरुष भी यदि पुण्यात्माओं के समाज में रहे तो उसे निर्मल पु्ण्य की प्राप्ति होती है और पापियों के संसर्ग में रहे तो वह पाप का ही भागी होता है। जैसे जल, अग्नि और चन्‍द्रमा की किरणों के संसंर्ग में आने पर मनुष्य क्रमश: शीत, उष्ण और सुखदायी स्‍पर्श का अनुभव करता है, उसी प्रकार हम पुण्यात्मा और पापियों के संग से पुण्य और पाप दोनों के स्‍पर्श का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। जो विघसाशी (भृत्यवर्ग और अतिथि आदि को भेजन कराने के बाद बचा हुआ भोजन करने वाले) हैं, वे तिक्‍त-मधुर रस या स्‍वाद की आलोचना न करते हुए अन्‍न ग्रहण करते हैं; किंतु जो अपनी रसना का विषय समझकर स्‍वादु और अस्‍वादु का विचार रखते हुए भोजन करते हैं, उन्‍हें कर्मपाश में बँधा हुआ ही समझना चाहिये। जहाँ ब्राह्मण अनादर एवं अन्‍यायपूर्वक धर्म-शास्‍त्रविषयक प्रश्‍न करने वाले पुरुषों को धर्म का उपदेश करता हो, आत्मपरायण साधक को उस देश का परित्याग कर देना चाहिये।

जहाँ गुरु और शिष्य का व्‍यवहार सुव्‍यस्थित, शास्‍त्र-सम्मत एवं यथावत रूप से चलता है, कौन उस देश का परित्याग करेगा? जहाँ के लोग बिना किसी आधार के ही विद्वान पुरुषों पर निश्चित रूप से दोषारोपण करते हों, उस देश में आत्मसम्मान की इच्‍छा रखने वाला कौन मनुष्य निवास करेगा? जहाँ लालची मनुष्यों ने प्राय: धर्म की मर्यादाएँ तोड़ डाली हों, जलते हुए कपड़े की भाँति उस देश को कौन नहीं त्याग देगा? परंतु जहाँ के लोग मात्सर्य और शंका से रहित होकर धर्म का आचरण करते हों, वहाँ पुण्यशील साधु पुरुषों के पास अवश्‍य निवास करे। जहाँ के मनुष्य धन के लिये धर्म का अनुष्ठान करते हों, वहाँ उनके पास कदापि न रहे; क्‍योंकि वे सब-के सब पापाचारी होते हैं। जहाँ जीवन की रक्षा के लिये लोग पापकर्म से जीविका चलाते हों, सर्पयुक्‍त घर के समान उस स्‍थान से तुरंत हट जाना चाहिये। अपनी उन्‍नति चाहने वाले साधक को चाहिये कि जिस पापकर्म के संस्‍कारों से युक्‍त हुआ मनुष्य खाट पर पड़कर दु:ख भोगता है, उस कर्म को पहले से ही न करें।[3] जहाँ राजा और राजा के निकटवर्ती अन्‍य पुरुष कुटुम्बी-जनों से पहले ही भोजन कर लेते हैं, उस राष्ट्र को मनस्‍वी पुरुष अवश्‍य त्याग दे। जिस देश में सदा धर्मपरायण, यज्ञ कराने और पढ़ाने के कार्य में संलग्‍न सनातनधर्मी श्रो‍त्रिय ब्राह्मण ही सबसे पहले भोजन पाते हों, उस राष्ट्र में अवश्‍य निवास करें। जहाँ स्‍वाहा (अग्निहोत्र), स्‍वधा (श्राद्धकर्म) तथा वषट्कार का भली-भाँति अनुष्ठान होता हो और निरन्‍तर ये सभी कर्म किये जाते हों, वहाँ बिना विचारे ही निवास करना चाहिये। जहाँ ब्राह्मणों को जीविका के लिये कष्ट पाते तथा अपवित्र अवस्‍था में रहते देखे, उस राष्ट्र को निकटवर्ती होने पर भी विषमिश्रित भोग्‍यवस्‍तु की भाँति त्याग दें। जहाँ के लोग प्रसन्‍नतापूर्वक बिना माँगे ही भिक्षा देते हों, वहाँ मन को वश में क‍रने वाला पुरुष कृतकृत्य की भाँति स्‍वस्‍थचित्त होकर निवास करें।

जहाँ उद्दण्ड पुरुषों को दण्ड दिया जाता हो और जितात्मा पुरुषों का सत्कार किया जाता हो, वहाँ पुण्यशील श्रेष्ठ पुरुषों के बीच विचरना और निवास करना चाहिये। जो जितेन्द्रिय पुरुषों पर क्रोध और श्रेष्ठ पुरुषों पर अत्याचार करते हों, उद्दण्ड और लोभी हों, ऐसे लोगों को जहाँ अत्यन्‍त कठोर और महान दण्ड दिया जाता हो, उस देश में बिना विचारे निवास करना चाहिये। जहाँ राजा सदा धर्मपरायण रहकर धर्मानुसार ही राज्‍य का पालन करता हो और सम्पूर्ण कामनाओं का स्‍वामी होकर भी विषयभोग से विमुख रहता हो, वहाँ बिना कुछ सोचे-विचारे निवास करना चाहिये। क्‍योंकि राजा के शील-स्‍वभाव जैसे होते हैं वैसे ही प्रजा के भी हो जाते हैं। वह अपने कल्याण का अवसर उपस्थित होने पर प्रजा को भी शीघ्र ही कल्याण का भागी बना देता है। तात! मैंने तुम्हारे प्रश्‍न के अनुसार यह श्रेयोमार्ग का वर्णन किया है। पूर्णतया तो आत्मकल्याण की परिगणना हो ही नहीं सकती। जो इस प्रकार की वृति से रहकर जीविका चलाता है और प्राणियों के हित में मन लगाये रहता है, उस पुरुष को स्‍वधर्मरूप तप के अनुष्ठान से इस लोक में ही परमकल्याण की प्रत्यक्ष उप‍लब्धि हो जायेगी।[4]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 287 श्लोक 1-13
  2. महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 287 श्लोक 14-32
  3. महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 287 श्लोक 33-48
  4. महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 287 श्लोक 49-59

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राजधर्मानुशासन पर्व
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युधिष्ठिर को समझाना | व्यास का युधिष्ठिर को समझाते हुए देवासुर संग्राम का औचित्य सिद्ध करना | कर्मों को करने और न करने का विवेचन | पापकर्म के प्रायश्चितों का वर्णन | स्वायम्भुव मनु के कथानुसार का धर्म का स्वरूप | पाप से शुद्धि के लिए प्रायश्चित | अभक्ष्य वस्तुओं का वर्णन | दान के अधिकारी एवं अनधिकारी का विवेचन | व्यासजी और श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर का नगर में प्रवेश | नगर प्रवेश के समय पुरवासियों एवं ब्राह्मणों द्वारा राजा युधिष्ठिर का सत्कार | चार्वाक का ब्राह्मणों द्वारा वध | चार्वाक को प्राप्त हुए वर आदि का श्रीकृष्ण द्वारा वर्णन | युधिष्ठिर का राज्याभिषेक | युधिष्ठिर का धृतराष्ट्र के अधीन रहकर राज्य व्यवस्था के लिए अपने का भाइयों को नियुक्त करना | युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र का युद्ध में मारे गये सगे-संबंधियों का श्राद्धकर्म करना | युधिष्ठिर द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति | युधिष्ठिर द्वारा दिये हुए भवनों में सभी भाइयों का प्रवेश और विश्राम | युधिष्ठिर द्वारा ब्राह्मणों एवं आश्रितों का सत्कार | युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण का संवाद | श्रीकृष्ण द्वारा भीष्म की प्रशंसा तथा युधिष्ठिर को उनके पास चलने का आदेश | भीष्म द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति-भीष्मस्तवराज | परशुराम द्वारा होने वाले क्षत्रिय संहार के विषय में युधिष्ठिर का प्रश्न | परशुराम के उपाख्यान क्षत्रियों का विनाश तथा पुन: उत्पन्न होने की कथा | श्रीकृष्ण द्वारा भीष्म के गुण-प्रभाव का वर्णन | श्रीकृष्ण का भीष्म की प्रशंसा करते हुए उन्हें युधिष्ठिर को धर्मोपदेश देने का आदेश देना | भीष्म द्वारा अपनी असर्मथता प्रकट करने पर भगवान श्रीकृष्ण का उन्हें वर देना | पाण्डवों व ऋषियों का भीष्म से विदा लेना | श्रीकृष्ण की प्रातश्चर्या | सात्यकि द्वारा कृष्ण का संदेश पाकर युधिष्ठिर का भाइयों सहित कुरुक्षेत्र में आना | श्रीकृष्ण और भीष्म की बातचीत | भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को गुण-कथनपूर्वक प्रश्न करने का आदेश देना | भीष्म के आश्वासन पर युधिष्ठिर का उनके समीप जाना | युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म द्वारा राजधर्म का वर्णन | राजा के लिए पुरुषार्थ, सत्य, ब्राह्मणों की अदण्डनीयता | राजा की परिहासशीलता तथा मृदुता में प्रकट होने वाले दोष | राजा द्वारा धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्ताव का वर्णन | भीष्म द्वारा राज्यरक्षा का वर्णन | युधिष्ठिर का 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राजधर्म का साररूप में वर्णन | दण्ड के स्वरूप, नाम, लक्षण और प्रयोग का वर्णन | दण्ड की उत्पत्ति का वर्णन | दण्ड का क्षत्रियों कें हाथ में आने की परम्परा का वर्णन | त्रिवर्ग के विचार का वर्णन | पाप के कारण राजा के पुनरुत्थान के विषय में आंगरिष्ठ और कामन्दक का संवाद | इन्द्र और प्रह्लाद की कथा | शील का प्रभाव, अभाव में धर्म, सत्य, सदाचार और लक्ष्मी के न रहने का वर्णन | सुमित्र और ऋषभ ऋषि की कथा | राजा सुमित्र का मृग की खोज में तपस्वी मुनियों के आश्रम पर पहुँचना | सुमित्र का मुनियों से आशा के विषय में प्रश्न करना | ऋषभ का सुमित्र को वीरद्युम्न व तनु मुनि का वृतान्त सुनाना | तनु मुनि का वीरद्युम्न को आशा के स्वरूप का परिचय देना | ऋषभ के उपदेश से सुमित्र का आशा को त्याग देना | यम और गौतम का संवाद | आपत्ति के समय राजा का धर्म

आपद्धर्म पर्व

आपत्तिग्रस्त राजा के कर्त्तव्य का वर्णन | ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओं के धर्म का वर्णन | धर्म की गति को सूक्ष्म बताना | राजा के लिए कोश संग्रह की आवश्यकता | मर्यादा की स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्ति की निन्दा | बल की महत्ता और पाप से छूटने का प्रायश्रित्त | मर्यादा का पालन करने वाले कायव्य दस्यु की सद्गति का वर्णन | राजा के द्वारा किसका धन लेने व न लेने तथा कैसे बर्ताव करे इसके विचार का वर्णन | शत्रुओं से घिरे राजा के कृर्त्तव्य का वर्णन | राजा के कृर्त्तव्य के विषय में बिडाल व चूहे का आख्यान | शत्रु से सावधान रहने के विषय में राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़िया का संवाद | भारद्वाज कणिक का सौराष्ट्रदेश के राजा को कूटनीति का उपदेश | विश्वामित्र और चाण्डाल का संवाद | आपत्काल में धर्म का निश्चय | उत्तम ब्राह्मणों के सेवन का आदेश | बहेलिये और कपोत-कपोती का प्रसंग | कबूतर द्वारा अपनी भार्या का गुणगान व पतिव्रता स्त्री की प्रशंसा | कबूतरी का कबूतर से शरणागत व्याध की सेवा के लिए प्रार्थना | कबूतर द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीर का बहेलिये के लिए परित्याग | बहेलिये का वैराग्य | कबूतरी का विलाप और अग्नि में प्रवेश कर उन दोनों को स्‍वर्गलोक की प्राप्ति | बहेलिये को स्‍वर्गलोक की प्राप्ति | इन्द्रोत मुनि का जनमेजय को फटकारना | जनमेजय का इन्द्रोत मुनि की शरण में जाना | इन्द्रोत का जनमेजय को शरण देना | इन्द्रोत का जनमेजय को धर्मोपदेश देना | ब्राह्मण बालक के जीवित होने की कथा | नारद जी का सेमल वृक्ष से प्रश्न | नारद जी का सेमल को उसका अहंकार देखकर फटकारना | वायु का सेमल को धमकाना और सेमल का विचारमग्न होना | सेमल का हार स्वीकार कर बलवान के साथ वैर न करने का उपदेश | समस्त अनर्थो का कारण लोभ को बताकर उसने होने वाले पापों का वर्णन | श्रेष्ठ महापुरुषों के लक्षण | अज्ञान और लोभ को ही समस्त दोषों का कारण सिद्ध करना | मन और इंद्रियों के संयम रूप दम का माहात्म्य | तप की महिमा | सत्य के लक्षण, स्वरूप और महिमा का वर्णन | काम, क्रोध आदि दोषों का निरूपण व नाश का उपाय | नृशंस अर्थात अत्यन्त नीच पुरुष के लक्षण | नाना प्रकार के पापों और प्रायश्रितों का वर्णन | खड्ग की उत्पत्ति और प्राप्ति व महिमा का वर्णन | धर्म, अर्थ और काम के विषय में विदुर व पाण्डवों के पृथक-पृथक विचार | अन्त में युधिष्ठिर का निर्णय | मित्र बनाने व न बनाने योग्य पुरुषों के लक्षण | कृतघ्न गौतम की कथा का आरम्भ | गौतम का समुद्र की ओर प्रस्थान व बकपक्षी के घर पर अतिथि होना | गौतम का आतिथ्यसत्कार व विरूपाक्ष के भवन में प्रवेश | गौतम का राक्षसराज के यहाँ से सुर्वणराशि लेकर लौटना | गौतम का अपने मित्र बक के वध का विचार मन में लाना | कृतघ्न गौतम द्वारा राजधर्मा का वध | राक्षसों द्वार कृतघ्न की हत्या व उसके माँस को अभक्ष्य बताना | राजधर्मा और गौतम का पुन: जीवित होना

मोक्षधर्म पर्व

शोकाकुल चित्त की शांति के लिए सेनजित और ब्राह्मण संवाद | पिता के प्रति पुत्रद्वारा ज्ञान का उपदेश | त्याग की महिमा के विषय में शम्पाक का उपदेश | धन की तृष्णा से दु:ख का वर्णन | धन के त्याग से परम सुख की प्राप्ति | जनक की उक्ति तथा राजा नहुष के प्रश्नों के उत्तर मे बोध्यगीता | प्रह्लाद और अवधूत का संवाद | आजगर वृत्ति की प्रशंसा का वर्णन | काश्यप ब्राह्मण और इन्द्र का संवाद | शुभाशुभ कर्मों के परिणाम कर्ता को भोगने का प्रतिपादन | भरद्वाज और भृगु के संवाद में जगत की उत्पत्ति का वर्णन | आकाश से अन्य चार स्थूल भूतों की उत्पत्ति का वर्णन | पंचमहाभूतों के गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन | शरीर के भीतर जठरानल आदि वायुओं की स्थिति का वर्णन | जीव की सत्ता पर अनेक युक्तियों से शंका उपस्थित करना | जीव की सत्ता तथा नित्यता को युक्तियों से सिद्ध करना | मनुष्यों की और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन | कर्मो का और सदाचार का वर्णन | वैराग्य से परब्रह्मा की प्राप्ति | सत्य की महिमा, असत्य के दोष व लोक और परलोक के सुख-दु:ख का विवेचन | ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमों के धर्म का वर्णन | वानप्रस्थ और संन्यास धर्मों का वर्णन | हिमालय के उत्तर में स्थित लोक की विलक्षणता व महत्ता का प्रतिपादन | भृगु और भरद्वाज के संवाद का उपसंहार | शिष्टाचार का फलसहित वर्णन | पाप को छिपाने से हानि और धर्म की प्रशंसा | अध्यात्मज्ञान का निरूपण | ध्यानयोग का वर्णन | जपयज्ञ के विषय में युधिष्ठिर का प्रश्न | जप और ध्यान की महिमा और उसका फल | जापक में दोष आने के कारण उसे नरक की प्राप्ति | जापक के लिए देवलोक भी नरक तुल्य इसके प्रतिपादन का वर्णन | जापक को सावित्री का वरदान | धर्म, यम और काल का आगमन | राजा इक्ष्वाकु और ब्राह्मण का संवाद | सत्य की महिमा तथा जापक की गति का वर्णन | ब्राह्मण और इक्ष्वाकु की उत्तम गति का वर्णन | जापक को मिलने वाले फल की उत्कृष्टता | मनु द्वारा कामनाओं के त्याग एवं ज्ञान की प्रशंसा | परमात्मतत्त्व का निरूपण | आत्मतत्त्व और बुद्धि आदि पदार्थों का विवेचन | साक्षात्कार का उपाय | शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धि से आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन | आत्मा व परमात्मा के साक्षात्कार का उपाय तथा महत्त्व | परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | मनु बृहस्पति संवाद की समाप्ति | श्री कृष्ण से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति | श्री कृष्ण की महिमा का कथन | ब्रह्मा के पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियों के वंश का वर्णन | प्रत्येक दिशा में निवास करने वाले महर्षियों का वर्णन | विष्णु का वराहरूप में प्रकट हो देवताओं की रक्षा और दानवों का विनाश | नारद को अनुस्मृतिस्तोत्र का उपदेश | नारद द्वारा भगवान की स्तुति | श्री कृष्ण सम्बन्धी अध्यात्मतत्तव का वर्णन | संसारचक्र और जीवात्मा की स्थिति का वर्णन | निषिद्ध आचरण के त्याग आदि के परिणाम तथा सत्त्वगुण के सेवन का उपदेश | जीवोत्पत्ति के दोष और बंधनों से मुक्त तथा विषय शक्ति के त्याग का उपदेश | ब्रह्मचर्य तथा वैराग्य से मुक्ति | आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्म की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने के उपदेश | स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्था में मन की स्थिति का वर्णन | गुणातीत ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | सच्चिदान्नदघन परमात्मा, दश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष उन चारों के ज्ञान से मुक्ति का वर्णन | परमात्मा प्राप्ति के अन्य साधनों का वर्णन | राजा जनक के दरबार में पञ्चशिख का आगमन | नास्तिक मतों के निराकरणपूर्वक शरीर से भिन्न आत्मा की नित्य सत्ता का प्रतिपादन | पञ्चशिख के द्वारा मोक्षतत्त्व के विवेचन का वर्णन | विष्णु द्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेव की परीक्षा और उनके के लिए वर प्रदान | श्वेतकेतु और सुवर्चला का विवाह | पति-पत्नी का अध्यात्मविषयक संवाद | दम की महिमा का वर्णन | व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथि सेवा का विवेचन | सनत्कुमार का ऋषियों को भगवत्स्वरूप का उपदेश | इंद्र और प्रह्लाद का संवाद | इन्द्र के आक्षेप युक्त वचनों का बलि के द्वारा कठोर प्रत्युत्तर | बलि और इन्द्र का संवाद | बलि द्वारा इन्द्र को फटकारना | इन्द्र और लक्ष्मी का संवाद | बलि को त्यागकर आयी हुई लक्ष्मी की इन्द्र के द्वारा प्रतिष्ठा | इन्द्र और नमुचि का संवाद | काल और प्रारब्ध की महिमा का वर्णन | लक्ष्मी का दैत्यों को त्यागकर इन्द्र के पास आना | सद्गुणों पर लक्ष्मी का आना व दुर्गुणों पर त्यागकर जाने का वर्णन | जैगीषव्य का असित-देवल को समत्वबुद्धि का उपदेश | श्रीकृष्ण और उग्रसेन का संवाद | शुकदेव के प्रश्नों के उत्तर में व्यास जी द्वारा काल का स्वरूप बताना | व्यास जी का शुकदेव को सृष्टि के उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मों का उपदेश | ब्राह्मप्रलय एंव महाप्रलय का वर्णन | ब्राह्मणों का कर्तव्य और उन्हें दान देने की महिमा का वर्णन | ब्राह्मण के कर्तव्य का प्रतिपादन करते हुए कालरूप नद को पार करने का उपाय | ध्यान के सहायक योग | फल और सात प्रकार की धारणाओं का वर्णन | मोक्ष की प्राप्ति | सृष्टि के समस्त कार्यों में बुद्धि की प्रधानता | प्राणियों की श्रेष्ठता के तारतम्य का वर्णन | नाना प्रकार के भूतों की समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्व का विवेचन | युगधर्म का वर्णन एवं काल का महत्त्व | ज्ञान का साधन और उसकी महिमा | योग से परमात्मा की प्राप्ति का वर्णन | कर्म और ज्ञान का अन्तर | ब्रह्मप्राप्ति के उपाय का वर्णन | ब्रह्मचर्य-आश्रम का वर्णन | गार्हस्थ्य-धर्म का वर्णन | वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रम के धर्म और महिमा का वर्णन | संन्यासी के आचरण | ज्ञानवान संन्यासी का प्रशंसा | परमात्मा की श्रेष्ठता व दर्शन का उपाय | ज्ञानमय उपदेश के पात्र का निर्णय | महाभूतादि तत्त्वों का विवेचन | बुद्धि की श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक | ज्ञान के साधन व ज्ञानी के लक्षण और महिमा | परमात्मा की प्राप्ति का साधन | ज्ञान से ब्रह्म की प्राप्ति | ब्रह्मवेत्ता के लक्षण व परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | शरीर में पंचभूतों के कार्य व गुणों की पहचान | जीवात्मा और परमात्मा का योग द्वारा साक्षात्कार | कामरूपी अद्भुत वृक्ष व शरीर रूपी नगर का वर्णन | मन और बुद्धि के गुणों का विस्तृत वर्णन | युधिष्ठिर का मृत्युविषयक प्रश्न व ब्रह्मा की रोषाग्नि से प्रजा के दग्ध होने का वर्णन | ब्रह्मा के द्वारा रोषाग्नि का उपसंहार व मृत्यु की उत्पत्ति | मृत्यु की तपस्या व प्रजापति की आज्ञा से मृत्यु का प्राणियों के संहार का कार्य स्वीकार करना | धर्माधर्म के स्वरूप का निर्णय | युधिष्ठिर का धर्म की प्रमाणिकता पर संदेह उपस्थित करना | जाजलि की घोर तपस्या व जटाओं में पक्षियों का घोंसला बनाने से उनका अभिमान | आकाशवाणी की प्रेरणा से जाजलि का तुलाधार वैश्य के पास जाना | जाजलि और तुलाधार का धर्म के विषय में संवाद | जाजलि को तुलाधार का आत्मयज्ञविषयक धर्म का उपदेश | जाजलि को पक्षियों का उपदेश | राजा विचख्नु के द्बारा अहिंसा-धर्म की प्रशंसा | महर्षि गौतम और चिरकारी का उपाख्यान | दीर्घकाल तक सोच-विचारकर कार्य करने की प्रशंसा | द्युमत्सेन और सत्यवान का संवाद | अहिंसापूर्वक राज्यशासन की श्रेष्ठता का कथन | स्यूमरश्मि और कपिल का संवाद | प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्ग के विषय में स्यूमरश्मि व कपिल संवाद | चारों आश्रमों में उत्तम साधनों के द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति का कथन | ब्रह्मण और कुण्डधार मेघ की कथा | यज्ञ में हिंसा की निंदा और अहिंसा की प्रशंसा | धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्ष के विषय में युधिष्ठिर के प्रश्न | मोक्ष के साधन का वर्णन | नारद और असितदेवल का संवाद | तृष्णा के परित्याग के विषय में माण्डव्य मुनि और जनक का संवाद | पिता और पुत्र का संवाद | हारित मुनि के द्वारा आचरण व धर्मों का वर्णन | ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय | ब्रह्म की प्राप्ति के विषय में वृत्र और शुक्र का संवाद | वृत्रासुर को सनत्कुमार का आध्यात्मविषयक उपदेश | भीष्म द्वारा युधिष्ठिर की शंका निवारण | इन्द्र और वृत्रासुर के युद्ध का वर्णन | वृत्रासुर के वध से प्रकट हुई ब्रह्महत्या का ब्रह्मा जी के द्वारा चार स्थानों में विभाजन | शिवजी के द्वारा दक्ष के यज्ञ का भंग | शिवजी के क्रोध से ज्वर की उत्पत्ति व उसके विविध रूप | पार्वती के रोष के निवारण के लिए शिव द्वारा दक्ष-यज्ञ का विध्वंस | महादेव जी का दक्ष को वरदान | स्तोत्र की महिमा | अध्यात्म ज्ञान और उसके फल का वर्णन | समंग द्वारा नारद जी से अपनी शोकहीन स्थिति का वर्णन | नारद जी द्वारा गालव मुनि को श्रेय का उपदेश | अरिष्टनेमि का राजा सगर को मोक्षविषयक उपदेश | उशना का चरित्र | उशना को शुक्र नाम की प्राप्ति | पराशर मुनि का राजा जनक को कल्याण की प्राप्ति के साधन का उपदेश | कर्मफल की अनिवार्यता | कर्मफल से लाभ | धर्मोपार्जित धन की श्रेष्ठता, व अतिथि-सत्कार का महत्त्व | गुरुजनों की सेवा से लाभ | सत्संग की महिमा व धर्मपालन का महत्त्व | ब्राह्मण और शूद्र की जीविका | मनुष्यों में आसुरभाव की उत्पत्ति व शिव के द्वारा उसका निवारण | विषयासक्त मनुष्य का पतन | तपोबल की श्रेष्ठता व दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालन का आदेश | वर्ण विशेष की उत्पत्ति का रहस्य | हिंसारहित धर्म का वर्णन | धर्म व कर्तव्यों का उपदेश | राजा जनक के विविध प्रश्नों का उत्तर | ब्रह्मा को साध्यगणों को उपदेश | योगमार्ग के स्वरूप, साधन, फल और प्रभाव का वर्णन | सांख्ययोग के अनुसार साधन का वर्णन | सांख्ययोग के फल का वर्णन | वसिष्ठ और करालजनक का संवाद | प्रकृति-संसर्ग के कारण जीव का बारंबार जन्म ग्रहण करना | प्रकृति के संसर्ग दोष से जीव का पतन | क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुष के विषय में राजा जनक की शंका | योग और सांख्य के स्वरूप का वर्णन तथा आत्मज्ञान से मुक्ति | विद्या-अविद्या व पुरुष के स्वरूप के उद्गार का वर्णन | वसिष्ठ व जनक संवाद का उपसंहार | जनकवंशी वसुमान को मुनि का धर्मविषयक उपदेश | याज्ञवल्क्य का जनक को उपदेश | इन्द्रियों में मन की प्रधानता का प्रतिदान | संहार क्रम का वर्णन | अध्यात्म व अधिभूत वर्णन तथा राजस और तामस के भावों के लक्षण | राजा जनक के प्रश्न | प्रकृति पुरुष का विवेक और उसका फल | योग का वर्णन व उससे परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति | मृत्यु सूचक लक्षण व मृत्यु को जीतने का उपाय | याज्ञयवल्क्य द्वारा सूर्य से वेदज्ञान की प्राप्ति का प्रसंग सुनाना | विश्वावसु को जीवात्मा और परमात्मा की एकता के ज्ञान का उपदेश देना | याज्ञवल्क्य का जनक को उपदेश देकर विदा होना | पञ्चशिख और जनक का संवाद | सुलभा का राजा जनक के शरीर में प्रवेश करना | राजा जनक का सुलभा पर दोषारोपण करना | सुलभा का राजा जनक को अज्ञानी बताना | व्यास जी का शुकदेव को धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना | शुभाशुभ कर्मों के परिणाम का वर्णन | शंकर द्वारा व्यास को पुत्रप्राप्ति के लिये वरदान देना | शुकदेव की उत्पति तथा संस्कार का वृतान्त | पिता की आज्ञा से शुकदेव का मिथिला में जाना | शुकदेव का ध्यान में स्थित होना | राजा जनक द्वारा शुकदेव जी का पूजन तथा उनके प्रश्न का समाधान | जनक द्वारा बह्मचर्याश्रम में परमात्मा की प्राप्ति | शुकदेव द्वारा मुक्त पुरुष के लक्षणों का वर्णन | शुकदेव का पिता के पास लौट आना


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