त्रित मुनि का अपने भाइयों का शाप देना

महाभारत शल्य पर्व में गदा पर्व के अंतर्गत 36वें अध्याय में संजय ने त्रित मुनि द्वारा अपने भाइयों का शाप देनाने का वर्णन किया है, जो इस प्रकार है[1]-

त्रित मुनि का शाप

नरेश्वर! मुनि के मांगे हुए वर के विषय में ‘तथास्तु’ कह कर सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। फिर त्रित भी प्रसन्नतापूर्वक अपने घर को ही लौट गये। उन महातपस्वी ने कुपित हो अपने उन दोनों ऋषि भाइयों के पास पहुँच कर कठोर वाणी में शाप देते हुए कहा- ‘तुम दोनों पशुओं के लोभ में फंसकर मुझे छोड़कर भाग आये। इसलिये इसी पाप कर्म के कारण मेरे शाप से तुम दोनों भाई महाभयंकर भेड़िये का शरीर धारण करके दांढ़ों से युक्त हो इधर-उधर भटकते फिरोगे। तुम दोनों की संतान के रूप में गोलांगूल, रीछ और वानर आदि पशुओं की उत्पत्ति होगी’।

प्रजानाथ! उनके इतना कहते ही वे दोनों भाई उस सत्यवादी के वचन से उसी क्षण भेड़िये की शकल में दिखायी देने लगे। अमित पराक्रमी बलराम जी ने उस तीर्थ में भी जल का स्पर्श किया और ब्राह्मणों की पूजा करके उन्हें नाना प्रकार के धन प्रदान किये। उदार चित्त वाले बलराम जी सरस्वती नदी के अन्तर्गत उदपान तीर्थ का दर्शन करके उसकी बारंबार स्तुति-प्रशंसा करते हुए वहाँ से विनशन तीर्थ में चले गये।


टीका टिप्पणी व संदर्भ

  1. महाभारत शल्य पर्व अध्याय 36 श्लोक 40-55

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महाभारत शल्य पर्व में उल्लेखित कथाएँ


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