चैतन्य चरितावली -प्रभुदत्त ब्रह्मचारी पृ. 538

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श्री श्रीचैतन्य-चरितावली -प्रभुदत्त ब्रह्मचारी

103. राजा रामानन्‍द राय


वाञ्छा सज्‍जनसंगमे परतुणे प्रीतिर्गुरौ नम्रता
विद्यायां व्‍यसनं स्‍वयोषिति रतिर्लोकापवादाद्भयम्।
भक्ति: शूलिनि शक्तिरात्‍मदमने संसर्गमुक्ति: खले-
ष्‍वेते येषु वसन्ति निर्मलगुणास्‍तेभ्‍यो नरेभ्‍यो नम।।[1]

यौवन, धन, सम्‍पत्ति और प्रभुत्‍व-इन चारों का नीतिकारों ने अविवेक के संसर्ग से नाश का हेतु बताया है। सचमुच इन चारों का पाकर मनुष्‍य पागल-सा हो जाता है। धन-मद, जन-मद, तप-मद, विद्या-मद, अधिकार-मद और यौवन-मद आदि अनेक प्रकार के मदों में अधिकार-मद और धन-मद ये ही दो सर्वश्रेष्‍ठ मद माने गये हैं। जो अधिकार पाकर प्रमाद नहीं करता और धन पाकर जिसे अभिमान नहीं होता, वह साधारण मनुष्‍य नहीं है। वह तो कोई अलौकिक महापुरुष ही है। ऐसे महापुरुष की चरणवन्‍दना करने से अक्षय सुख की प्राप्ति हो सकती है। महाभागवत राय रामानन्‍द जी ऐसे ही वन्‍दनीय महानुभावों में से थे। राय रामानन्‍द जी के पिता का नाम राजा भवानन्‍द जी था।

राजा भवानन्‍द जी जगन्‍नाथपुरी से तीन कोस दूर अलालनाथ के समीप रहते थे। वे जाति के करणवंशी कायस्‍थ थे। इनके राय रामानन्‍द, गोपीनाथ पट्टनायक, कलानिधि, सुधानिधि और वाणीनाथ नामक-ये पाँच पुत्र थे। ये उड़ीसा के महाराज प्रताप रुद्र के राजदरबार में एक प्रधान कर्मचारी थे। इनके तीन लड़के भी महाराज के दरबार में ही ऊंचे-ऊंचे अधिकारों पर आसीन होकर राज-काज करते थे। गोपीनाथ कटक-दरबार की ओर से मालजेठा-प्रदेश के शासक थे। वाणीनाथ दरबार में ही किसी उच्‍च पद पर प्रतिष्ठित थे और राय रामानन्‍द उत्‍कल देश के अन्‍तगर्त विद्यानगर राज्‍य के शासक थे।

इस बात को हम पहले ही बता चुके हैं कि उस समय भारतवर्ष में छोटे-छोटे सैकड़ों स्‍वतन्‍त्र राज्‍य थे। उस अपने छोटे-से प्रदेश के शासक नृपतिगण सनातन-परिपाटी के अनुसार धर्म को प्रधान मानकर प्रजा का पालन करते थे और क्षत्रिय-धर्म के अनुसार युद्ध भी करते थे।

तैलंग देश में भी बहुत से छोटे छोटे राज्‍य थे। उनमें से ‘कोटदेश’ नामका एक छोटा-सा राज्‍य था, जिसकी राजधानी विद्यानगर थी। वर्तमान समय में गोदावरी के उत्तर तटपर स्थित राजमहेन्‍द्री को ही उस प्रदेश की प्रधान नगरी समझना चाहिये, किन्‍तु पुराना विद्यानगर तो गोदावरी के दक्षिण तीर पर अवस्थित था और वह वर्तमान राजमहेन्‍द्री से दस-बारह कोस की दूरी पर था। बहुत-से लोग विजयनगर को ही विद्यानगर समझते हैं, किन्‍तु नामके साम्‍य होने के केवल भ्रम ही है। इसे तो पाठक पहले ही पढ़ चुके हैं कि उत्‍कल-देश के तत्‍कालीन महाराज पुरुषोत्तमदेव ने विद्यानगर के राजा को युद्ध में परास्‍त करके उसने देश को अपने राज्‍य में मिला लिया था। रामानन्‍द राय उत्‍कल-राज्‍य की ही ओर से उस राज्‍य के शासक होकर वहाँ रहते थे। महाराज की ही ओर से उन्‍हें ’राजा’ और ‘राय’ की उपाधियाँ मिली हुई थीं।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सज्‍जनों के संसर्ग की हृदय में निरन्‍तर इच्‍छा, दूसरों के गुणों में अनुराग होना, अपने श्रेष्‍ठ और बड़े पुरुषों के सम्‍मुख नम्रता, विद्या में व्‍यसन, अपनी ही स्‍त्री में प्रीति का होना, लोकनिन्‍दा से सदा सचेष्‍ट होकर भयभीत बने रहना, देवों के भी देव महादेव के चरणों में भक्ति होना, अपने अन्‍त: करण को दमन करने की शक्ति होना और दुष्‍टों के संसर्ग से सदा दूर ही बने रहना- ये निर्मलगुण जिन महापुरुषों में विद्यमान हैं। उन्‍हें हमारा प्रणाम हैं। श्रीभर्तृ. श. नी. 62

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चैतन्य चरितावली
क्रम संख्या विषय पृष्ठ संख्या
1. मंगलाचरण 12
2. इष्ट-प्रार्थना 13
3. गुरू-वन्दना 15
4. भक्त-वन्दना 17
5. व्यासोपदेश 21
6. चैतन्य-कालीन भारत 26
7. चैतन्य-कालीन बंगाल 30
8. वंश-परिचय 36
9. प्रादुर्भाव 38
10. निमाई 42
11. प्रेम-प्रवाह 46
12. अलौकिक बालक 50
13. बाल्य-भाव 53
14. बाल-लीला 56
15. चांचल्य 60
16. अद्वैताचार्य और उनकी पाठशाला 67
17. विश्वरूप का वैराग्य 72
18. विश्वरूप का गृह-त्याग 77
19. निमाई का अध्ययन के लिये आग्रह 82
20. व्रतबन्ध 87
21. पिता का परलोकगमन 90
22. विद्याव्यासंगी निमाई 92
23. विवाह 99
24. चंचल पण्डित 103
25. नवद्वीप में ईश्वरपुरी 107
26. पूर्व बंगाल की यात्रा 111
27. पत्नी-वियोग और प्रत्यागमन 117
28. नवद्वीप में दिग्विजयी पण्डित 120
29. दिग्विजयी का पराभव 123
30. दिग्विजयी का वैराग्य 131
31. सर्वप्रिय निमाई 137
32. श्रीविष्णुप्रिया-परिणय 142
33. प्रकृति-परिवर्तन 148
34. भक्तिस्त्रोत उमड़ने से पहले 153
35. श्रीगयाधाम की यात्रा 157
36. प्रेम-स्त्रोत उमड़ पड़ा 163
37. नदिया में प्रत्यागमन 167
38. वही प्रेमोन्माद 172
39. सर्वप्रथम संकीर्तन और अध्यापकी का अन्त 178
40. कृपा की प्रथम किरण 184
41. भक्त-भाव 189
42. अद्वैताचार्य और उनका सन्देह 194
43. श्रीवास के घर संकीर्तनारम्भ 198
44. धीर-भाव 205
45. श्रीनृसिंहावेश 210
46. श्रीवाराहावेश 213
47. निमाई के भाई निताई 216
48. स्नेहाकर्षण 222
49. व्यासपूजा 228
50. अद्वैताचार्य के ऊपर कृपा 234
51. अद्वैताचार्य को श्यामसुन्दररूप के दर्शन 239
52. प्रच्छन्न भक्त पुण्डरीक विद्यानिधि 246
53. निमाई और निताई की प्रेम-लीला 252
54. द्विविध-भाव 256
55. भक्त हरिदास 259
56. हरिदास की नाम-निष्ठा 263
57. हरिदासजी द्वारा नाम-माहात्म्य 270
58. सप्तप्रहरिया भाव 276
59. भक्तों को भगवान के दर्शन 282
60. भगवद्भाव की समाप्ति 288
61. प्रेमोन्‍मत्त अवधूत का पादोदकपान 292
62. घर-घर में हरिनाम का प्रचार 296
63. जगाई-मधाई की क्रूरता नित्यानन्द की उनके उद्धार निमित्त प्रार्थना 301
64. जगाई-मधाई का उद्धार 308
65. जगाई और मधाई की प्रपन्‍नता 316
66. जगाई-मधाई का पश्‍चात्ताप 321
67. सज्‍जन-भाव 325
68. श्रीकृष्‍ण–लीलाभिनय 329
69. भक्‍तों के साथ प्रेम-रसास्‍वादन 339
70. भगवत-भजन में बाधक भाव 348
71. नदिया में प्रेम-प्रवाह और काजी का अत्‍याचार 355
72. काजी की शरणागति 360
73. भक्तों की लीलाएँ 372
74. नवानुराग और गोपी-भाव 381
75. संन्यास से पूर्व 386
76. भक्तवृन्द और गौरहरि 392
77. शचीमाता और गौरहरि 398
78. विष्‍णुप्रिया और गौरहरि 402
79. परम सहृदय निमाई की निर्दयता 406
80. हाहाकार 412
81. गौरहरि का संन्यास के लिये आग्रह 414
82. संन्यास-दीक्षा 420
83. श्री‍कृष्‍ण-चैतन्य 429
84. राढ़-देश में उन्मत्त-भ्रमण 433
85. शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर 439
86. माताको संन्यासी पुत्र के दर्शन 447
87. शचीमाता का संन्यासी पुत्र के प्रति मातृ-स्नेह 453
88. पुरी-गमन के पूर्व 456
89. पुरी के पथ में 460
90. महाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग 466
91. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर 473
92. श्रीसाक्षिगोपाल 482
89. पुरी 456
93. श्रीभुवनेश्‍वर महादेव 490
94. श्रीजगन्‍नाथ जी के दर्शन से मूर्छा 496
95. आचार्य वासुदेव सार्वभौम 500
96. सार्वभौम और गोपीनाथाचार्य 505
97. सार्वभौम भक्‍त बन गये 510
98. सार्वभौम का भगवत-प्रसाद में विश्‍वास 516
99. सार्वभौम का भक्तिभाव 519
100. दक्षिण यात्रा का विचार 523
101. दक्षिण यात्रा के प्रस्‍थान 528
102. वासुदेव कु‍ष्‍ठीका उद्धार 532
103. राजा रामानन्‍द राय 538
104. राय रामानन्‍द द्वारा साध्‍य तत्‍व प्रकाश 542
105. राय रामानन्‍द से साधन-सम्‍बन्‍धी प्रश्‍न 549
106. दक्षिण के तीर्थों का भ्रमण 554
107. धनी तीर्थराम को प्रेम और वेश्याओं का उद्धार 557
108. दक्षिण के तीर्थों का भ्रमण (2) 561
109. दक्षिण के शेष तीर्थों में भ्रमण 564
110. नौरो जी डाकू का उद्धार 569
111. नीलाचल में प्रभु का प्रत्‍यागमन 572
112. रेम रस लोलुप भ्रमर भक्‍तों का आगमन 574
113. महाराज प्रतापरुद्र को प्रभु दर्शन के लिये आतुरता 584
114. गौर भक्‍तों का पुरी में अपूर्व सम्मिलन 588
115. भक्‍तों के साथ महाप्रभु की भेंट 592
116. राजपुत्र को प्रेम दान 596
117. गुण्टिचा (उद्यान मन्दिर) मार्जन 600
118. श्री जगन्‍नाथ जी की रथ यात्रा 605
119. महाराज प्रतापरुद्र को प्रेमदान 614
120. पुरी में भक्‍तों के साथ आनन्‍द विहार 617
121. भक्‍तों की विदाई 621
122. सार्वभौमके घर भिक्षा और अमोघ-उद्धार 625
123. नित्यानन्द जी का गोड़-देश में भगवन्नाम-वितरण 628
124. नित्यानन्द जी का गृहस्थाश्रम में प्रवेश 631
125. प्रकाशानन्द जी के साथ पत्र-व्यवहार 635
126. पुरी में गौड़ीय भक्तों का पुनरागमन 641
127. प्रभु के वृन्दावन जाने से भक्तों को विरह 644
128. जननी के दर्शन 648
129. विष्णुप्रिया जी को संन्यासी स्वामी के दर्शन 653
130. वृन्दावन के पथ में 658
131. श्री रूप और सनातन 662
132. रघुनाथदास जी को प्रभु के दर्शन 666
133. पुरी में प्रत्यागमन और वृन्दावन की पुनः यात्रा 671
134. श्री वृन्दावन आदि तीर्थों के दर्शन 676
135. पठानों को प्रेम-दान और प्रयाग में प्रत्यागमन 680
136. श्री रूप को प्रयाग में महाप्रभु के दर्शन 684
137. महाप्रभु वल्लभाचार्य 689
138. महाप्रभु वल्लभाचार्य और महाप्रभु गौरांगदेव 695
139. रूप की विदाई और प्रभु का काशी-आगमन 699
140. श्री सनातन की कारागृह से मुक्ति और काशी में प्रभु-दर्शन 707
141. श्री सनातन का अद्भुत वैराग्य 712
142. श्री सनातन को शास्त्रीय शिक्षा 716
143. स्‍वामी प्रकाशानन्‍द जी मन से भक्‍त बने 724
144. श्री प्रकाशानन्द जी का आत्मसमर्पण 736
145. श्री सनातन वृन्दावन को और प्रभु पुरी को 742
146. प्रभु का पुरी में भक्तों से पुनर्मिलन 745
147. नीलाचल में सनातन जी 753
148. श्री रघुनाथदास जी का गृह त्‍याग 760
149. घुनाथदास जी का उत्‍कट वैराग्‍य 770
150. छोटे हरिदास को स्‍त्री-दर्शन का दण्‍ड 779
151. धन मांगने वाले भृत्‍य को दण्‍ड 785
152. गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे 788
153. श्री शिवानन्द सेन की सहनशीलता 796
154. पुरीदास या कवि कर्णपूर 799
155. महाप्रभु की अलौकिक क्षमा 803
156. निन्दक के प्रति भी सम्मान के भाव 806
157. महात्मा हरिदास जी का गोलोकगमन 812
158. भक्त कालिदास पर प्रभु की परम कृपा 819
159. जगदानन्द जी के साथ प्रेम-कलह 823
160. जगदानन्द जी की एकनिष्ठा 829
161. श्री रघुनाथ भट्ट को प्रभु की आज्ञा 837
162. गम्‍भीरा-मन्दिर में श्री गौरांग 841
163. प्रेम की अवस्‍थाओं का संक्षिप्‍त परिचय 848
164. महाप्रभु का दिव्‍योन्‍माद 863
165. गोवर्धन के भ्रम से चटकगिरि की ओर गमन 867
166. श्री कृष्‍णान्‍वेषण 869
167. उन्‍मादावस्‍था की अदभुत आकृति 874
168. लोकातीत दिव्‍योन्‍माद 880
169. शारदीय निशीथ में दिव्‍य गन्‍ध का अनुसरण 883
170. श्री अद्वैताचार्य जी की पहेली 886
171. समुद्रपतन और मृत्‍युदशा 889
172. महाप्रभु का अदर्शन अथवा लीलासंवरण 894
173. श्रीमती विष्‍णुप्रिया देवी 901
174. श्री श्री निवासाचार्य जी 910
175. ठाकुर नरोत्‍तमदास जी 917
176. महाप्रभु के वृन्‍दावनस्‍थ छ: गोस्‍वामिगण 920
177. श्री चैतन्‍य–शिक्षाष्‍टक 931
178. अंतिम पृष्ठ 938

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