गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 346

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

अष्टम: सर्ग:
विलक्ष्यलक्ष्मीपति:

सप्तदश: सन्दर्भ:

17. गीतम्

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बालबोधिनी- प्रस्तुत श्लोक द्वारा इस सर्ग के अन्त में श्रीजयदेव कवि अपने पाठकों एवं श्रोताओं के लिए मंगलाचरणरूप आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं- कंसारि श्रीकृष्ण का वंशीरव कल्याण का विस्तार करे। वह वंशीध्वनि दर्पीले दानवों के कारण देवताओं को होने वाले असह्य कष्ट को दूर करने वाली है, कुरंगीनयनाओं के अन्त:करण को इस प्रकार मोहित करती है कि वे आनन्द में निमग्न हो शिरश्चालन करने लगती हैं और घूर्णित-मौलि (मस्तक) जाती हैं, वे मुग्ध होकर अवलोकन किया करती हैं, स्वर्गलोक की अप्सराओं की मन्दार पुष्प की माला इस वंशीध्वनि से भ्रंशित होने लगती है, टूटने लगती है इस प्रकार श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि का 'वशीकारत्व' बताया है। वशीकृत देवता साधु-साधु कहकर शिरोधूनन के द्वारा प्रशंसा करते हैं। शिरोधूनन एवं मन्दार के विभ्रंशन से वंशी का 'मारण' अभिलक्षित है। स्तम्भत्व एवं आकर्षणत्व तो सिद्ध ही है। समाप्त।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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गीत गोविन्द -श्रील जयदेव गोस्वामी
सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

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