गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 294

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

सप्तम: सर्ग:
नागर-नारायण:

पंचदश: सन्दर्भ

15. गीतम्

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जित-विस-शकले मृदु-भुज-युगले करतल-नलिनी-दले।
रकत-वलयं मधुकर-निचयं वितरति हिम-शीतले
रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥4॥[1]

अनुवाद- सुकेशी, पीनस्तनी उस रमणी के मृणालदण्ड से भी सुशीतल भुजयुगल जिनमें उसके सुकुमार करतलरूपी नलिनी-दल सुशोभित हो रही हैं, उनमें वे भ्रमर-सदृश मरकतमय वलयरूपी कंगन धारण करा रहे हैं।

पद्यानुवाद
तालखण्ड से युग भुज, करतल राजित नलिनी दल से।
पहिनाते मरकत-कंकण जो लगते छाये अलिसे॥
यमुन-पुलिन के सघन कुंजमें रमते आज मुरारी।
प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी॥

बालबोधिनी- श्रीराधा कह रही हैं- उस भाग्यशालिनी की दोनों भुजाएँ कोमलता में मृणालदण्ड को भी मात कर देने वाली हैं। सुकुमार गौर वर्ण, हिम के समान दोनों हाथों की सुशीतल हथेलियाँ कमल के समान लाल-लाल हैं। जिस प्रकार लाल कमल-दलों के ऊपर नीले-नीले भौंरे अत्यन्त अभिराम प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार उसके करतलों में श्रीकृष्ण नीलमणिजड़ित कंगनरूपी भौंरे धारण करा रहे हैं। कोमल बाहों में ये कंगन ऐसे सुशोभित होते हैं मानो उन हाथों को घेरकर भौंरे एक कली-पंक्ति बना रहे हों। हिमशीतले सम्भोगकारिणी रमणी का भुजयुगल श्रीकृष्ण के स्पर्श से काम-ताप शून्य होकर हिमवत शीतल हो गया है अथवा उस रमणी में काम का अभाव है यह भी सूचित होता है। उसके ठण्डे हाथों में यह कंगन एक नया ताप प्रदान करेगा।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अन्वय- जित-विस-शकले (जितानि विसशकलाणि मृणालखण्डानि येन तादृशे) करतल-नलिनीदले (करतलमेव नलिनीदलं पद्मपत्रं यत्र तस्मिन्) [तथा] [सम्भोगिन्या: कामतापराहित्यात्] हिमशीतले (हिमवत् शीतले) मृदुभुजयुगले (कोमलबाहुद्वये) मधुकर-निचयं (भ्रमरपंक्तिम्) एव मरकतवलयं (मरकतमयं वलयं) वितरति (परिधापयति) ॥4॥

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द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
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